photo journalist from chhattisgarh. Worked for the Navabharat in Orissa as bureau chief. Presently with the Haribhoomi Super Central Desk.
Monday, August 9, 2010
आध्यात्म की दुकान
आध्यात्म अब फकीरों की जागीर नहीं रही। अब बड़े-बड़े आदमी कर्त्तव्यों को छोड़ आध्यात्म की चर्चा करने लगे हैं। स्कूलों में पूरी छुट्टी के बाद शाला निदेशक भूख से बिलबिला रहे बच्चों को पका रहे हैं। अपनी तकलीफों को लेकर वरिष्ठ अधिकारियों के पास जाने वाले अधीनस्थ कर्मचारियों को पकाया जा रहा है। समस्या का समाधान न ढूंढकर समस्या की आध्यात्मिक विवेचना की जा रही है। वंचित, पीड़ित, शोषित लोगों को समझाया जा रहा है कि सभी उंगलियां बराबर नहीं होतीं। जिस तरह उंगलियां छोटी-बड़ी होती हैं उसी तरह समाज में लोग ऊंचे-नीचे होते हैं। इसे कानून बनाकर नहीं बदला जा सकता। अंग्रेजों के जमाने का हवाला दिया जा रहा है जब जाति पूछकर ही नौकरियां दी जाती थीं। सबसे ज्यादा मुसीबत पत्रकारों की है। प्रवचनकारों का प्रवचन तो वे सुन भी लेते थे किन्तु प्रशासनिक एवं पुलिस के अधिकारियों का प्रवचन हजम करना मुश्किल हो रहा है। जाते दो मिनट के लिए हैं और प्रवचन सुनकर दो घंटे बाद खाली हाथ निकलना पड़ता है। फुर्सतिया पत्रकारों की बात और है किन्तु जिन्हें आम पाठकों के लिए खबरें लिखनी हो उन्हें यह भारी पड़ रहा है। इन दिनों थानों से एक ही रटा रटाया जवाब मिल रहा है। सब खैरियत है। कोई क्राइम नहीं। चोरी, लूट, छिनतई, बलात्कार अब रोजमर्रा की बातें हो गई हैं। ये भी कोई खबर है। बरबस ही नटवरलाल फिल्म के संवाद जेहन में ताजा हो जाते हैं जब अमिताभ बच्चों से कहते हैं, ‘ये जीना भी कोई जीना है लल्लू’। अब हर कोई काला-पीला तेल, प्लाट-मकान-दुकान की दलाली, नई-पुरानी कार की बात तो नहीं कर सकता। जुआ, सट्टा, कबाड़ में हर कोई दिलचस्पी नहीं ले सकता। हर किसी के पास कोई रैकेट भी नहीं होता कि वह उचंती खाता मेन्टेन कर सके। ऐसे बेकार लोगों के साथ पुलिस देश-विदेश, अंतरिक्ष स्वर्ग-नर्क की चर्चा न करे तो और क्या करे? जनता के बीच अपनी छवि बनाने को उतावली पुलिस की मीडिया से यह बेजारी समझ से परे है। कॉकस से घिरी पुलिस को यह भी शिकायत है कि उसकी अच्छी योजनाओं का प्रचार प्रसार नहीं हो पाता। लोगों को सिर्फ पुलिस की खामियां नजर आती हैं। दरअसल ऐसा है नहीं। सही मीडिया का चयन करें, प्रचार प्रसार भी होने लगेगा।
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