photo journalist from chhattisgarh. Worked for the Navabharat in Orissa as bureau chief. Presently with the Haribhoomi Super Central Desk.
Monday, August 9, 2010
ओहदे का गुरूर
मेंगलुरु में 22 मई को हुआ भीषण एयर इंडिया विमान हादसा टाला जा सकता था अगर विदेशी कैप्टन ने को-पायलट आहलूवालिया की सलाह मान ली होती। इस हादसे में 158 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी। पायलट और एयर ट्रैफिक कंट्रोल के बीच बातचीत के रिकॉर्ड से पता चलता है कि को-पायलट एचएस आहलूवालिया ने कैप्टन ज़्लॉट्को ग्लूसिका से लैंड न करने का अनुरोध किया था। उन्होंने कम से कम दो बार यह अनुरोध किया, मगर कैप्टन ने उनकी सलाह की अनदेखी की। सबसे बड़ी बात यह कि को-पायलट ने समय रहते यह सलाह दे दी थी। सूत्रों के मुताबिक उन्होंने लैंड न करने की सलाह तभी दे दी थी जब विमान 800 फुट की ऊंचाई पर था। आहलूवालिया मेंगलुरु के ही थे और उन्हें वहां के रनवे की पूरी जानकारी थी। वह 66 बार वहां लैंड कर चुके थे। एटीसी सूत्रों के मुताबिक, आहलूवालिया ने कम से कम दो बार अपने कमांडर से अनुरोध किया कि वह थोड़ी देर मंडराते रहें। संभवत: उन्हें एहसास हो गया था कि विमान या तो ज्यादा तेज है या ज्यादा ऊंचाई पर है-यानी एप्रोच करने लायक स्थिति में नहीं है। ऐसे में मंडराते रहना सबसे मान्य तरीका होता है ताकि दूसरी कोशिश में विमान सुरक्षित लैंड कराया जा सके। मगर, आहलूवालिया की सलाह पर ध्यान नहीं दिया गया और नतीजा भीषण हादसे के रूप में सामने आया। ऐसा अकसर होता है। चलती ओहदे की ही है फिर भले ही वह गलत हो। यह कोई पहली मर्तबा नहीं है जब किसी ओहदेदार की ढिठाई की वजह से निरपराध लोगों की जान गई हो। छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित इलाके में एक बार हुक्म हुआ कि फौरन बल भेजा जाए। एक हवलदार ने सकुचाते हुए कहा, साहब इसमें खतरा है। इन सड़कों पर लैंड माइन्स हो सकती हैं। पर लताड़ पड़ी। उल्लू का पट्ठा कह दिया गया। डरपोक बताकर उसे पीछे थाने में छोड़ दिया गया और रंगरूटों को लेकर ट्रक रवाना हो गया। आगे बारूदी सुरंग तो नहीं मिली किन्तु वहां पेड़ गिराकर एम्बुश लगाया गया था। ड्राइवर के कानों में हवलदार की बातें तब भी गूंज रही थीं। उसने गाड़ी धीमी की और तेजी से यू टर्न देकर वापस दौड़ा दिया। पीछे से हमले हुए किन्तु वे उसकी जद से बाहर थे। जानते हैं उस हवलदार का क्या हुआ? उसे काली जुबान वाले की संज्ञा दे दी गई। पिछले वर्ष के पूर्वार्द्ध में कांकेर के जंगल वारफेयर कालेज जाने का सौभाग्य मिला था। वहां जंगलों की रणनीति पर चर्चा के दौरान यह बात उभर कर सामने आई थी कि जवानों को चुस्त दुरुस्त करने की जरूरत है किन्तु इनके आला अफसरों को जंगल वारफेयर सीखने की कहीं ज्यादा जरूरत है। ये जवान चाहे कितने भी तेज तर्रार और समझदार क्यों न हो जाएं वे वरिष्ठ अफसरों का हुक्म बजाने के लिए बाध्य हैं। यदि रणनीतिकारों से चूक होगी तो जवानों को बचाना मुश्किल होगा। तब से अब तक गंगा में काफी पानी बह चुका है, बस्तर से लेकर राजनांदगांव तक काफी खून खराबा हो चुका है और अब तो केन्द्र सरकार भी किंकर्त्तव्य विमूढ़ की स्थिति में आ गई है। क्या ओहदेदार का ढीठ होना जरूरी है?
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