Saturday, October 16, 2010

क्या मतलब है बस का

कहते हैं सामूहिक सवारी सस्ती पड़ती है। इसीलिए शहरों में बस सर्विस होती है। किन्तु छत्तीसगढ़ में यह कहानी उलटी साबित हो रही है। छत्तीसगढ़ में बस के बजाय निजी वाहन से यात्रा करना सस्ता पड़ता है। दुपहिया वाहन से यदि दो लोग दुर्ग से रायपुर जाते हैं तो प्रति व्यक्ति 18 रुपए का खर्च आता है। यदि कार से चार लोग दुर्ग से रायपुर एसी चलाकर जाते हैं तो प्रति व्यक्ति खर्च 22 से 26 रुपए आता है। यदि वह भेड़ बकरियों की तरह आधी सीट में घुटनों को अगली सीट की पुश्त से छीलते हुए रायपुर जाता है तो प्रति व्यक्ति खर्च 28 से 35 रुपए आता है। यानी बस वाला सिर्फ दो चीजों का फायदा उठाता है- या तो आपके पास अपना वाहन नहीं है, या फिर आपमें फोरलेन पर गाड़ी चलाने का हौसला नहीं है। यदि इसका नाम पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम है तो वाकई छत्तीसगढ़ ने बहुत तरक्की की है। यहां प्रति व्यक्ति आय में इतना इजाफा हो चुका है कि 10-20 रुपए अब कोई मायने नहीं रखते। यह बात और है कि एक-एक रुपए के लिए मिनी बसों के कंडक्टर गरीबों की इज्जत उतार रहे हैं। उन्हें बीच सड़क गाड़ी से उतार रहे हैं। माता पिता की गोद में जबरदस्ती बैठाए गए बच्चों का भी किराया वसूल रहे हैं। जिन लोगों ने कभी मिनी बस में सफर किया है उन्हें पता है कि इन बसों में गोद में बच्चा लेकर बैठना कितना कष्टकर है। जिन सीटों के बीच घुटनों के लिए जगह नहीं होती वहां गोद में बच्चा केवल वही निरीह बैठा सकता है जिसके मुंह में जुबान नहीं होती। उसे सरकार मारती है, पुलिस मारती है, नक्सली मारते हैं, बस वाले मारते हैं, ठेकेदार मारते हैं। वह केवल पिटने और मरने के लिए ही पैदा हुआ है। इस व्यवस्था का विरोध करना मना है। विरोध करने वाले को पहले तो बस वाले ही लात घूंसों से लहूलुहान कर देते हैं। फिर पुलिस डंडे से मारती है। अदालतों में केवल टाइमपास होता है। गरीब आदमी, रोजी मजदूर वहां जाना अफोर्ड नहीं कर सकता। हां! यही लोकतंत्र है। खास लोगों का लोकतंत्र। इसमें आम लोगों की गिनती नहीं होती। जिनकी गिनती नहीं होती उनका कोई तंत्र नहीं होता। वे तो भिखारी हैं। सरकारी आंकड़ा बताता है कि प्रदेश में 34 लाख भिखारी परिवार हैं जिन्हें सरकार खाद्यान्न सुरक्षा देती है। ये लोग महीने में दो चार सौ रुपए का राशन तक नहीं खरीद सकते। ऐसे लोग रोजी मजदूरी के लिए शहर आना चाहते हैं। इलाज के लिए सदर अस्पताल आना चाहते हैं किन्तु इनके पास बस का भाड़ा ही नहीं है। सरकारी बस सेवा पहले ही हाशिए पर डाली जा चुकी है। अब तो शराब की तरह बसों का भी माफिया होने लगा है। तभी तो कहते हैं - सबले बढ़िया छत्तीसगढ़िया, चाहो जहां से नोचो आवाज नहीं करता।

1 comment:

  1. आप हमेशा पते की बात लिखते हैं। मेरी तरह न जाने कितने लोगों ने इस समस्या का सामना किया होगा। जब मेरे पास बाइक नहीं थी तो ऐसे ही जाना पड़ता था पर अब तो 10 रु. ज्यादा लगे तो भी बाइक पर ही जाना पसंद करता हूँ।

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