photo journalist from chhattisgarh. Worked for the Navabharat in Orissa as bureau chief. Presently with the Haribhoomi Super Central Desk.
Monday, August 9, 2010
एक लाचार बाप
मोहल्ले में आर्थिक रूप से हम सबसे कमजोर थे। यही नहीं हमारे घर में बच्चे भी कम थे। एक लड़का और एक लड़की। यानी की संख्या बल में भी हम पिट जाते थे। हमारी माँ हमेशा बीमार रहती थी। लिहाजा न भुजाओं से और न ही गले से हम कोई युद्ध जीतने की स्थिति में थे। जब कभी मोहल्ले में हमारा किसी बच्चे से विवाद होता, घर पर पिटाई हमारी ही होती, फिर चाहे गलती किसी की भी क्यों न रही है। हमें विवाद से बचने की सलाह दी जाती। घर से बाहर हमारी घिग्घी बंधी रहती थी इसलिए सारा उबाल घर के भीतर जाया हो जाता था। आज भी जब कभी देश के शीर्ष नेतृत्व की तरफ देखता हूँ तो मुझे अपने घर की याद आ जाती है। पाकिस्तान दुम ठोक दे तो हमारे यहां प्यालियों में तूफान आ जाता है। हम पाकिस्तान से भले ही साफ-साफ बात न कर सकें, देश के अन्दर बवंडर उठा देते हैं। अफजल गुरू की फांसी की फाइल इधर से उधर धूल खाती, रंग उड़ाती घूम रही है पर हम घर में हिन्दूवादियों की पलस्तर उधेड़ रहे हैं। हम बाहर नहीं गरज सकते, इसलिए घर में बरसते हैं। आखिर वह कौन से डर हैं, जो हमारे बाप को एक बार मरने के बजाय बार-बार किस्तों में मरने के लिए विवश किए हुए थे। महाभारत की कहानी हमने भी पढ़ी थी किन्तु उसका कोई असर हम पर नहीं हुआ था। रामायण में वनवासी राम की वानर सेना और रावण की त्रिलोकविजयी चतुरंगी सेना के बीच हुआ धर्मयुद्ध और उसकी परिणति भी हमें प्रभावित नहीं कर पाती। फिर क्या मतलब है इस तरह के धर्मग्रंथों से जनता को बहलाने का? क्या हमारी पूरी मर्दानगी समाज में अलग-थलग पड़ गए प्रेमी युगल को मौत के घाट उतारने, पाकेट मार की धज्जियां उड़ाने और भीड़ की शक्ल में सरकारी तथा सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने तक ही सीमित है? पत्रकारिता भी अब रसूख वालों की बांदी हो गई है। ऊपर महल के लोगों के इसमें शामिल होने के बाद से आलम यह है कि फाइल के चलने से पहले ही उसके पहुंचने की खबर आ जाती है। इसे खोजी पत्रकारिता कहते हैं। खबर आई कि अफजल गुरू की फाइल गृहमंत्रालय ने राष्ट्रपति को भेज दी है। फाइल में संसद हमले के मास्टरमाइंड को क्षमादान नहीं देने के सिफारिश की गई है। इसका जोरदार स्वागत हुआ। यूपीए की तारीफ में कसीदे काढ़े गए। गृहमंत्री का इकबाल बुलंद हो गया। संपादकीय तक लिख दिए गए। बाद में खबर आई कि फाइल अभी सरकी नहीं है। हाइप क्रिएशन का इससे बड़ा उदाहरण अब तक देखने में नहीं आया है। सरकार सूचना लीक करके शायद यह देख रही थी कि अफजल की फांसी बरकरार रखने का फैसला करने पर जनता की प्रतिक्रिया क्या होगी। सो उसने मिलीजुली प्रतिक्रिया देख ली। अब किस बात की देर है?
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