Monday, August 9, 2010

झोला वाले बाबा

बचपन में भिखारियों को देखने पर हम डर जाते थे। उसकी खिचड़ी बाल या दाढ़ी नहीं बल्कि उसके कंधे पर लटका थैला हमें डराता था। हमें बताया गया था कि उस झोले में ऐसे बच्चे होते हैं जो अपने माता-पिता की बात नहीं सुनते। अपने घर से दूर खेलने चले जाते हैं। झोला वाला बाबा दरअसल बच्चे पकड़ने के लिए ही घूमता रहता है। जहां भी कोई बच्चा अकेला दिखता है उसे झोले में डाल लेता है और फिर ले जाकर उसकी आंखें फोड़ देता है, उसकी टांगे तोड़ देता और उससे भीख मंगवाता है। कुछ ऐसा ही डर हमें अंधेरे से लगता था। हमें बताया गया था कि भूत प्रेत अंधेरे में रहते हैं। पेड़ों पर उनका निवास है। जैसे-जैसे हम बड़े होते गए यह खौफ जाता रहा तथा इन कहानियों का मर्म भी समझ में आने लगा। रात को पेड़ों के नीचे नहीं जाने के वैज्ञानिक कारणों का भी पता लगा। वहां चिड़ियों के बसेरे के प्रति हम संवेदनशील होने लगे। यह भी समझ में आया कि बच्चों को एकांत में जाने से रोकने के लिए बाबा एक बहाना था। डरने-डराने का यह खेल आज भी जारी है। गुरुजी, ज्योतिषी, डाक्टर, बीमा एजेंट, अखबार सभी हमें डराने में लगे हुए हैं। यह डर हमें जीने नहीं देता। हम विकास से डरते हैं, परिवर्तन से डरते हैं। बिना देखे, बिना जाने आने वाले से डरते हैं। देखा जा रहा है कि किसी भी उद्योग की स्थापना से पहले विरोध के स्वर उभरते हैं। देर सबेर ये शांत भी हो जाते हैं और फैक्ट्री स्थापित होकर रहती है। इस हंगामे में गरीब के घर चूल्हा नहीं जलता, उसका काम छूट जाता है, कुछ लोग मर भी जाते हैं। नेताओं की जेब गर्म हो जाती है और उद्योग स्थापित हो जाता है। ऐसे हर दूसरे मामले में गरीब, ग्रामीण जनता का केवल उपयोग किया जाता है। उसके हित की फिक्र किसी को नहीं होती। जिसके पास गंवाने को वैसे ही कुछ न हो उसे डर किस बात का। अलबत्ता झोला वाले बाबा, भूत प्रेत या चुड़ैल का डर उसे भी दिखाया जा सकता है। शहर के आसपास का हर तीसरा खेत बिल्डर के पास है। हर दूसरे खेत का बयाना हो चुका है। राष्ट्रीय राजमार्ग के आसपास कोई भूखण्ड शेष नहीं। पहले जमीन खरीद ली और फिर प्रशासन की मदद से वहां रहने वाले गरीबों को खेद दिया। यह रोज हो रहा है। प्रदेश ही नहीं पूरे देश की यही कहानी है। पर्यावरण के नाम पर जेके सीमेन्ट का विरोध करने वालों के घर में तुलसी के अलावा कोई पौधा नहीं। इसी तरह नक्सलियों के खिलाफ वायु सेना के प्रयोग की दलील देने वाले वायुसेना को जमीन देने को तैयार नहीं भली ही दो-चार पांच साल में वहां कालोनियां खड़ी हो जाएं।

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