अंत:वस्त्र नहीं समझते? अरे भई.. अंडरगारमेन्ट्स। हमारे समय में किसी की चड्डी का रंग दिख जाता था तो पूरे क्लास में हल्ला हो जाता था... 'नीली चड्डी पहना है.. पीली चड्डी पहना है...।Ó खेलकूद के दौरान किसी के पैंट की सीवन उधड़ जाती, तो हम कहते Óब्लैडर दिख रहा हैÓ। उन दिनों हाथ की सिलाई वाले फुटबाल हुआ करते थे। खेलते खेलते सिलाई टूट जाती तो भीतर का लाल-लाल ब्लैडर दिखने लगता। दोनों दृश्यों में गजब की समानता हुआ करती थी। किसी की पैंट के बटन खुले रह जाते, तो उसे Óपोस्ट ऑफिस' कहते थे। खुदा न खास्ता किसी की चड्डी दिख जाती तो ऐसा लगता था जैसे भरे बाजार उसे नंगा कर दिया गया हो। किन्तु अब जमाना बदल गया है। अब अंत:वस्त्र खुद ही बाहर झांकने लगे हैं। पहले आवारा टाइप के लड़कों की कमीज के बटन खुले रहते थे और बंडी दिखाई देती थी। फिर बंडी ही गायब हो गई। अब चड्डी की बारी है। आधुनिक चड्डी का न केवल रंग बल्कि उसका ब्रांड भी दिखाई दे जाता है। नीचे तंग लो वेस्ट जीन्स और ऊपर शॉर्ट शर्ट। कमर और नाभी के साथ ही चड्डी का इलास्टिक भी दिखाई देना चाहिए। अब जब इलास्टिक दिखाई दे रहा हो तो चड्डी की उपेक्षा भी नहीं की जा सकती। लिहाजा चड्डी का ब्रांड एक बड़ा फैक्टर हो गया है। दोस्तों के बीच जब इसकी चर्चा छिड़ी तो एक ने तपाक से कहा, 'चड्डी से इंसान की औकात पता लगती है। गाड़ी किसी की भी मांगी जा सकती है। दोस्तों में शर्ट और जीन्स की अदला बदली कॉमन है। पर चड्डी के मामले में उधारी नहीं चलती। यह सिर्फ भीतर का नहीं बल्कि बेहद निजी मामला होता है। लिहाजा यदि किसी की वास्तविक औकात मालूम करनी हो तो उसकी चड्डी को ही देखना होगा।Ó काश! बैंक की ऋण शाखा को इस फंडे का पता होता। वैसे अंत:वस्त्रों के प्रदर्शन में केवल लड़के ही आगे हैं, ऐसा नहीं है। कभी ब्रा के स्ट्रैप्स को ब्लाउज में छिपाने के लिए सेफ्टीपिन का इस्तेमाल करने वाली महिलाएं अब उसकी डोरी को गले में पहना करती हैं। ठीक उसी तरह जिस तरह टूटी बांह को सहारा देने के लिए प्लास्टर को लटकाया जाता है। लोग समझते हैं कि यही तरक्की है। यह उठते हुए जीवन स्तर की निशानी है। पर कहानी कुछ और है। यह मार्केटिंग है। अकसर चर्चा उन्हीं चीजों की होती है जो दिखाई देती हैं। लोग अंडरगारमेन्ट्स पर कम खर्च करते थे, या यूं कहें कि शॉपिंग लिस्ट में वह लास्ट आईटम होता था। वह कैसा भी हो, काम चल जाता था। उसे मोड़ माड़कर रखा जाता था। किसी और कपड़े के नीचे फैलाकर सुखाया जाता था। पर अब वह जमाना लद गया। अब उसका सुन्दर व ब्रांडेड होना जरूरी है। क्या पता कब कहां उसके प्रदर्शन की नौबत आ जाए। क्या पता कब कौन चुपचाप हमारी औकात नाप जाए।
photo journalist from chhattisgarh. Worked for the Navabharat in Orissa as bureau chief. Presently with the Haribhoomi Super Central Desk.
Sunday, April 1, 2012
बाहर झांकते अंत:वस्त्र
अंत:वस्त्र नहीं समझते? अरे भई.. अंडरगारमेन्ट्स। हमारे समय में किसी की चड्डी का रंग दिख जाता था तो पूरे क्लास में हल्ला हो जाता था... 'नीली चड्डी पहना है.. पीली चड्डी पहना है...।Ó खेलकूद के दौरान किसी के पैंट की सीवन उधड़ जाती, तो हम कहते Óब्लैडर दिख रहा हैÓ। उन दिनों हाथ की सिलाई वाले फुटबाल हुआ करते थे। खेलते खेलते सिलाई टूट जाती तो भीतर का लाल-लाल ब्लैडर दिखने लगता। दोनों दृश्यों में गजब की समानता हुआ करती थी। किसी की पैंट के बटन खुले रह जाते, तो उसे Óपोस्ट ऑफिस' कहते थे। खुदा न खास्ता किसी की चड्डी दिख जाती तो ऐसा लगता था जैसे भरे बाजार उसे नंगा कर दिया गया हो। किन्तु अब जमाना बदल गया है। अब अंत:वस्त्र खुद ही बाहर झांकने लगे हैं। पहले आवारा टाइप के लड़कों की कमीज के बटन खुले रहते थे और बंडी दिखाई देती थी। फिर बंडी ही गायब हो गई। अब चड्डी की बारी है। आधुनिक चड्डी का न केवल रंग बल्कि उसका ब्रांड भी दिखाई दे जाता है। नीचे तंग लो वेस्ट जीन्स और ऊपर शॉर्ट शर्ट। कमर और नाभी के साथ ही चड्डी का इलास्टिक भी दिखाई देना चाहिए। अब जब इलास्टिक दिखाई दे रहा हो तो चड्डी की उपेक्षा भी नहीं की जा सकती। लिहाजा चड्डी का ब्रांड एक बड़ा फैक्टर हो गया है। दोस्तों के बीच जब इसकी चर्चा छिड़ी तो एक ने तपाक से कहा, 'चड्डी से इंसान की औकात पता लगती है। गाड़ी किसी की भी मांगी जा सकती है। दोस्तों में शर्ट और जीन्स की अदला बदली कॉमन है। पर चड्डी के मामले में उधारी नहीं चलती। यह सिर्फ भीतर का नहीं बल्कि बेहद निजी मामला होता है। लिहाजा यदि किसी की वास्तविक औकात मालूम करनी हो तो उसकी चड्डी को ही देखना होगा।Ó काश! बैंक की ऋण शाखा को इस फंडे का पता होता। वैसे अंत:वस्त्रों के प्रदर्शन में केवल लड़के ही आगे हैं, ऐसा नहीं है। कभी ब्रा के स्ट्रैप्स को ब्लाउज में छिपाने के लिए सेफ्टीपिन का इस्तेमाल करने वाली महिलाएं अब उसकी डोरी को गले में पहना करती हैं। ठीक उसी तरह जिस तरह टूटी बांह को सहारा देने के लिए प्लास्टर को लटकाया जाता है। लोग समझते हैं कि यही तरक्की है। यह उठते हुए जीवन स्तर की निशानी है। पर कहानी कुछ और है। यह मार्केटिंग है। अकसर चर्चा उन्हीं चीजों की होती है जो दिखाई देती हैं। लोग अंडरगारमेन्ट्स पर कम खर्च करते थे, या यूं कहें कि शॉपिंग लिस्ट में वह लास्ट आईटम होता था। वह कैसा भी हो, काम चल जाता था। उसे मोड़ माड़कर रखा जाता था। किसी और कपड़े के नीचे फैलाकर सुखाया जाता था। पर अब वह जमाना लद गया। अब उसका सुन्दर व ब्रांडेड होना जरूरी है। क्या पता कब कहां उसके प्रदर्शन की नौबत आ जाए। क्या पता कब कौन चुपचाप हमारी औकात नाप जाए।
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