photo journalist from chhattisgarh. Worked for the Navabharat in Orissa as bureau chief. Presently with the Haribhoomi Super Central Desk.
Monday, August 9, 2010
पापा कसम, हम झूठ नहीं बोलते
माँ कसम वाले देश में अंतत: एक ऐसा टीवी धारावाहिक आ ही गया जिसका एक प्रमुख किरदार बात बात में पापा कसम कहता है। शरद जोशी की कहानियों पर आधारित लापतागंज नाम के धारावाहिक में बिजी पाण्डे बात-बात पर पापा कसम कहता है। वैसे तो इस धारावाहिक को शुरू हुए काफी अरसा हो गया है किन्तु आज इसका विशेष उल्लेख इसलिए कि आज पापा-डे यानी कि फादर्स डे है। आज उसी बाप का दिन है जिसका मौजूदा परिवारों में एक ही काम रह गया है, घर चलाने के लिए पैसे कमा कर ले आना। वरना पर्दे से लेकर चादर तक, राशन से लेकर मेन्यू तक, फर्नीचर से लेकर गाड़ी तक कहीं भी उसकी मर्जी नहीं चलती। हालांकि अब महिलाएं भी पुरुषों के कंधे से कंधा रगड़ रही हैं पर घर चलाने की जिम्मेदारी आज भी पापा लोगों के ही कांधे पर है। उसकी कमाई पर आज भी पहला हक परिवार का है। विवाह की वेदी पर खाई गई कसम को वह आज भी निभाता चला जा रहा है। कम से कम इस मामले में उसकी स्थिति में कोई खास फर्क नहीं आया है। पर ऐसा नहीं है कि उसकी जिन्दगी बदली नहीं है। पहले वह न केवल परिवार के भरण पोषण का जिम्मेदार होता था बल्कि परिवार का मुखिया भी होता था। कहलाता तो वह आज भी घर का मुखिया ही है किन्तु उसकी यह भूमिका अब हाशिए पर है। माँ-बेटियां मिलकर जो भी फैसला करती हैं, वह उसके लिए बाध्यकारी होता है। हाल ही में इसका एक उदाहरण देखने को मिला। नए पुलिस कप्तान के निर्देश पर मजनू पकड़ अभियान चलाया जा रहा है। स्कूल, पार्क, सिनेमा हाल और मॉल पुलिस के निशाने पर हैं। पुलिस ऐसे स्थानों से न केवल मनचले लड़कों को बल्कि फैशनपरस्त लड़कियों की भी धरपकड़ कर रही है। ऐसे ही एक मामले में पुलिस ने दो जोड़ों को पकड़ा। यह जोड़ी क्लास 10-11 की थी। जब उनके माता पिता को समझाइश देने की कोशिश की तो पापा कसम, बाप बेजुबान जानवर की तरह खड़ा रहा। जो कुछ भी कहना सुनना था माँ ने ही बोला-सुना। एक अन्य मामले में यहां के एक तकनीकी संस्थान में अध्ययनरत तीन लड़कों को पुलिस पकड़ लाई। पूछताछ करने पर पता लगा कि वे सभी बारहवीं में सप्लीमेन्टरी सहित सेकण्ड डिविजन में पास थे किन्तु उनकी जिद और मम्मी की मर्जी के आगे पापा की एक नहीं चली थी और लाखों रुपए डोनेशन देकर उन्होंने उनका एडमिशन इस निजी कालेज में करवाया था। पापा खूब समझते थे कि बेटा यहां गुलछर्रे उड़ा रहा है फिर भी वह परिवार के दबाव के आगे विवश थे और प्रतिमाह बेटे को 5 से 10 हजार रुपए खर्चा भेज रहे थे। इसी खर्चे का प्रताप था कि बेटा अपनी गर्लफ्रेंड्स को महंगे गिफ्ट दे रहा था, उन्हें मॉल घुमा रहा था, आईनॉक्स में पिक्चर दिखा रहा था। शर्ट-पैंट और जूते तो दूर चड्डी बनियान तक ब्रांडेड पहन रहा था। उसकी जरूरतों को पूरा करने के लिए ‘नमक का दरोगा’ वाली कहानी पढ़ा हुआ बाप रिश्वत खा रहा था। पर आज वह खुश है। बच्चों ने सुबह सुबह हैप्पी फादर्स डे कहा है। शाम की पार्टी ड्यू हो गई है। बकरे का बाप आखिर कब तक खैर मनाएगा।
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