Thursday, April 5, 2012

महंगी शिक्षा हमारा शौक


आदमी पैसे कमाता है तो अपना जीवन स्तर ऊपर उठाने की कोशिश करता है। प्लास्टिक की कुर्सियां गायब हो जाती हैं सोफे लग जाते हैं। चारपाई और दीवान के बजाय डबल बेड और वार्डरोब आ जाता है। रोटी सब्जी खाने के बजाय ब्रेकफास्ट, लंच और डिनर करने लगता है। खाने से पहले एपेटाइजर, स्टार्टर और बाद में डेसर्ट की तलब हो जाती है। इलाज की नौबत आने से पहले ही हेल्थ चेकअप पर खर्च करने लगता है। वह अपने बच्चे को बेहतर से बेहतर न्यूट्रिशन (पोषण) देना चाहता है। ऐसे में स्कूलों को कैसे साइड किया जा सकता है। स्कूल भी उसे सबसे अच्छा चाहिए। अच्छे स्कूल की उसकी परिभाषा भी अजीब है। अच्छे स्कूल का मतलब शानदार बिल्डिंग, एसी क्लासरूम, सीबीएसई का सिलेबस और हर रूट पर बसों से है। ऐसे स्कूलों को वह मुंहमांगी रकम देने को तैयार हो जाता है। फिर भले ही उसे तीन की बजाय दो रोटियों से काम चलाना पड़े। फटी बनियान और घिसी चप्पलें पहननी पड़ें। जहां तक परफारमेन्स का सवाल है तो यहां सोच में थोड़ा सा लोचा है। डीपीएस के नतीजे सबसे अच्छे क्यों हैं? आसान सा जवाब है कि वहां एडमिशन चुन-चुन कर अच्छे बच्चों को ही दिया जाता है। यहां पढऩे वाले सभी बच्चे संपन्न परिवारों से हैं (न होते तो यहां एडमिशन लेने का सपना भी न आता)। वे जितने चाहे ट्यूशन लगा सकते हैं, टीचिंग एड (शिक्षण सामग्री) खरीद सकते हैं। यदि इन स्कूलों का मुकाबला उन स्कूलों से करें जहां गधे-घोड़े सबको एडमिशन दिया जाता है और इसके बाद भी 100 परसेन्ट रिजल्ट आता है तो डीपीएस की टीचिंग क्वालिटी फीकी पड़ जाती है। इन छोटे छोटे स्कूलों में ऐसे बच्चे आते हैं जिनके माता पिता ज्यादा पढ़े लिखे नहीं हैं। पढ़े लिखे हैं भी तो उन्हें अंग्रेजी के नाम पर सिर्फ गुडमार्निंग सर और थैंकयू कहना आता है। ये अपने बच्चे की ऊंची ट्यूशन नहीं लगवा पाते। ये बच्चे पूरी तरह स्कूल के भरोसे होते हैं। ऐसे बच्चे जब 60-70 परसेन्ट माक्र्स के साथ पास होते हैं तो उनकी पीठ थपथपाने को मन करता है। ऐसे स्कूलों और वहां के टीचर्स को गोल्ड मेडल देने की इच्छा होती है। पर एक गरीब पत्रकार के मन में उठे इन नपुंसक विचारों का कोई मोल नहीं। जहां तक ट्विन सिटी का सवाल है तो यहां सभी तरह के स्कूल मौजूद हैं। यहां डीपीएस है, केपीएस है, शंकरा है, एमजीएम है, गुरुनानक है, शकुंतला है, डीएवी है, केएचएम है, महर्षि है। बूफे पार्टी सजी हुई है, जिसकी जो मर्जी हो खा सकता है। पर जब भूखा ऐसी पार्टी में जाता है तो वह पनीर और मलाई कोफ्ता ही खाता है। मिठाई और आईसक्रीम खाकर अपना स्टेटस ऊंचा करता है। वह जानबूझकर महंगे स्कूल में जाता है। वहां एसी क्लासरूम की फीस भरता है। जब वह महंगी शिक्षा का रोना रोता है तो हंसी आती है। देने वाला दे रहा है तो लेने वाले का क्या दोष? सरकार को कष्ट है तो क्यों नहीं वह खुद सीबीएसई के इंग्लिश मीडियम स्कूल खोलती?

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