कीमती चेहरा
वर्षों पहले आम आदमी की बारात पैदल भी जाती थी। दुल्हन को लेकर लौटते समय नए जूतों को दूल्हा कांख में दबा लेता था और पुराने जूतों को पहनकर ही घर तक का सफर तय करता था। 40 साल पहले मिडिल क्लास पैदा हुआ। घर में बैठक के लिए जगह निकाली जाने लगी। डिजाइनदार सोफे बैठक की शोभा बढ़ाने लगे। इसके साथ ही आया सेन्टर टेबल। सेन्टर टेबल खराब न हो इसके लिए सनमाइका के टाप बनने लगे। सनमाइका खराब न हो इसके लिए उसपर टेबल क्लाथ बिछाया जाने लगा। आज सेन्टर टेबल का टॉप शीशे का होता है। अकसर यह स्क्रैच फ्री होता है किन्तु इसे भी स्क्रैच से बचाने के लिए इसपर पारदर्शी कवर डाला जाता है। अब शरीर को संवारने की बारी है। लड़के-लड़कियां समान रूप से वैक्सिंग, ब्लीचिंग, कलरिंग करवाती हैं। क्लीन्जिंग मिल्क से चेहरा साफ करते हैं, नमी बनाए रखने के लिए माइस्चराइजर लगाते हैं। इस ेचेहरे को धूल मिट्टी या धूप न लग जाए इसके लिए साफा बांध लेते हैं। स्लीवलैस कपड़ों में वैक्सिंग की हुई बांहों को बचाने के लिए लंबे दस्ताने पहनते हैं। अब पता नहीं क्या-क्या बचाने के लिए युवा क्या-क्या करते हैं किन्तु पुलिस के लिए यह खासा सिरदर्द बन चुका है। प्लेटफार्म पर भटकती मिली लड़की हो या मोहल्ले में मिली लड़की की लाश, उसे या तो उसके घर वाले पहचान पाते हैं या फिर वह लोग जिनके लिए वह खास होती है। बाकी लोगों के लिए मोहल्ले की हर लड़की एक अलग रंग का साफा मात्र है। शायद इसकी जरूरत भी हो किन्तु यह जरूरत आम आदमी की समझ से परे है। इसकी एक जरूरत यह हो सकती है कि आज का युवा सार्वजनिक रूप से पहचाना नहीं जाना चाहता। वह कभी भी कहीं भी हो सकता है। वहां उसके मोहल्ले के और लोग भी हो सकते हैं। या वे लोग हो सकते हैं जिनके घरों के सामने से होकर उनका रोज का गुजरना होता है। ऐसे लोगों की नजरों से बचा रहना उनके लिए जरूरी हो जाता है। अब कौन लड़की यह गवारा करेगी कि पड़ोस वाली आंटी आकर उसकी मम्मी को यह बताए कि जब वह कोचिंग के नाम पर घर से निकली थी तब पड़ोसी के लड़के के साथ सिविक सेन्टर में पावभाजी खा रही थी। किसे पसंद होगा कि जब वह जवाहर उद्यान, मैत्राबाग या शिवनाथ वाटिका की तन्हाई में बैठी हो तो कोई, ‘हाय! शिवानी’ कहकर दाल भात में मूसरचंद की तरह आकर ठस जाए। वैसे समझ में यह नहीं आता कि इतनी मेहनत और नफासत से चेहरे को संवारा ही क्यों जाता है, जब उसे किसी को दिखाना न हो। जो प्यार करता है, वह तो सावन का अंधा होता है। वह तो चेहरे के दागों को भी छूता-सहलाता-चूमता है। बल्कि कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि सावन के अंधे को व्यक्ति से नहीं बल्कि उसके होठों के तिल से, नाक के मस्से से ही प्यार होता है। फिर इतनी सजावट किसके लिए?
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