Sunday, April 1, 2012

पर्यावरण पर हाय-हाय


पर्यावरण के नाम पर देश के साथ ही दुनिया भर में काफी हंगामा हो रहा है। लोग पर्यावरण बचाने के लिए भोजन छोड़ रहे हैं। प्रदर्शन कर रहे हैं। एनजीओ बना और चला रहे हैं। सरकारें करोड़ों रुपए के पेड़ लगवा रही है। तरह-तरह के चोंचले किए जा रहे हैं किन्तु ये सभी ठठकर्म साबित हो रहे हैं। अर्थात इनका कोई फायदा होता हुआ नहीं दिख रहा। विदेश कभी गया नहीं इसलिए पता नहीं, वहां के लोग क्या करते हैं किन्तु भारत अपने आप में तीन दर्जन देशों के समूह के बराबर है। यहीं अपने आस-पास जो कुछ देखता हूँ, उसी की चर्चा करता हूँ। हमारे यहां का वनवासी अपने घर के आसपास के पर्यावरण की चिंता खुद करता है किन्तु वन विभाग सबसे ज्यादा उसीको परेशान करता है। वनवासी को पता है कि सल्फी, महुआ, चार, इमली, छिन्द के पेड़ों से ही उसके जीवन में छांव है, भोजन है, पानी है। उसे प्रकृति को समझने के लिए स्कूल कालेज की पढ़ाई की जरूरत ही नहीं। दूसरी ओर शहरी जमात है। सैकड़ों वर्गकिलोमीटर में पसरे हुए कंक्रीट के जंगलों के बीच मिट्टी तक नहीं है, पेड़ों की तो बात ही क्या करें। ऐसे लोग जो पेड़ों के लिए एक इंच जगह नहीं छोडऩा चाहते पर्यावरण का रोना रोते हैं। जहां बैठकर ये बहस करते हैं, उन कमरों के दरवाजे शीशम के होते हैं, कम से कम चौखट तो बीजा का होता ही है। जिस फर्नीचर पर ये बैठते हैं वे भी शीशम के होते हैं। इनके घर के हर कोने में बेशकीमती लकडिय़ों के फर्नीचर और सजावटी सामान मिल जाएंगे। जिनके पास पैसे हैं वे हवन पूजन भी कराते रहते हैं। हवन पूजन के लिए भी लकडिय़ां लगती हैं। यही नहीं हम अपने सगों की लाशों को सवा चार मन लकड़ी से जलाते हैं। यह सबकुछ तब तक तो ठीक था जब तक देश की आबादी सीमित थी। किन्तु अब पासा पलट गया है। शहरों के शवदाह गृहों से अकसर यह खबर आती है कि वहां लाश जलाने के लिए लकडिय़ां कम पड़ रही हैं या हैं ही नहींं। सवा अरब की जनसंख्या वाले इस देश में प्रतिदिन लाखों की संख्या में लोग मरते हैं और पैदा भी होते हैं। इतने लोगों के दाह संस्कार के लिए या तो हम पेड़ों के सूख जाने की मन्नत मांगें या फिर हरे भरे पेड़ों को काटकर सूखने दें। दूसरा नाटक स्कूलों का है। कम्प्यूटर के जमाने में भी लगातार किताबों और कापियों की जरूरत बढ़ती ही जा रही है। इसकी पूर्ति के लिए टनों कागज चाहिए। नया शिगूफा किताबों के साथ सीडी बेचने की है। किताब भी सीडी में हो तो मजा आ जाए। तीसरी बीमारी भी इसीसे जुड़ी है। जो काम लोग घर पर बैठकर इंटरनेट के जरिए आनलाइन कर सकते हैं, उसके लिए भी दफ्तर खुले हुए हैं। यदि आनलाइन कार्यसंस्कृति को बढ़ावा दिया जाए तो शायद सड़कों से कम से कम आधे वाहन गायब ही हो जाएं। पेट्रोल और पर्यावरण दोनों की जान छूटे। पर दफ्तर न हो तो नमस्ते भी न हो। फिर बॉस के इगो का क्या हो? शुरुआत हुई है, पर जड़ समाज में परिवर्तन भी धीरे-धीरे आते हैं। लिहाजा परिवर्तन आते तक दो चार पीढिय़ां तो गुजर ही जाएंगी।

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