Sunday, April 1, 2012

रोना संयुक्त परिवार का


कुछ लोगों को रोने की आदत होती है। वे हमेशा किसी न किसी बात को रोते रहते हैं। पिछले कुछ अरसे से लगातार टूटते परिवारों का रूदन सुन-सुनकर खुद से कोफ्त होने लगी है। ऐसा लगने लगा है जैसे नई पीढ़ी तो जो कर रही है सो कर रही है, खुद हमने कोई बहुत बड़ा तीर नहीं मारा हुआ था। बीस या पच्चीस साल पहले हम भी नई पीढ़ी ही कहलाया करते थे। हमें भी लोग कोसा करते थे। लोग कहते थे कि यंग जनरेशन मनमौजी हो गई है। उन्हें अपने से बड़ों का आदर करना तक नहीं आता। अब हम पूछते हैं कि क्यों आना चाहिए। कथित मैच्योर (वोट देने वाली) पीढ़ी लगातार पश्चिम परस्त लोगों की सरकारें चुनती रही है। देश की शिक्षा व्यवस्था हमें प्रतिस्पर्धी बना रही है। जीवन स्तर नाम का एक नया शिगूफा उथल-पुथल मचाए हुए है। पूरा का पूरा सेटअप पश्चिमी हो चला है। घर में चौपाल और बेडरूम में संडास हमें भाने लगे हैं। नाश्ता से लेकर भोजन तक पैकेट में आ रहा है। गिल्ली डंडा छोड़कर हाथ क्रिकेट का बल्ला थाम चुके हैं। लोग पांव के बजाय घुटना छूने लगे हैं। पूजनीय पिताजी, डियर पापा हो चुके हैं। माँ कब की ममी बन चुकी है। जमाना इसी तरह बदलता है। उसे कोई रोक नहीं सकता। कभी जंगलों में रहने वाले इंसान सुरक्षा के लिहाज से झुंडों में रहा करते थे। बीवियां और भाई बहन कॉमन हुआ करती होंगी। पापा का मतलब पुरुष और माँ का मतलब औरत हुआ करती होगी। फिर लोगों ने इसमें कुछ व्यवस्थाएं बनाईं। आदिम पुरुषों का यह झुण्ड परिवार नाम की इकाइयों में बंट गया। समय का चक्का चलता रहा और परिवार नाम की इकाइयों भी एकल परिवारों में बंट गईं। नौकरीपेशा लोगों को घर छोडऩा पड़ा। नौकरी के स्थान पर चाचा-ताऊ, माता-पिता, जीजा-साली सबको लेकर जाने का कोई औचित्य नहीं था। ऐसे एकल परिवारों के घर उपभोग की वस्तुएं बढऩे लगीं। उनकी देखा देखी औरों ने भी ऐसे जीवन स्तर की कल्पना की और समाज बदलता चला गया। आज जो लोग संयुक्त परिवार की दुहाई दे देकर भिनभिनाते रहते हैं, उनमें से अधिकांश को केवल बुजुर्गों की पीड़ा दिखाई देती है। यह समाज की एकतरफा सोच है। कोई भी समाज केवल बूढ़ों और बीमारों को टारगेट पर रखकर आगे नहीं बढ़ सकता। काश! किसी ने यह भी कहा होता कि यदि संयुक्त परिवार होता तो शायद आरुषि तलवार को नहीं मरना पड़ता। कमाऊ माता पिता के एकल बच्चे घर में किसके भरोसे रहते हैं, क्या करते हैं, जब तक इसकी चिंता नहीं की जाएगी, तब तक यह बहस अधूरी रहेगी। चिंता करते समय इस बात का ख्याल रखा जाना बेहद जरूरी है कि बालिका वधुएं जिस तरह परिवारों में आसानी से एडजस्ट हो जाया करती थीं वैसी उम्मीद पोस्ट ग्रैजुएट कमाऊ बीवियों से नहीं की जा सकती।

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