Monday, August 9, 2010

जान पहचान की ऐंठ

वह बड़े शहर से आया था। उसके कपड़े-लत्ते और गर्दन की ऐंठ बता रही थी कि वह बड़ा आदमी है। एक फैक्टरी के दरवाजे पर पहुंचकर उसने बेल पुश दबाया। दरवान ने दरवाजा खोला, झुककर सलाम किया और रिसेप्शन का रास्ता इशारे से बता दिया। अकड़ में घुटने सीधे रखता हुआ वह सेमीमार्च करता हुआ रिसेप्शन तक पहुंचा और रिसेप्शन पर खड़े खड़े फोन पर बात कर रहे युवक से कड़क कर पूछा, ..... कहां है। युवक ने एक बार उसे ऊपर से नीचे तक देखा पर टेलीफोन पर हो रही बातचीत में व्यवधान नहीं आने दिया। आगंतुक ने आवाज को और रौबीला बनाते हुए दोबारा सवाल किया, युवक ने उन्हें विजिटर्स सोफा दिखा दिया। साफ लग रहा था कि दोनों को एक दूसरे का रवैया कतई नहीं भा रहा था। रिसेप्शन डेस्क पर बैठी युवती दिलचस्प नजरों से आगंतुक को देख रही थी। आगंतुक को उसकी आंखों में विद्रुप नजर आया। उसका खून खौल गया। पर वह चुप रहा। शायद उसने ठीक ही किया था। युवक की फोन पर बातचीत खत्म हो चुकी थी। वह आगंतुक की तरफ मुड़ा। ‘हम दिल्ली से आए हैं’ उसने कहा। ‘तो?’ युवक ने सवाल किया। ‘तुम मुझसे इस तरह बात नहीं कर सकते’ आगंतुक हड़बड़ाया। इस बार युवक ने आवाज ऊंची की, उसके मुंह से एक ही लफ्ज निकला ‘गार्ड!’। तत्परता से एक गार्ड ने भीतर प्रवेश किया और बिना कुछ पूछे आगंतुक की बांह पकड़ी और उसे बाहर खींच लाया। गार्ड से हुई बातचीत में आगंतुक को पता लगा कि जिससे वह मिलने आया था वह दीवालिया हो चुका था और कंपनी एक माह पहले बिक चुकी थी। जिससे वह रिसेप्शन पर बातें कर रहा था वह कंपनी का नया मालिक था। ऐंठन में इस तरह की गलतियां अक्सर हो जाया करती हैं। एक पुलिस वाले ने मनचलों को पकड़ा तो तैश में सबको गालियां दीं। उसे क्या पता था कि इनमें से एक गृहमंत्रालय के संसदीय सचिव का पुत्र था। लोगों से ऐसी गलतियां अक्सर हो जाती हैं। एक अपराधी जिसके सामने पुलिस से अपनी पहचान की डींग मार रहा था, वह जिले का नया पुलिस कप्तान निकला। जिसके आगे प्रिंसिपल मैम की बुराई कर रही थी वह उसीकी बेटी निकली। बेहतर हो कि हम ऐंठन और हेकड़ी का प्रयोग केवल परिचितों के आगे ही करें। वरना पता नहीं कब उलटे बांस बरेली को लौट आएं।

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