photo journalist from chhattisgarh. Worked for the Navabharat in Orissa as bureau chief. Presently with the Haribhoomi Super Central Desk.
Thursday, December 2, 2010
दीक्षित का इलाज
बहुत खराब लगता है जब किसी के गुजरने के बाद कोई टिप्पणी करनी पड़ती हो। खास कर तब जब वह अपनी, अपनी सोच की रक्षा करने के लिए उपलब्ध न हो। किन्तु यह तब जरूरी हो जाता है जब मामला औरों के लिए निदर्शन बन जाए। भारत स्वाभिमान का नारा देने और स्वदेशी पर गर्व करने वाले राजीव दीक्षित के साथ भिलाई और भिलाई के दो अस्पताल भी हमेशा के लिए दर्ज हो गए। इन दोनों अस्पतालों ने अपनी अपनी पूरी क्षमता झोंक दी थी किन्तु यहां वह भी हुआ जिसे आमतौर पर चिकित्सा के क्षेत्र में बर्दाश्त नहीं किया जाता। अंतत: वही झोला छाप वाली उक्ति चरितार्थ हुई कि जिसकी आई होती है उसे कोई टाल नहीं सकता। संयंत्र के मुख्य चिकित्सालय में भले ही कैथ लैब न हो किन्तु इस अस्पताल को साधन विहीन नहीं मान लेना चाहिए। इस अस्पताल ने ऐसी मिसालें भी पेश की हैं जिसपर विश्वस्तरीय किसी भी अस्पताल को गर्व हो सकता है। बस इसकी मार्केटिंग सही ढंग से नहीं की गई वरना दूर-दूर से लोग यहां इलाज के लिए आ रहे होते। आज भी अंचल के अधिकांश निजी प्रैक्शिनर अपने विजिटिंग कार्ड पर एक्स भिलाई स्टील प्लांट मेन हास्पीटल गर्व के साथ लिखवाते हैं। इसके अक्षर उनकी डिग्रियों से भी बड़े होते हैं। वह तो दीक्षित वीआईपी थे। मामले में योगगुरु बाबा रामदेव और एमडी का हस्तक्षेप था। आधी रात को दिल्ली के एक बड़े अस्पताल के बड़े डाक्टर और मरीज के पारिवारिक मित्र का सुझाव आया। वरना कोई यहां डाक्टर तो दूर नर्स को सुझाव देकर देखे। तत्काल जवाब मिलेगा, ‘डाक्टर आप हैं या हम? अपनी मर्जी चलानी हो तो मरीज को ले जाएं।’ वस्तुत: हुआ भी यही। इतने तल्ख शब्दों में भले ही न कहा गया हो किन्तु खामोश रहकर भी नाराजगी जाहिर की जा सकती है। शाम घिरते ही भिलाई इस्पात संयंत्र ने छह-आठ लाइन में राजीव दीक्षित के मामले के काम्पीलेक्शंस का प्रेस नोट भेज दिया ताकि लोगों का विश्वास इस अजीमोशान अस्पताल से न उठ जाए। लोग कहीं यह न मान बैठें कि अपोलो बीएसआर यहां का बड़ा अस्पताल हो गया है। यहां कुछ बातें गौर करने की हैं। दीक्षित को मासिव हार्ट अटैक शाम पौने पांच बजे के करीब आया था। वे पहले ही अस्वस्थ महसूस कर रहे थे। हो सकता है उन्हें रास्ते में ही माइल्ड अटैक आए हों। उन्हें पांच बजे के बाद मेन हास्पीटल लाया गया जहां चिकित्सकों ने उनकी इमरजेंसी मैनेजमेन्ट की और रात 11:30 बजे उन्हें उन्हीं के चिकित्सक की राय पर अपोलो बीएसआर शिफ्ट करने की इजाजत दे दी। चलो बला टली। अब आते हैं योगाचार्य पर। दीक्षित डायबिटीज के पेशेंट थे। उन्हें दिल का मर्ज था। दोनों ही मामलों को नियंत्रण में रखने के दर्जनों तरीके योगा करने वाले जुबानी सुझा देते हैं। इन तरीकों की दर्जनों किताबें बाजार में उपलब्ध हैं। पर जब काल आता है तो यह सब गौण हो जाता है। केवल बहाने रह जाते हैं, क्या झोला छाप और क्या अटैची वाले।
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आपने विस्तार से कुछ नहीं लिखा है सब कुछ संकेतों मे कहा है। राजीव जी के करोड़ों चाहने वाले हैं जो उनकी मृत्यु की असलियत जानना चाहते हैं। ऐसे कीमती व्यक्ति के साथ कैसे इतनी लापरवाही की गयी?
ReplyDeletehamare desh ke log bade hi sust hain.. kam se kam doctor's ko to active hona chahiye. waise b doctor's ko bhagwan ke barabar mana jata hai..
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