Thursday, December 2, 2010

कबाड़ जैसी किताबें

पहले दंतेवाड़ा और अब दुर्ग। सर्वशिक्षा अभियान के अंतर्गत पहली से आठवीं तक के बच्चों को नि:शुल्क दी जाने वाली लाखों की किताबें कबाड़ी के यहां मिलीं। इसको लेकर खूब हंगामा हो रहा है। वैसे हंगामा करना हमारी आदत में शुमार है। हम किसी भी बात पर हंगामा खड़ा कर सकते हैं। उत्सव प्रेमियों का देश जो ठहरा। यहां जन्म से लेकर मृत्यु तक पूरा जीवन ही उत्सव है। भई जो किताबें कबाड़ हैं, वह कबाड़ी के पास ही तो जाएंगी। नहीं जाएंगी तो सरकारी गोदामों में सड़ेंगी। दरअसल यह भीति (भय) से उपजी संस्कृति है। हम हमेशा इस बात का खौफ खाए रहते हैं कि कम न पड़े। घर में भोजन थोड़ा अधिक ही बनता है ताकि कम न पड़े। क्या पता किसी के साथ कोई आ ही जाए। अकसर कोई नहीं आता। तब यह अतिरिक्त भोजन हम खुद कर लेते हैं कि अनाज का अपमान नहीं होना चाहिए। कोई आश्चर्य नहीं कि देश में भूख से कभी कभार ही कोई मरता है किन्तु ज्यादा खाकर मरने वालों की संख्या प्रतिदिन हजारों में है। यही भय हमें शादी ब्याह में अतिरिक्त इंतजाम करने के लिए प्रेरित करता है। यदि कैटरर रखे गए हैं तो आटा, तेल, घी, चावल, सब्जियां सभी बच जाती हैं। यदि खुद खाना बनवाया है तो एकाध मन भोजन कुत्तों को डाल दिया जाता है या भिखारी ढूंढे जाते हैं। सर्वशिक्षा अभियान के साथ भी ऐसा ही है। पुस्तकों का आर्डर चूंकि सत्रारंभ से काफी पहले हो जाता है इसलिए वह प्रवेश की अनुमानित संख्या पर आधारित होता है और कुछ अधिक ही होता है। प्रवेश कम हुआ तो पुस्तकें बच जाती हैं। पर किसी भी हालत में पुस्तकें कम नहीं पड़नी चाहिए। भय जनित संस्कृति हमें ज्यादा भेजने के लिए उकसाती है। वनग्रामों में शाला पंजी में दर्ज बच्चों में से आधे ही स्कूल आते हैं। इसलिए यदि सही संख्या में भी पुस्तकें भेजी जाएं तो बचत होती है। हर स्कूल के लिए थोड़ी-थोड़ी पुरौनी डालते डालते पुरौनी सैकड़ों किलो हो जाती है। जब जिलों से ये पुस्तकें गांव-देहात की शालाओं के लिए चलती हैं तो दर्ज संख्या के आधार पर रजिस्टर में इंट्री के साथ पुस्तकें इश्यू की जाती हैं। इसलिए बड़ी मात्रा में पुस्तकें बच जाती हैं। एक-दो साल में इन अतिशेष पुस्तकों के भंडारण की समस्या सिर उठाने लगती है। बीच का रास्ता निकालने वाले साहसी अफसर इन्हें कबाड़ी के हाथों बेच देते हैं। पुस्तकों पर सील होती है जिससे उन शालाओं की पहचान हो सकती है जहां के लिए उन्हें मंगवाया गया था। लिहाजा पुस्तकों को बिक्री के लिए चोरी छिपे दूसरे जिलों में भेजना पड़ता है। साहसी कबाड़ी यह दुस्साहस करते हैं और किताबों को ट्रकों में भरकर ले जाते हैं। वहां कोई बड़ा सा गोदाम किराए पर लेकर पुस्तकों से कवर को अलग किया जाता है और फिर कबाड़ बिक जाता है। वैसे भी कागज की रिसाइक्लिंग पर्यावरण की रक्षा करती है।

1 comment:

  1. समस्या ये है कि जहाँ किताबें पहुंचनी चाहिए वहा तक पहुँचती ही नहीं। पुस्तके स्कूल पहुँच भी जाए तो उन्हे वितरित नहीं किया जाता।

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