Monday, August 9, 2010

पनीर के टुकड़े

जिस तरह कुछ लोगों में ब्रांडेड पहनने की फैंसी होती है, ठीक उसी तरह कुछ लोगों में पनीर की फैंसी होती है जबकि खाने के लिए उससे कहीं बेहतर कई चीजें उससे कहीं कम कीमत पर दुनिया में, खासकर भारत में उपलब्ध है। देश में सैकड़ों प्रकार की सब्जियां, दर्जनों किस्म के अनाज और दालें, तरह-तरह के पारम्परिक व्यंजनों की भरमार है किन्तु पनीर इन सबके बीच ब्रांड बनकर उभरा है। यदि हम दिमाग से इसके ब्रांड का भूत उतारकर इसके स्वाद की चर्चा करें तो शायद इसका नम्बर 50 व्यंजनों की हॉट लिस्ट में भी कहीं न आए। यहां तक पढ़ने के बाद कुछ लोगों को लगने लगा होगा कि लेखक पनीर नहीं खाता, या उसे पनीर पसंद नहीं। ऐसी बात नहीं है। कोफ्त तब होती है जब लोग केवल ब्रांडेड डिश के नाते पनीर परोसना चाहते हैं किन्तु उनकी जेब उन्हें इसकी इजाजत नहीं देतीं। शादी की पार्टियों में मटर पनीर के बाउल में जब लोग चने में छिपे पनीर के टुकड़ों को तलाशते हैं तो हंसी छूट जाती है। इसी तरह जब ‘अक्षय पात्र’ की रेसिपी में पनीर पुलाव आ जाता है तो सिर पीटने को जी करता है। ‘अक्षय पात्र’ मध्यान्ह भोजन बनाने की एक स्टेट आॅफ द आर्ट संस्थान है। जो बीएसपी के बंद हो चुके डेयरी के भवन में संचालित है। यहां पकने के बाद भोजन स्टील के कनस्तरों में स्कूलों को भेजा जाता है। मंगलवार को अक्षय पात्र ने न जाने क्यों बच्चों को पनीर पुलाव खिलाने का विचार किया। जाहिर है बच्चे पीले चावल में पनीर के टुकड़े तलाशते रह गए। 25 किलो भात में पनीर के मुट्ठी भर टुकड़े डाले जाने का क्या मतलब निकाला जाए समझ में नहीं आया। इससे तो अच्छा होता मटर या चना पुलाव ही बना दिया होता। या कुछ हरी सब्जियां ही डाल दी होतीं। कम से कम बच्चे खा तो लेते। किन्तु ब्रांडेड के जमाने में ब्रांडेड मध्यान्ह भोजन पकानी वाली संस्था को इससे क्या? हमारे दिमाग पर छाई यही ब्रांडेड संस्कृति है जो हमें कच्चा केला, गवार फल्ली, सहजन (मुनगा) आदि खाने से रोकती है और देश की 80 फीसदी से अधिक औरतें रक्ताल्पता का शिकार हो जाती हैं। बड़ा अच्छा लगता है जब प्रति वर्ष अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट में भारत को भूखे नंगों का देश बताया जाता है, यहां के बच्चों को कुपोषण का शिकार बताया जाता है। यह स्थिति तब है जब यहां सुपाच्य, पोषक भोजन बेहद सस्ते में उपलब्ध है। क्यों हम अपनी जाने के दुश्मन बने हुए हैं। फ्रूट बोलने से क्यों हमारे दिमाग में सम्पूर्ण आहार केले की तस्वीर नहीं उभरती। फल का मतलब सेब और मोसंबी जैसे महंगे फल ही क्यों हैं। दरअसल भोजन पर हमारे शरीर की जरूरतों का कम और हमारे स्टेटस का अधिक जोर चलता है।

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