Tuesday, April 3, 2012

कौन कहता है महंगा है पेट्रोल?


कौन कहता है महंगा है पेट्रोल?
रोना एक तरह का शौक है। वास्तव में आदमी जिन्दगी में सिर्फ दो बार रोता है। पहली बार पैदा होने के बाद अपना गला और फेफड़ा साफ करने के लिए और दूसरी बार गलत लड़की से शादी करने के बाद। इसके अलावा वह जब भी रोता है... उसमें सिर्फ और सिर्फ दिखावा और फरेब होता है। महंगी होती शिक्षा, चिकित्सा और पेट्रोल को लेकर रोना भी इसी तरह का रोना है। आज के तकरीबन अखबारों के पहले पन्ने पेट्रोल कीमतों पर रंगे हुए थे। खबर थी, यदि पेट्रोल के दाम नहीं बढ़ाए गए तो पेट्रोलियम कंपनियां सप्लाई रोक देंगी। बेवक्त का यह हल्ला समझ में नहीं आता। यह प्रायोजित तो नहीं? बचपन में जब भी हम स्कूल से कोई शरारत करके लौटते थे तो हमारा भरसक प्रयास होता था कि स्कूल की चर्चा घर पर बिल्कुल न हो। हम मुद्दे पैदा कर लेते थे। ऐसे मुद्दे जो सबको बिजी कर दे। भूख लगी है से लेकर चोट लगी है तक, यह कुछ भी हो सकता था। होमवर्क नहीं किया। स्कूल में पिटाई होगी। स्कूल जाने से बचने के लिए सिरदर्द और पेटदर्द का बहाना आम था। पेट्रोल कीमतों पर हो रहे बवाल को देखकर भी कुछ ऐसा ही महसूस होता है। देश भर के स्कूलों में भर्तियां चल रही हैं। प्राइवेट स्कूल इस साल भी फीस बढ़ाए बैठे हैं। जमकर कैपिटेशन फीस वसूल रहे हैं। आरटीई का धनिया बो रहे हैं। एक महीने तक इसके विरोध में हल्ला होगा फिर एडमिशन हो जाएंगे और सबकुछ झाग की तरह बैठ जाएगा। बहरहाल यहां चर्चा पेट्रोल की हो रही थी। पेट्रोल कंपनियां हमेशा एक ही सुर में रोती हैं- 'घाटा लग रहा है.. घाटा लग रहा है..Ó उन्होंने धमकी दी है कि रेट नहीं बढ़ाया तो सप्लाई रोक देंगे। सप्लाई रोक देंगे तो खाएंगे क्या? उनके अफसरों-कर्मचारियों का वेतन कौन भरेगा? यह कोई सोने चांदी की दुकान है कि बंद किए पड़े रहो। बहरहाल, यहां चर्चा पेट्रोल की कीमतों की हो रही थी। पेट्रोल की कीमतें काफी पहले सरकारी नियंत्रण से आजाद हो चुकी हैं। वे कीमतें खुद तय कर सकते हैं। वे इस बात की फिक्र बिल्कुल न करें कि जनता क्या सोचेगी। वैसे भी पेट्रोलियम कंपनियों को कौन सा चुनाव लडऩा है। और फिर देश में पेट्रोल महंगा कहां है? यदि पेट्रोल महंगा होता तो क्या गाडिय़ों की बिक्री हर साल नए रिकार्ड बनाती? क्या जनता एवरेज वाली गाडिय़ों को दरकिनार कर कम एवरेज वाली सेल्फ स्टार्ट गाडिय़ां खरीदती? युवा तो इन सबसे एक कदम आगे है। उन्हें अब हाई परफारमेन्स बाइक चाहिए - एवरेज भले ही 10 किलोमीटर प्रति लीटर हो। यदि देश में पेट्रोल महंगा होता तो क्या लोग आधा किलोमीटर दूर स्कूल जाने के लिए गाडिय़ों का इस्तेमाल करते। गाडिय़ों के नाम देखिए -प्ले•ार, डियो, वेगो, स्टनर... ये सब शौक हैं। और शौक पूरा करते समय कीमत नहीं देखी जाती। इसलिए टेंशन मत ले... खा-खुजा बत्ती बुझा... और चुपचाप सो जा! देश की सरकारें साठ साल से ऐसा ही कर रही हैं।

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