Saturday, October 16, 2010

हम जू के जानवर नहीं

वृद्धजन दिवस, बुजुर्ग दिवस, सीनियर सिटिजन डे। नाम चाहे जितना भी शालीन हो, इसमें सम्मान लेशमात्र भी नहीं है। कर्मजीवन से रिटायर होने मात्र से क्या हम इंसान नहीं रहे? इंसान एक सामाजिक प्राणी है। वह परिवार चाहता है, पड़ोसी चाहता है। नाते रिश्तेदारों से ही उसकी दुनिया बसती है। अब जबकि हमारे पांव कब्र में लटके हुए हैं, तब लोग हमसे उम्मीद करते हैं कि हम अपना स्वभाव बदलें। यह सम्भव नहीं है। हम पके बांस हैं। पके बांस की खपच्चियों को मोड़कर आकार नहीं दिया जा सकता। न टोकनियां बनाई जा सकती हैं और न ही चटाई। आप कच्चे बांस हो, आप क्यों नहीं खुद को बदलते? हमारी पटरी नहीं बैठती। हम बदल नहीं सकते। अब हम कमाते नहीं हैं इसलिए घर के मुखिया नहीं हैं। मन नहीं लगा तो निकल कर सड़क पर आ गए। किसी ने व्यवस्था कर दी तो वृद्धाश्रम या सियान सदन चले आए। अब तो ऐसा इंतजाम होने लगा है कि लोग रिटायरमेंट के बाद अकेले रहने की तैयारी एडवांस में कर रहे हैं। कोई सियान सदन में बुकिंग करा रहा है तो कोई वृद्धाश्रम में। हमें अच्छा बुढ़ापा नहीं मिला, हमारी बदकिस्मती। पर हम जानवर भी नहीं हैं। हम दया के पात्र भी नहीं है। इसलिए हमारा तमाशा बनाना बंद करो। लोग अपने बच्चों को मैत्रीबाग में जानवर दिखाने ले जाते हैं। कुछ लोग अपने बच्चों को बूढ़ा दिखाने के लिए सियान सदन ला रहे हैं। क्या उम्मीद करते हैं हमसे? हम रोते, बिलबिलाते या तड़पते हुए मिलें। ताकि तुम्हारे बच्चे को यह समझ में आए कि सियान सदन का अकेलापन कितना कष्टकारी है, ताकि तुम्हारा बुढ़ापा बेहतर हो। या फिर हम इतना खुश होकर दिखाएं कि तुम्हारा बच्चा अभी से तुम्हारी कल्पना किसी वृद्धाश्रम में करने लगे? बच्चे को बूढ़ा दिखाने के लिए उसे सियान सदन लेकर आने की जरूरत नहीं है। उसे उसका दादा -दादी या नाना-नानी दिखाओ। उसे बताओ कि ये तुम्हारे अपने मम्मी-पापा हैं जिन्होंने कभी अपने कंधे पर बिठाकर तुम्हें दशहरा दिखाया था। आज ये अशक्त हैं। यह हर किसी के जीवन का नियम है। जो आज बच्चा है, कल जवान होगा और फिर जीवन की संध्या में बूढ़ा होगा। यदि इन सबमे तालमेल बना रहा तो मनुष्य जीवन सार्थक होगा। यदि समर्थ जवानी ने बच्चों को पीटना और बूढ़ों को हकालना बंद नहीं किया तो समझ लो कि इंसानों की बस्ती की उलटी गिनती शुरू हो चुकी है।

बुढ़ऊ को सीख

ऐ बुढ़ऊ! ले चा पी। सुबह-सुबह बहू गिलास में काली चाय लेकर आई थी। बुढ़ऊ ने चुपचाप चाय ले ली और चुसकने लगा। वह मन ही मन सोच रहा था, बहू कितना ख्याल रखती है। दूध वाली चाय पीने से कफ की शिकायत बढ़ सकती है। पेट में अफारा हो सकता है। गैस बन सकती है। तभी तो बहू फ्रिज में दूध रहते हुए भी उसके लिए अलग से काली चाय बनाकर लाई है। दोपहर के भोजन में भी सूखी रोटी और घीये की सब्जी देखकर वह प्रसन्न हो जाता है। बहू तो बेटी से भी ज्यादा ख्याल रखती है। उसे पता है कि बुढ़ापे में ज्यादा प्रोटीन खाना ठीक नहीं होता। किडनियां कमजोर हो गई हैं। ज्यादा दाल, घी, पनीर खाना मुसीबत को निमंत्रण देता है। गठिया की शिकायत बढ़ जाती है। बूढ़ा खुशी-खुशी सब्जी रोटी खाता है और बाहर पेड़ के नीचे बिछी खटिया पर जाकर बैठ जाता है। यहां पंछियों का कलरव है। सड़क पर आते-जाते लोग दिख जाते हैं। कोई राम-राम काका कहता है। बच्चे भी दादाजी को नमस्ते करना नहीं भूलते। कितना सुकून है यहां। मंद समीर के झोंके में न जाने कब आंख लग जाती है। स्कूल से लौटते ही बच्चे दादाजी को उठा देते हैं। चाय का वक्त हो चला है। बहू बरामदे में इंतजार कर रही है। कुल्ला करके वह चाय पीने पहुंचते हैं। शुगर फ्री बिस्किट के साथ काली चाय चुसकते हैं। फिर दूध का डिब्बा-कूपन लेकर सैर पर निकल जाते हैं। वहां उनकी उम्र के और भी लोग आते हैं। सब मिलकर बातें करते हैं। लोग अपनी-अपनी शिकायतों को पिटारा खोलकर बैठ जाते हैं। बहू-बेटों की लानत मलामत करते हैं और अपना बुढ़ऊ बैठकर मुस्कुराता है। लोग कहते हैं, ‘तुम तो बहुत सुखी हो। तुम्हारी बहू तुम्हारा कितना ख्याल रखती है। घर में शांति है। हमारे यहां तो दिन भर किचकिच होती है। बहू ताने देती है। बेटा भी ऊंची आवाज में बातें करता है। अकसर डांट डपट देता है।’ बुढ़ऊ हंसता है। कहता है, ‘सब मन का फेर है। कल को मैं काली चाय की, सूखी रोटी की, शाम को दूध लाने की ड्यूटी की, शिकायत करने बैठूं तो हमारे यहां भी किच किच होगी। हर चीज का, हर हरकत का उजला पक्ष देखो, खुद भी सुखी रहोगे और बहू भी सुखी रहेगी। बेटा वैसे ही तो नहीं चिल्लाता। जब तुम्हारी किचकिच से बहू का पारा सातवें आसमान पर पहुंचता है और वह बेटे की ऐसी तैसी फेरती है, तभी वह चिड़चिड़ाता है। बहू आत्महत्या की धमकी दे सकती है, फांसी लगाने की कोशिश कर सकती है, घर छोड़ कर जाने की चेतावनी दे सकती है। वह डर जाता है। उसने तुम्हारी उंगली पकड़कर चलना सीखा है। मार भी खाई है और जिद भी की है। तुम उसके अपने हो। अपनी खिसियाहट, झल्लाहट इसलिए वह तुम पर उतारता है। वह इसे अपना अधिकार समझता है। यही तुम्हारी जीत है। वह आज भी तुम्हारा है।’

यह है हिन्दुस्तान

अयोध्या मामले में अदालत की तीन सदस्यीय बेंच ने अपना फैसला सुना दिया। जैसा कि उम्मीद की जा रही थी वैसे कुछ भी नहीं हुआ। लोगों ने शांतिपूर्वक अदालत के फैसले को स्वीकार किया और सबकुछ जैसा चल रहा था, वैसा ही चलता रहा। अदालत ने यहां एक टिप्पणी की थी कि कोई भी इस पर प्रतिक्रिया मत करे। बस इतना ही काफी साबित हुआ। उन्मादियों के मुंह सिल गए। देश की जनता तो हमेशा से ही भाईचारे के साथ रहती आई है। जिन्हें भीड़ जुटानी होती है, मुद्दे वही तलाशते हैं। उनके मुंह पर टेप चिपकाकर अदालत ने एक बार फिर यह साबित करने का मौका दे दिया कि आम नागरिक दिल से, संस्कृति से, सभ्यता से एक हैं। कहते हैं, जब-जब संकट आता है - एका तब तब दिखता है। संकट के समय में समूचा भारत एक परिवार की तरह गुंथ गया। एक विशाल परिवार में छोटे-मोटे झगड़े-झंझट स्वाभाविक हैं। किन्तु संकट में एक होने की शक्ति ही उसकी ताकत होती है। भारतवासियों ने इसी एकजुटता और तटस्थता का परिचय देकर इसे एक बार फिर साबित कर दिया है। भारतीयों की इस एकजुटता को अवश्य ही दुनिया हसरत भरी निगाहों से देख रही होगी। क्योंकि दुुनिया हमारी इसी ताकत से डरती है। अवाम की एकता ही राष्ट्र को मजबूत बनाती है। यही उसकी असली ताकत है। हथियार और साजोसामान तो साधन मात्र हैं। लोगों को आपस में लड़ाकर एक तरफ जहां हथियारों के सौदागर मुनाफा कमाते हैं वहीं विघ्नसंतोषी तत्व इसपर अपनी रोटी सेंकते हैं। भारत की इस ताकत का स्वाद एक बार अंग्रेजों ने चखा था। सशस्त्र क्रांतिकारी उनकी नाक में दम अवश्य करते थे किन्तु उसके खिलाफ रणनीति बनाई जा सकती थी। उनकी धरपकड़ की जा सकती थी। उन्हें फांसी पर लटकाया जा सकता था। किन्तु जब पूरा देश महात्मा गांधी की पुकार पर एकजुट हो गया तो अंग्रेजों को संकेत मिल गया कि यहां अब बंदूक का जोर नहीं चलेगा। आप 33 करोड़ लोगों को बंदूकों से नहीं जीत सकते। और आज तो हम 135 करोड़ हैं। हमारे देश की हजारों प्रतिभाएं विदेशों में अपने दम पर अपना लोहा मनवा रहे हैं। हम जब भी हारे हैं फूट से हारे हैं। यदि फूट डालने वालों को हम पहचान लें तो क्या पाकिस्तान, क्या चीन और क्या अमरीका, कोई भी हमारी तरफ नजर उठाकर नहीं देख सकेगा। संभवत: हमारी यही सोई हुई शक्ति दोबारा जाग उठी है। दुनिया भर के चिंतकों का मानना है कि भारत एक बार फिर विश्व गुरु होगा, दुनिया उसके कदमों में होगी। इसकी शुरुआत गुरुवार को हो चुकी है। हमने दुनिया के आगे एक आदर्श रखा है। हमें इसे बनाए रखना होगा।

क्या मतलब है बस का

कहते हैं सामूहिक सवारी सस्ती पड़ती है। इसीलिए शहरों में बस सर्विस होती है। किन्तु छत्तीसगढ़ में यह कहानी उलटी साबित हो रही है। छत्तीसगढ़ में बस के बजाय निजी वाहन से यात्रा करना सस्ता पड़ता है। दुपहिया वाहन से यदि दो लोग दुर्ग से रायपुर जाते हैं तो प्रति व्यक्ति 18 रुपए का खर्च आता है। यदि कार से चार लोग दुर्ग से रायपुर एसी चलाकर जाते हैं तो प्रति व्यक्ति खर्च 22 से 26 रुपए आता है। यदि वह भेड़ बकरियों की तरह आधी सीट में घुटनों को अगली सीट की पुश्त से छीलते हुए रायपुर जाता है तो प्रति व्यक्ति खर्च 28 से 35 रुपए आता है। यानी बस वाला सिर्फ दो चीजों का फायदा उठाता है- या तो आपके पास अपना वाहन नहीं है, या फिर आपमें फोरलेन पर गाड़ी चलाने का हौसला नहीं है। यदि इसका नाम पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम है तो वाकई छत्तीसगढ़ ने बहुत तरक्की की है। यहां प्रति व्यक्ति आय में इतना इजाफा हो चुका है कि 10-20 रुपए अब कोई मायने नहीं रखते। यह बात और है कि एक-एक रुपए के लिए मिनी बसों के कंडक्टर गरीबों की इज्जत उतार रहे हैं। उन्हें बीच सड़क गाड़ी से उतार रहे हैं। माता पिता की गोद में जबरदस्ती बैठाए गए बच्चों का भी किराया वसूल रहे हैं। जिन लोगों ने कभी मिनी बस में सफर किया है उन्हें पता है कि इन बसों में गोद में बच्चा लेकर बैठना कितना कष्टकर है। जिन सीटों के बीच घुटनों के लिए जगह नहीं होती वहां गोद में बच्चा केवल वही निरीह बैठा सकता है जिसके मुंह में जुबान नहीं होती। उसे सरकार मारती है, पुलिस मारती है, नक्सली मारते हैं, बस वाले मारते हैं, ठेकेदार मारते हैं। वह केवल पिटने और मरने के लिए ही पैदा हुआ है। इस व्यवस्था का विरोध करना मना है। विरोध करने वाले को पहले तो बस वाले ही लात घूंसों से लहूलुहान कर देते हैं। फिर पुलिस डंडे से मारती है। अदालतों में केवल टाइमपास होता है। गरीब आदमी, रोजी मजदूर वहां जाना अफोर्ड नहीं कर सकता। हां! यही लोकतंत्र है। खास लोगों का लोकतंत्र। इसमें आम लोगों की गिनती नहीं होती। जिनकी गिनती नहीं होती उनका कोई तंत्र नहीं होता। वे तो भिखारी हैं। सरकारी आंकड़ा बताता है कि प्रदेश में 34 लाख भिखारी परिवार हैं जिन्हें सरकार खाद्यान्न सुरक्षा देती है। ये लोग महीने में दो चार सौ रुपए का राशन तक नहीं खरीद सकते। ऐसे लोग रोजी मजदूरी के लिए शहर आना चाहते हैं। इलाज के लिए सदर अस्पताल आना चाहते हैं किन्तु इनके पास बस का भाड़ा ही नहीं है। सरकारी बस सेवा पहले ही हाशिए पर डाली जा चुकी है। अब तो शराब की तरह बसों का भी माफिया होने लगा है। तभी तो कहते हैं - सबले बढ़िया छत्तीसगढ़िया, चाहो जहां से नोचो आवाज नहीं करता।