1200 वर्गफुट के मकान में बड़े शौक से 400 वर्गफुट का ड्राइंग रूम बनवाया था। बाकी कमरों में सादा और वहां विट्रीफाइड ग्लेज्ड टाइल्स लगवाया था। टाइल्स पर उम्दा गलीचे का भी प्रबंध किया था। ब्रांडेड सोफा सेट, कॉर्नर टेवल, एक्वेरियम, टेलीफोन स्टूल, झाडफ़ानूस पर हजारों रुपए खर्च किये थे। बैठक घर का आईना होता है। दीवारों को रंगने में भी छोटी-मोटी पूंजी खर्च की थी। पर अब यह ड्राइंग रूम खाली पड़ा रहता है। थ्रीसीटर पर लेटे-लेटे बेटा टीवी देखता है। बेटी को सोफे के हैंडल पर बैठकर खाना खाते हुए टीवी देखने की आदत है। वरना इस कमरे में अब कोई आता नहीं। तीस साल अचानक ही ड्राइंग रूम का कंसेप्ट भारत आया था। अब यह धीरे-धीरे खुद ही हाशिए पर चला जा रहा है। जब लोगों के यहां फोन नहीं था तो एक दूसरे के यहां आना जाना लगा रहता था। अब तो दिन में दो चार बार फोन पर ही सम्पर्क कर लेते हैं। जिनके यहां कम्प्यूटर और ब्रॉड बैंड है वे अपने जन्मदिन से लेकर भगवान श्रीराम के जन्मदिन तक की बधाई फेसबुक पर दे देते हैं। कोई बात अच्छी या बुरी लगी तो ट्विटर पर ट्वीट कर देते हैं। मोबाइल एसएमएस का मार्केट डाउन हो गया है। इसपर इतने कमर्शियल एसएमएस आते हैं कि लोगों ने एसएमएस पढऩा ही बंद कर दिया है। कंपनियां 12-14 रुपए में हजारों एसएमएस करने के ऑफर देकर भी ग्राहक नहीं जुगाड़ पा रही हैं। फेसबुक पर अब मोबाइल से भी कनेक्ट हुआ जा सकता है। लोग ऑनलाइन हो गये हैं। किसी को बधाई देने के लिए अब दूसरे दिन का इंतजार करने की किसी को फुर्सत नहीं। वैसे भी देर रात तक जागने की नई बीमारी पैदा हो चुकी है। रात के बारह तो यूं ही बज जाते हैं। अब जब जाग ही रहे हैं तो एक बार फेसबुक को ही देख लिया जाए। सैकड़ों दोस्तों का बर्थडे, एनीवर्सरी याद रखना मुश्किल है। आपके लिए फेसबुक इन्हें याद रखता है। कम्प्यूटर खुद ही बता देता है कि आज किसका जन्मदिन है, किसकी शादी की सालगिरह है। 12 बजते ही तारीख बदल जाती है। आप तत्काल बधाई संदेश भेज कर सुबह याद रखने के टेंशन से मुक्त हो सकते हैं। एक तो संदेशा मिस नहीं होता और दूसरा जिसे भेजा गया हो वह चटपट वहीं पर 'थैंक्सÓ लिखकर अपनी प्रतिक्रिया भी दे सकता है। पर कुछ दोस्त खास होते हैं। इनसे रोज रोज की मुलाकातें तय होती हैं। पर ये मुलाकातें अब घर पर नहीं होतीं। ड्राइंग रूम में प्राइवेसी नहीं होती। हर किसी को लेकर बेडरूम में नहीं जाया जा सकता। ऐसे लोगों से मिलने के बाहर के अड्डे तय होते हैं। ऐसे अड्डे जहां केवल आपही की उम्र के लोग आया जाया करते हैं। जहां जाने से सोशल एक्टिविटी•ा बढ़ती हैं। देश दुनिया के बारे में पता लगता है। ज्ञान-चक्षु खुलते हैं। इन अड्डों पर बेस्ट फ्रेंड, बेस्ट करियर, हायर एजुकेशन के चर्चे होते हैं। दोस्तों के डिप्रेशन, फ्रस्ट्रेशन का इलाज होता है। खाना-पीना तो आप्शनल है... एक दो प्लेट में चार छह लोग खाकर वे दोस्ती को ही मजबूत करते हैं।
photo journalist from chhattisgarh. Worked for the Navabharat in Orissa as bureau chief. Presently with the Haribhoomi Super Central Desk.
Sunday, April 1, 2012
खाली पड़े ड्राइंग रूम
1200 वर्गफुट के मकान में बड़े शौक से 400 वर्गफुट का ड्राइंग रूम बनवाया था। बाकी कमरों में सादा और वहां विट्रीफाइड ग्लेज्ड टाइल्स लगवाया था। टाइल्स पर उम्दा गलीचे का भी प्रबंध किया था। ब्रांडेड सोफा सेट, कॉर्नर टेवल, एक्वेरियम, टेलीफोन स्टूल, झाडफ़ानूस पर हजारों रुपए खर्च किये थे। बैठक घर का आईना होता है। दीवारों को रंगने में भी छोटी-मोटी पूंजी खर्च की थी। पर अब यह ड्राइंग रूम खाली पड़ा रहता है। थ्रीसीटर पर लेटे-लेटे बेटा टीवी देखता है। बेटी को सोफे के हैंडल पर बैठकर खाना खाते हुए टीवी देखने की आदत है। वरना इस कमरे में अब कोई आता नहीं। तीस साल अचानक ही ड्राइंग रूम का कंसेप्ट भारत आया था। अब यह धीरे-धीरे खुद ही हाशिए पर चला जा रहा है। जब लोगों के यहां फोन नहीं था तो एक दूसरे के यहां आना जाना लगा रहता था। अब तो दिन में दो चार बार फोन पर ही सम्पर्क कर लेते हैं। जिनके यहां कम्प्यूटर और ब्रॉड बैंड है वे अपने जन्मदिन से लेकर भगवान श्रीराम के जन्मदिन तक की बधाई फेसबुक पर दे देते हैं। कोई बात अच्छी या बुरी लगी तो ट्विटर पर ट्वीट कर देते हैं। मोबाइल एसएमएस का मार्केट डाउन हो गया है। इसपर इतने कमर्शियल एसएमएस आते हैं कि लोगों ने एसएमएस पढऩा ही बंद कर दिया है। कंपनियां 12-14 रुपए में हजारों एसएमएस करने के ऑफर देकर भी ग्राहक नहीं जुगाड़ पा रही हैं। फेसबुक पर अब मोबाइल से भी कनेक्ट हुआ जा सकता है। लोग ऑनलाइन हो गये हैं। किसी को बधाई देने के लिए अब दूसरे दिन का इंतजार करने की किसी को फुर्सत नहीं। वैसे भी देर रात तक जागने की नई बीमारी पैदा हो चुकी है। रात के बारह तो यूं ही बज जाते हैं। अब जब जाग ही रहे हैं तो एक बार फेसबुक को ही देख लिया जाए। सैकड़ों दोस्तों का बर्थडे, एनीवर्सरी याद रखना मुश्किल है। आपके लिए फेसबुक इन्हें याद रखता है। कम्प्यूटर खुद ही बता देता है कि आज किसका जन्मदिन है, किसकी शादी की सालगिरह है। 12 बजते ही तारीख बदल जाती है। आप तत्काल बधाई संदेश भेज कर सुबह याद रखने के टेंशन से मुक्त हो सकते हैं। एक तो संदेशा मिस नहीं होता और दूसरा जिसे भेजा गया हो वह चटपट वहीं पर 'थैंक्सÓ लिखकर अपनी प्रतिक्रिया भी दे सकता है। पर कुछ दोस्त खास होते हैं। इनसे रोज रोज की मुलाकातें तय होती हैं। पर ये मुलाकातें अब घर पर नहीं होतीं। ड्राइंग रूम में प्राइवेसी नहीं होती। हर किसी को लेकर बेडरूम में नहीं जाया जा सकता। ऐसे लोगों से मिलने के बाहर के अड्डे तय होते हैं। ऐसे अड्डे जहां केवल आपही की उम्र के लोग आया जाया करते हैं। जहां जाने से सोशल एक्टिविटी•ा बढ़ती हैं। देश दुनिया के बारे में पता लगता है। ज्ञान-चक्षु खुलते हैं। इन अड्डों पर बेस्ट फ्रेंड, बेस्ट करियर, हायर एजुकेशन के चर्चे होते हैं। दोस्तों के डिप्रेशन, फ्रस्ट्रेशन का इलाज होता है। खाना-पीना तो आप्शनल है... एक दो प्लेट में चार छह लोग खाकर वे दोस्ती को ही मजबूत करते हैं।
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