Monday, August 9, 2010

पढ़े लिखे ढीठ

बचपन में गर्मियों की छुट्टियां गांवों में बिताया करता था। हमारा अपना गांव सैकड़ों किलोमीटर दूर था। हर साल वहां जाना संभव नहीं होता था। लिहाजा हम बच्चे गर्मियों में अपने अड़ोसी पड़ोसी के गांव चले जाते थे। वहां हमने देखा था कि जब भी बच्चा साइकिल उठाकर गांव से बाहर जा रहा होता तो उसके माता पिता उसे टोकते और कहते कि ध्यान से साइकिल चलाना। सड़क की बार्इं तरफ से ही चलना। आने-जाने वाली गाड़ियों को निकल जाने देना। अपना ख्याल रखना। गांव में मैने देखा था कि जंगली आदिवासी भी जब लकड़ी या तेंदूपत्ता का गट्ठर लेकर सड़कों पर चलते हैं तो वे एक कतार में आगे पीछे चलते हैं। मरनी नहावन में आज भी स्थानीय लोग, फिर चाहे वे शहर के निवासी ही क्यों न हों, कतार में ही चलते हैं। कहने-सुनने को बहुत कुछ होता है किन्तु सड़क पर वे मौन धारण किये रहते हैं। आगे पीछे चलती इन महिलाओं की कतार कभी-कभी चार-पांच सौ मीटर लंबी होती है पर क्या मजाल की दो महिलाएं भी आजू बाजू चलती मिल जाएं। रास्ते के किनारे किनारे समान रफ्तार से चलती इन महिलाओं के कदम एक साथ उठते और पड़ते हैं। उनके बीच समान दूरी होती है। ऐसा लगता है जैसे सेना ने इन्हें ट्रेनिंग दी हो। आज भी नक्सल प्रभावित इलाकों में गश्त कर रहे कोया कमाण्डो इसी तरह एक के पीछे एक चलते हैं। पर यह संस्कृति शिक्षा के साथ ही विलुप्त हो जाती है। इन परिवारों के पढ़े लिखे बच्चों को ही लें तो उनपर शहरी ढिठाई चुटकियों में हावी हो जाती है। वे तीन-तीन की कतार में साइकिल या दुपहिया चलाते मिल जाएंगे। हार्न बजाने पर भी वे आने जाने वाले को साइड नहीं देंगे। ज्यादा हार्न बजाया तो घूर कर देखेंगे। कुछ ऐसे ही युवाओं से जब यातायात सुरक्षा के बारे में पूछताछ की गई तो उनके जवाब ने निराश किया। इनमें से सभी ने केवल अपने अधिकारों की बात की। सभी ने बड़ी गाड़ी वालों को दोषी ठहराया। सभी को इस बात का ज्ञान था कि किसी जगह किस तरह की दुर्घटना होने से किसकी गलती मानी जाती है। किन मामलों में इन्श्योरेंस क्लेम मिलता है और कब उसमें दिक्कत आती है। मगर किसी ने भी ट्रैफिक में अपनी जिम्मेदारी पर एक शब्द नहीं कहा। शायद नए जमाने की सोच का असर था। वे नहीं मानते कि छुरा कद्दू पर गिरे या कद्दू छुरे पर, कटना कद्दू को ही होता है। उनकी दिलचस्पी सड़क दुर्घटना में गलती निकालने में है। वे बाल की खाल निकालना चाहते हैं पर यह नहीं सोच पाते कि इस दुर्घटना को टाला कैसे जा सकता था। दिक्कत यही है कि प्रत्येक व्यक्ति केवल अधिकारों में उलझा हुआ है, कर्त्तव्यों को लगभग सभी ने विस्मृत कर दिया है। ऐसे तो नहीं बनेगा बात।

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