photo journalist from chhattisgarh. Worked for the Navabharat in Orissa as bureau chief. Presently with the Haribhoomi Super Central Desk.
Monday, August 9, 2010
टीचर की बेंत
कुछ दिन पहले हम वैष्णोदेवी प्रवास पर थे। खा-खाकर, अलसा कर मुटाए लोग भी यहां आते हैं। कुछ बहुत छोटे बच्चे होते हैं और थोड़े बुजुर्ग भी। ऐसे लोगों के लिए पहाड़ों पर चढ़कर माता के दर्शन करना मुश्किल होता है। लिहाजा यहां डोली, घोड़ी और पिट्ठू का इंतजाम है। डोली को चार से छह इंसान मिलकर उठाते हैं जबकि पिट्ठू उस व्यक्ति को कहते हैं जो अपने कंधों पर सामान, बच्चे यहां तक कि बड़ी उम्र के लोगों को भी ढोते हैं। यहीं दिखा बेजुबान जानवर पर होता जुल्म जिसे सभ्य समाज क्रुएल्टी टुवर्ड्स एनीमल्स कहता है। एक कमजोर सी घोड़ी पर जब एक बच्ची को बिठाया गया तो वह बिदक गई और आगे जाने से इंकार करने लगी। हिनहिना कर आगे पीछे होती घोड़ी से जब बच्ची को उसके अभिभावकों ने उतरवा लिया तो घोड़ी वाला छड़Þी लेकर घोड़ी पर पिल पड़ा। बेजुबान जानवर खामोशी से मार खाता रहा। क्या पता वह थक चुकी हो, उसकी पीठ पर काठी चुभ रही हो या कोई और तकलीफ हो। कुछ कुछ ऐसा ही स्कूलों में दिया जाने वाला कार्पोरल पनिशमेन्ट है। बच्चे की ड्रेस गंदी है, जूतों में पालिश नहीं लगी, होमवर्क पूरा नहीं किया और टीचर बेंत लेकर उसपर टूट पड़ता है। बेचारा तीसरी-पांचवीं का बच्चा बोल भी नहीं पाता कि मम्मी की तबियत ठीक नहीं, इसलिए कपड़े नहीं इस्त्री हुए। परिवार किसी शादी में गया था इसलिए होमवर्क पूरा नहीं हुआ। वह बेजुबान जानवर की तरह खड़ा-खड़ा मार खाता रहता है। इन दोनों ही तरह के प्रकरणों के खिलाफ कानून हैं किन्तु उनका पालन नहीं होता। घोड़ी, घोड़ीवाले की मिल्कियत है इसलिए वह उसे पीट सकता है। बच्चे के माता-पिता ने उसे जन्म दिया है इसलिए वे उसे पीट सकते हैं, उसे पीटने के लिए शिक्षकों को उकसा सकते हैं। इसी सोच के चलते कुछ लोग बीवी को पीट लेते हैं। इस मामले में समाज भी पीछे नहीं। वह सामाजिक अनुशासन का स्वयंभू कोर्ट है। समान गोत्र या भिन्न जाति में विवाह करने पर वह दोषी को बेंत मारने, सार्वजनिक रूप से अपमानित करने या फिर सीधे मृत्युदण्ड देने के लिए स्वतंत्र है। यहां हम यह भूल जाते हैं कि सजा से केवल शारीरिक पीड़ा ही नहीं होती बल्कि आत्मसम्मान को भी ठेस पहुंचती है। इंसान तो इंसान, जानवर भी अभिमानी होते हैं। मारपीट या सार्वजनिक प्रताड़ना वे बर्दाश्त नहीं कर पाते। वे खामोशी से आंसू बहाते हैं। खाने की तरफ से मुंह मोड़ लेते हैं और कभी कभी इसी तरह अपनी जान दे देते हैं। कोलकाता के एक नामी स्कूल ला मार्तिनिए के मेधावी छात्र रोवनजीत ने भी शायद सिर्फ इसीलिए मौत को गले लगा लिया कि उसके आत्मसम्मान को ठेस लगी थी। मारपीट और अपमान सहकर केवल ढीठ ही खामोश रहते हैं, फिर चाहे आप उसे कोई भी नाम दो। जिनमें आत्मसम्मान होता है वे या तो विद्रोह कर देते हैं या फिर खुद मिट जाते हैं। फैसला आपको करना है कि आप क्या चाहते हैं।
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