पत्रकार भी इंसान हैं। खासकर वे उस बिरादरी से हैं जहां व्यक्ति विशेषज्ञ किसी भी फील्ड का नहीं होता पर उससे उम्मीद प्रत्येक फील्ड की विशेषज्ञता की की जाती है। वह डाक्टर से बेहतर डाक्टर, इंजीनियर से बेहतर इंजीनियर, सबसे बड़ा समाजशास्त्री और मनोवैज्ञानिक होता है। पुलिस सेवाओं का तो उसे खास विशेषज्ञ माना जाता है। राजनीति में भी उसकी टिप्पणियों को चाणक्य का ओपीनियन समझ लिया जाता है। अपनी इस ताकत का जब से उसे अंदाजा हुआ है, बड़े बड़े उद्योगपति मीडिया के फील्ड में घुस गए हैं। यहां तक तो फिर भी सबकुछ ठीक है किन्तु जब से उद्योगपति और गंदे रईस इस धंधे में आए हैं तब से खोजी पत्रकारिता का एक नया सिलसिला शुरू हुआ है। खोजी पत्रकारिता को दूसरे शब्दों में दबंग पत्रकारिता कहा जाता है। इसमें पत्रकार येन केन प्रकारेण किसी सरकारी अधिकारी के खिलाफ ऐसे दस्तावेज और सबूत जुटा लेता है जिससे उस पर जबरदस्त दबाव बनाया जा सके। इसका दोहरा इस्तेमाल किया जा सकता है। खोजी पत्रकार या उसके आका पहले तो खोज कर निकाले गए सांप को झांपी में बंद कर देता है और फिर बीच-बीच में उसका ढक्कन उठाकर लोगों को फन के दर्शन कराता रहता है। उसकी खबरें भी ऐसी होती हैं कि उसमें इशारों के तीर तो बहुत चलते हैं पर मुद्दे की बात गोल होती है। अकसर अधिकारी डर जाता है और पत्रकार या उसके आका के मन की मुराद पूरी कर देता है। पर जिस तरह हाथ की पांचों उंगलियां एक जैसी नहीं होती, उसी तरह ब्लैकमेल होने वाला प्रत्येक व्यक्ति एक जैसी तासीर का नहीं होता। इनमें से कुछ तो डर कर अपनी इज्जत बचाने में जुट जाते हैं। कुछ बात खुलने के डर से सौदा कर लेते हैं। पर कुछ ऐसे भी होते हैं जो एक बार पत्रकार से कह देते हैं कि उससे जो बन पड़े कर ले, उसे उससे कोई बात नहीं करनी। वहीं कुछ लोग, भले ही वे संख्याबल में कम हों, ऐसे भी होते हैं जो अपनी तरफ उठी उंगलियों को तोड़ने, आंखों को फोड़ने में यकीन करते हैं। यदि खोजी पत्रकार ऐसे लोगों को ताड़ नहीं पाता तो अपने लिए मुसीबत बुला लेता है। मेरी नजर में यह पत्रकारिता नहीं है। यह महज सनसनी की मार्केटिंग है। आप लोगों को आवश्यक सूचनाएं देंगे नहीं। शासन की योजनाएं अंदर के किसी पृष्ठ पर छापेंगे। लोगों को जानकारी होगी नहीं और फिर जब वे छले जाएंगे तो उनके छले जाने की खबरें प्रथम पृष्ठ पर छापेंगे। आप लोगों को जानकार, जागरूक और जिम्मेदार बनाने के बजाय उन गिने चुने लोगों को खोजने में अपनी सारी ऊर्जा खर्च कर देंगे जो लोगों की अज्ञानता का लाभ उठाते हैं तो फिर जब आप मारे जाएंगे तो रोने वाले भी नहीं मिलेंगे। मुम्बई में या जहां कहीं भी पत्रकार की हत्या होती है, उसके पीछे अकसर इसी तरह की घटनाओं का हाथ होता है। हत्या पत्रकारिता की वजह से हुई हो यह भी जरूरी नहीं है। यह प्रेम त्रिकोण, लेन देन या जमीन की दलाली से भी जुड़ी हो सकती है। पर आधुनिक पत्रकारिता को यह देखने की फुर्सत कहां। वह एक रेपिस्ट दलित की हत्या को वह केवल दलित की पीट-पीट कर हत्या के रूप में देखता और दिखाता है। दलित, अजा और अजजा के लोग आईएएस और आईपीएस होने के बाद भी दलित थानों में मामले दर्ज कराते हैं और इन्हीं कानूनों की धाराओं के तहत उसकी सुनवाई शुरू होती है। क्या पहला, क्या दूसरा, क्या तीसरा और क्या चौथा स्तंभ? यहां तो हमाम में सभी नंगे हैं। इनमें से सभी अपने अपने किये की सजा भुगत रहे हैं तो फिर हाय तौबा कैसी?
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