photo journalist from chhattisgarh. Worked for the Navabharat in Orissa as bureau chief. Presently with the Haribhoomi Super Central Desk.
Thursday, December 2, 2010
छिछोरेपन की मिसाल
पच्चीस हजारी सूट आपको वीआईपी की लाइन में तो खड़ा कर सकता है किन्तु आपकी इज्जत तभी तक बनी रहती है जब तक कि आप अपना मुंह नहीं खोलते। मुंह खोलते ही आपकी औकात पता लग जाती है। इसी तरह येन केन प्रकारेण पैसे कमा लेने मात्र से कोई आभिजात्य नहीं हो जाता। करोड़ों का बंगला, लाखों की गाड़ियां, फैंसी खादी आपका गेटअप तो सुधार सकती है, माइंडसेट नहीं बदल सकती। हाल ही में शहर के एक नामचीन स्कूल के बच्चे चंपारण राजिम ले जाए गए। स्कूल बस में ठूंस-ठूंस कर ले जाए गए बच्चों से दो-दो सौ रुपए वसूले गए। मांगा जाता तो पेरेन्ट्स तीन सौ रुपए भी दे देते। इतनी दलिद्दरी की जरूरत नहीं थी। बच्चों को सुबह के नाश्ते में 3-3 रुपए का ठंडा पोहा दिया गया। दोपहर को पूड़ी और बरबट्टी बैंगन की बेमेल सब्जी। एजुकेशन टूर के नाम पर किये गए इस आयोजन में किसी बच्चे को यह तक नहीं बताया गया कि वे क्या देख रहे हैं। जो देख रहे हैं उसका ऐतिहासिक या धार्मिक महत्व क्या है। अधिकांश बच्चों को यह तक नहीं पता चला कि राजिम में नदियों का संगम होता है। यहां कुंभ का मेला भरता है। दरअसल इसकी उम्मीद उनसे की जा सकती थी जो केवल स्कूल चलाते हैं। जिनका पूरा ध्यान बच्चों की शिक्षा पर रहता है। वे एजुकेशन टूर पर बच्चों को उस स्थल विशेष की जानकारी देते हैं, उसका महत्व बताते हैं। किन्तु यहां तो बात ही और है। यह पैसे कमाने के लिए एकत्र हुए लोगों का एक जमावड़ा मात्र है। एजुकेशनल टूर भी यहां उगाही का एक माध्यम मात्र है। शिक्षाविद कहलाने वाले ये लोग दरअसल पुराने जिन्सों के कबाड़ी, भवन निर्माण के ठेकेदार, होस्टल चलाने वाले मकान मालिक, मेस चलाने वाला हलवाई, गाय-भैंस पालने वाले डेयरी संचालक और बसों की फ्लीट खड़ी करने वाले ट्रांसपोर्टर हैं। ये कपड़ा भी बेचते हैं और किताबें भी। स्टेशनरी की तो पूरी दुकान ही खोले बैठे हैं। इस तरह के स्कूलों में अपने बच्चों को लोग शिक्षा के लिए नहीं, स्टेटस के लिए भेजते हैं। वे स्कूल की बिल्डिंग देखकर थर्रा जाते हैं। वे यह सोचकर खुद को तसल्ली देते हैं कि इतने सारे लोग यहां अपने बच्चों को पढ़ने के लिए भेजते हैं, सबके सब मूर्ख तो नहीं हैं। यह एक अजब फिलासफी है। जिसे अधिक लोग कर रहे हैं वही सही है। जो ढंग का स्कूल बिल्डिंग तक नहीं बनवा पाया वह क्या प्रेरणा देगा भला। जो खुद पैसे नहीं कमा सका, वह पैसे कमाना क्या सिखाएगा? डैशिंग पर्सनालिटी तो वह होती है जो कार से ड्यूटी जाए तो सवारी बैठाकर पेट्रोल के भी पैसे वसूल ले। इसे अंग्रेजी में कहें तो ‘गेटिंग द मोस्ट आउट आफ इट।’
दीक्षित का इलाज
बहुत खराब लगता है जब किसी के गुजरने के बाद कोई टिप्पणी करनी पड़ती हो। खास कर तब जब वह अपनी, अपनी सोच की रक्षा करने के लिए उपलब्ध न हो। किन्तु यह तब जरूरी हो जाता है जब मामला औरों के लिए निदर्शन बन जाए। भारत स्वाभिमान का नारा देने और स्वदेशी पर गर्व करने वाले राजीव दीक्षित के साथ भिलाई और भिलाई के दो अस्पताल भी हमेशा के लिए दर्ज हो गए। इन दोनों अस्पतालों ने अपनी अपनी पूरी क्षमता झोंक दी थी किन्तु यहां वह भी हुआ जिसे आमतौर पर चिकित्सा के क्षेत्र में बर्दाश्त नहीं किया जाता। अंतत: वही झोला छाप वाली उक्ति चरितार्थ हुई कि जिसकी आई होती है उसे कोई टाल नहीं सकता। संयंत्र के मुख्य चिकित्सालय में भले ही कैथ लैब न हो किन्तु इस अस्पताल को साधन विहीन नहीं मान लेना चाहिए। इस अस्पताल ने ऐसी मिसालें भी पेश की हैं जिसपर विश्वस्तरीय किसी भी अस्पताल को गर्व हो सकता है। बस इसकी मार्केटिंग सही ढंग से नहीं की गई वरना दूर-दूर से लोग यहां इलाज के लिए आ रहे होते। आज भी अंचल के अधिकांश निजी प्रैक्शिनर अपने विजिटिंग कार्ड पर एक्स भिलाई स्टील प्लांट मेन हास्पीटल गर्व के साथ लिखवाते हैं। इसके अक्षर उनकी डिग्रियों से भी बड़े होते हैं। वह तो दीक्षित वीआईपी थे। मामले में योगगुरु बाबा रामदेव और एमडी का हस्तक्षेप था। आधी रात को दिल्ली के एक बड़े अस्पताल के बड़े डाक्टर और मरीज के पारिवारिक मित्र का सुझाव आया। वरना कोई यहां डाक्टर तो दूर नर्स को सुझाव देकर देखे। तत्काल जवाब मिलेगा, ‘डाक्टर आप हैं या हम? अपनी मर्जी चलानी हो तो मरीज को ले जाएं।’ वस्तुत: हुआ भी यही। इतने तल्ख शब्दों में भले ही न कहा गया हो किन्तु खामोश रहकर भी नाराजगी जाहिर की जा सकती है। शाम घिरते ही भिलाई इस्पात संयंत्र ने छह-आठ लाइन में राजीव दीक्षित के मामले के काम्पीलेक्शंस का प्रेस नोट भेज दिया ताकि लोगों का विश्वास इस अजीमोशान अस्पताल से न उठ जाए। लोग कहीं यह न मान बैठें कि अपोलो बीएसआर यहां का बड़ा अस्पताल हो गया है। यहां कुछ बातें गौर करने की हैं। दीक्षित को मासिव हार्ट अटैक शाम पौने पांच बजे के करीब आया था। वे पहले ही अस्वस्थ महसूस कर रहे थे। हो सकता है उन्हें रास्ते में ही माइल्ड अटैक आए हों। उन्हें पांच बजे के बाद मेन हास्पीटल लाया गया जहां चिकित्सकों ने उनकी इमरजेंसी मैनेजमेन्ट की और रात 11:30 बजे उन्हें उन्हीं के चिकित्सक की राय पर अपोलो बीएसआर शिफ्ट करने की इजाजत दे दी। चलो बला टली। अब आते हैं योगाचार्य पर। दीक्षित डायबिटीज के पेशेंट थे। उन्हें दिल का मर्ज था। दोनों ही मामलों को नियंत्रण में रखने के दर्जनों तरीके योगा करने वाले जुबानी सुझा देते हैं। इन तरीकों की दर्जनों किताबें बाजार में उपलब्ध हैं। पर जब काल आता है तो यह सब गौण हो जाता है। केवल बहाने रह जाते हैं, क्या झोला छाप और क्या अटैची वाले।
कबाड़ जैसी किताबें
पहले दंतेवाड़ा और अब दुर्ग। सर्वशिक्षा अभियान के अंतर्गत पहली से आठवीं तक के बच्चों को नि:शुल्क दी जाने वाली लाखों की किताबें कबाड़ी के यहां मिलीं। इसको लेकर खूब हंगामा हो रहा है। वैसे हंगामा करना हमारी आदत में शुमार है। हम किसी भी बात पर हंगामा खड़ा कर सकते हैं। उत्सव प्रेमियों का देश जो ठहरा। यहां जन्म से लेकर मृत्यु तक पूरा जीवन ही उत्सव है। भई जो किताबें कबाड़ हैं, वह कबाड़ी के पास ही तो जाएंगी। नहीं जाएंगी तो सरकारी गोदामों में सड़ेंगी। दरअसल यह भीति (भय) से उपजी संस्कृति है। हम हमेशा इस बात का खौफ खाए रहते हैं कि कम न पड़े। घर में भोजन थोड़ा अधिक ही बनता है ताकि कम न पड़े। क्या पता किसी के साथ कोई आ ही जाए। अकसर कोई नहीं आता। तब यह अतिरिक्त भोजन हम खुद कर लेते हैं कि अनाज का अपमान नहीं होना चाहिए। कोई आश्चर्य नहीं कि देश में भूख से कभी कभार ही कोई मरता है किन्तु ज्यादा खाकर मरने वालों की संख्या प्रतिदिन हजारों में है। यही भय हमें शादी ब्याह में अतिरिक्त इंतजाम करने के लिए प्रेरित करता है। यदि कैटरर रखे गए हैं तो आटा, तेल, घी, चावल, सब्जियां सभी बच जाती हैं। यदि खुद खाना बनवाया है तो एकाध मन भोजन कुत्तों को डाल दिया जाता है या भिखारी ढूंढे जाते हैं। सर्वशिक्षा अभियान के साथ भी ऐसा ही है। पुस्तकों का आर्डर चूंकि सत्रारंभ से काफी पहले हो जाता है इसलिए वह प्रवेश की अनुमानित संख्या पर आधारित होता है और कुछ अधिक ही होता है। प्रवेश कम हुआ तो पुस्तकें बच जाती हैं। पर किसी भी हालत में पुस्तकें कम नहीं पड़नी चाहिए। भय जनित संस्कृति हमें ज्यादा भेजने के लिए उकसाती है। वनग्रामों में शाला पंजी में दर्ज बच्चों में से आधे ही स्कूल आते हैं। इसलिए यदि सही संख्या में भी पुस्तकें भेजी जाएं तो बचत होती है। हर स्कूल के लिए थोड़ी-थोड़ी पुरौनी डालते डालते पुरौनी सैकड़ों किलो हो जाती है। जब जिलों से ये पुस्तकें गांव-देहात की शालाओं के लिए चलती हैं तो दर्ज संख्या के आधार पर रजिस्टर में इंट्री के साथ पुस्तकें इश्यू की जाती हैं। इसलिए बड़ी मात्रा में पुस्तकें बच जाती हैं। एक-दो साल में इन अतिशेष पुस्तकों के भंडारण की समस्या सिर उठाने लगती है। बीच का रास्ता निकालने वाले साहसी अफसर इन्हें कबाड़ी के हाथों बेच देते हैं। पुस्तकों पर सील होती है जिससे उन शालाओं की पहचान हो सकती है जहां के लिए उन्हें मंगवाया गया था। लिहाजा पुस्तकों को बिक्री के लिए चोरी छिपे दूसरे जिलों में भेजना पड़ता है। साहसी कबाड़ी यह दुस्साहस करते हैं और किताबों को ट्रकों में भरकर ले जाते हैं। वहां कोई बड़ा सा गोदाम किराए पर लेकर पुस्तकों से कवर को अलग किया जाता है और फिर कबाड़ बिक जाता है। वैसे भी कागज की रिसाइक्लिंग पर्यावरण की रक्षा करती है।
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