photo journalist from chhattisgarh. Worked for the Navabharat in Orissa as bureau chief. Presently with the Haribhoomi Super Central Desk.
Monday, August 9, 2010
100 रुपए का पास्ता
नेहरू नगर का रेलवे लेव्हल क्रासिंग बंद था। एक माल गाड़ी दुर्ग की तरफ से आती दिख रही थी। दूसरी पावर हाउस के आसपास कहीं हो सकती थी। जब तक वह यहां पहुंचती तीसरी गाड़ी फिर दुर्ग से आ रही हो सकती थी। जब से यहां तीन पटरियां हुई हैं, मुसीबतें बढ़ गई है। इधर बारिश के कारण अंडरब्रिज भसक गए हैं। इसलिए इंतजार करने के अलावा कोई चारा भी नहीं था। लिहाजा हमने इधर उधर नजर दौड़ाई और पिज्जा पार्लर में घुस गए। डिस्पले विंडो में काफी ताकाझांकी के बाद हमने पास्ता ट्राई करने की ठानी। 99 रुपए का पास्ता पूरे दस मिनट बाद पैक में सर्व किया गया। ठीक वैसा ही फॉयल पैक जिसमें इन दिनों ट्रेन में मील्स सर्व किए जाते हैं। क्लास वन के बच्चे के टिफिन बाक्स के आकार का पैक जिसमें एक सैंडविच और ऐप्पल के कुछ वेज (टुकड़े) ही आ पाते हैं। बहरहाल हमने फॉयल बाक्स का कार्ड का बना ढक्कन हटाया। अंदर दो मुट्ठी रंग बिरंगा सा, लिजलिजा सा सामान था। हमने उसे ट्राई किया, सॉस में लिपटी मैदे के उबले हुए पाइप जैसा लगा। सब्जी के कुछ टुकड़े थे। स्वाद के नाम पर उनमें भी केवल सॉस था। हम समझ गए कि पश्चिम को न तो खाना बनाना आता है और न भोज्य पदार्थ चुनना। वे अखाद्य, कुखाद्य भोजन को सॉस में लपेट कर निगल लेते हैं। नूडल्स से लेकर पास्ता तक सबका यही हाल है। बहरहाल हमने मित्रों से चखने को कहा। उन्हें भूख नहीं थी। फिर भी मेरे कहने पर उन्होंने एक एक चम्मच चखा और पास्ता खत्म हो गया। एक मित्र ने कहा, यार सॉस तो डब्बे में भी लगा है। क्यों न इसे भी चबा लें, कुछ पैसे और वसूल हो जाएंगे। दूसरे ने कहा, छोड़ भी यार इतना तो हमारे यहां थाली में छोड़ने का रिवाज है। अलबत्ता ऐसा कर सकते हैं कि बाक्स को धुलवा लेते हैं, बच्चे के क्राफ्ट बनाने के काम आ जाएगा। काश पापड़ी चाट और दही गुपचुप भी इस आलीशान सेटअप में बिकता। लिट्टी-चोखा और इडली-दोसा भी पार्सल में बिकता। शोबाजी में लोगों को आंसुओं के घूंट तो नहीं पीने पड़ते।
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment