Monday, August 9, 2010

सफाई का फंडा

हम बेहद सफाई पसंद हैं। जीवन के लिए भले ही पांच लीटर पानी चाहिए हो हम सफाई के नाम पर प्रतिदिन सौ से पांच सौ लीटर पानी खर्च करते हैं। फिर भी सफाई सिफर। इसकी वजह है। हम सिर्फ पानी खर्च करने को सफाई मानते हैं। अब देखिए हम सफाई के लिए क्या-क्या करते हैं। सुबह-सुबह झाड़ू लगाकर घर का कूड़ा निकालकर सड़क पर या पड़ोसी के घर के आगे रख देते हैं। इसके बाद हम पोंछा मारकर पूरे घर को चिपचिपा कर लेते हैं। यह बैक्टीरिया के लिए परफेक्ट ब्रीडिंग ग्राउण्ड होता है। सब्जियों के डंठल, छिलके, पत्ते हम घर के बाहर या आजू-बाजू की नालियों में डाल देते हैं। यह कूड़ा वहीं सड़ता रहता है। सफाई की बात चली तो रामदेव बाबा याद आ गए। शहरों में बढ़ती भीड़ के साथ साथ उत्पन्न हुई कूड़ा निपटान की समस्या पर बाबा कहते हैं कि पहले हम घर से दूर केवल एक लोटा लेकर चले जाते थे। खेतों को देख लेते थे, दो चार सौ कदम चल भी लेते थे। शौच खुलकर होता था। पानी की बर्बादी भी कम होती थी। अब हम बिस्तर से उठते हैं। चंद कदम चलकर टायलट सीट पर बैठ जाते हैं और 15-20 मिनट गुजारने के बाद लटका हुआ मुंह लेकर बाहर चले आते हैं। अलबत्ता कई बार फ्लश कर देते हैं वरना बेडरूम में दुर्गंध जो आती है। टायलेट साफ होता है पर पेट नहीं। बारिश शुरू होते ही शहरों में निकासी की समस्या उठ खड़ी हुई है। नगर निगम सफाई में जुट गया है। सफाई के नाम पर हो क्या रहा है। नालियों के किनारे की घास खोदी जा रही है। इससे मिट्टी की पकड़ कमजोर होगी और वह नाली में बहकर उसे चोक कर देगी। यही नहीं पूरे मोहल्ले की नाली साफकर उसकी गंदगी को नाली के किनारे किसी एक स्थान पर इकट्ठा किया जा रहा है। इसे जेसीबी उठाएगा। जेसीबी कब आएगा पता नहीं। कूड़ा फिर से नाली में चला जाएगा। सफाई कर्मियों को वेतन मिल जाएगा। सफाई का काम भी होगा पर सफाई, फिर भी नहीं होगी।

No comments:

Post a Comment