Monday, August 9, 2010

सात खून माफ

‘समरथ को नहीं दोस गुसार्इं’ यह कहावत बहुत पुरानी है। इसका आशय यह है कि जिसमें धन, बल, कला, कौशल से परिस्थितियों को अपने पक्ष में मोड़ने का सामर्थ्य होता है उसके लिए कोई भी अपराध अपराध नहीं होता। उसे किसी बात का दोष नहीं लगता। संभवत: इसी फलसफे को ध्यान में रखकर देश भर में जहां कहीं भी विदेशी या बहुराष्ट्रीय कल-कारखाने लगते हैं वहां इनका विरोध किया जाता रहा है। 70 और 80 के दशक में जहां इन विरोधों को थोड़ी बहुत तरजीह दी जाती थी वहीं अब इन्हें बर्बरता पूर्वक कुचल देने की प्रवृत्ति पनपने लगी है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण भोपाल की गैस त्रासदी है। यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड के 1982 के सुरक्षा अंकेक्षण में 30 ऐसे बिंदुओं की तरफ कंपनी का ध्यान आकर्षित किया गया था जिससे जनस्वास्थ्य को खतरा हो सकता था। इन बिंदुओं पर अमरीका स्थित कंपनी के प्लांट में तत्काल कदम उठाए गए किन्तु भोपाल स्थित इकाई में इन्हें नजरअंदाज कर दिया गया। 3 दिसम्बर 1084 को इसके परिणाम भी आ गए। दरमियानी रात रिसे मिथाइल आइसोसायानेट गैस की चपेट में भोपाल के 5,00,000 लाख लोग आ गए जिसमें से लगभग 3000 लोगों की तत्काल मौत हो गई। तीन सप्ताह में मृतकों की संख्या 8000 तक पहुंच गई। कालांतर में इतने ही और लोगों की मौत हो गई। सरकार ने क्या किया? कंपनी के सीईओ वारेन एंडरसन को सुरक्षित देश के बाहर भेज दिया जबकि वह गंभीर आपराधिक लापरवाही का दोषी था। प्लांट साइट पर तब से आज तक सैकड़ों टन विषैले पदार्ष लावारिस पड़े हैं जिससे भूजल संक्रमित होता रहा है। ऐसा नहीं है कि यह कोई इकलौता हादसा है। देश भर में इस तरह के हादसे होते रहे हैं और सरकारें विदेशी नागरिकों की सुरक्षा की नैतिक जिम्मेदारी के तहत आम भारतीयों की जान माल का सौदा करती रही है। 24 सितम्बर 2009 को कोरबा के बालको चिमनी हादसे में 35 लोगों की मौत हो गई। चिमनी का निर्माण चीनी कंपनी शैनडांग इलेक्ट्रिक पावर कंस्ट्रक्शन कारपोरेशन द्वारा गैनन डंकरले एंड कंपनी लिमिटेड के माध्यम से किया जा रहा था। हादसे के तुरन्त बाद इन फर्मों के विदेशी नागरिकों एवं तकनीशियों को सुरक्षा के वास्ते सुरक्षित बाहर निकाल दिया गया जबकि जनआक्रोश को शांत करने बालको के उपाध्यक्ष को गिरफ्तार कर लिया गया। खैर यह तो हुई सुरक्षा की दृष्टि से की गई कार्रवाई। सरकारें किस हद तक गिर सकती हैं इसका उदाहरण 2 जनवरी, 2006 को उड़ीसा के कलिंगनगर में देखने को मिला। यहां टाटा के प्रोजेक्ट का शांतिपूर्ण विरोध कर रहे आदिवासियों पर न केवल पुलिस ने गोलियां चलार्इं बल्कि बाद में पोस्टमार्टम के बहाने मृतकों के हाथ भी काट लिए। प्राकृतिक साधनों-संसाधनों के अंधाधुंध दोहन, केवल राजस्व और जीडीपी पर नजर रखकर बनाई जा रही योजनाओं की कीमत आखिर कब तक देश का आम नागरिक चुकाता रहेगा? क्या इन मामलों को जानने के बाद भी हम कहेंगे कि प्रत्येक आंदोलन केवल विकास विरोधी मानसिकता की उपज है?

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