Monday, August 9, 2010

चिता का र्इंधन, पिंड का निवाला

कुछ ही दिनों में हम आजादी की 63वीं वर्षगांठ मना रहे होंगे। इस बीच देश में बहुत कुछ बदला है। विकास की रफ्तार में अंधाधुंध तेजी आई है। बादशाह के महल से बड़े अफसरों के बंगले हो गए हैं। जनसेवकों की वेतन-सुविधा मल्टीनेशनल कंपनियों के सीईओ के पे-पर्क्स को मात दे रही है। जिन्हें नौकरियां मिल रही हैं, उन्हें महंगाई भत्ता भी मिल रहा है। पद के लिहाज से वाहन का आकार प्रकार बढ़ रहा है। चार बस और बारह ड्राइवर कम करने की कोशिश में 200 लोगों को स्कूटर और कार अलाउंस दे रहे हैं। लोग इनकम टैक्स बचाने इनवेस्ट कर रहे हैं। खर्चे हैं कि पूरे नहीं पड़ रहे। करों का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है। खाने पीने की चीजें लगातार महंगी हो रही हैं। संसद से लेकर विधानसभा तक पक्ष-प्रतिपक्ष का टाईअप हो गया है। टाटा, बिड़ला, अंबानी, जिंदल, नेता, आईएएस, आईपीएस और भिखारी खाने-पीने की चीजों पर समान दर पर टैक्स अदा कर रहे हैं। जो खरीद पा रहे हैं वे खरीद रहे हैं। जो नहीं खरीद पा रहे वे चींटियों, बिल्लियों और कुत्तों का जीवन जी रहे हैं। ट्रेन में दो परिवार आमने सामने बैठे थे। एक अपर मिडिल क्लास तो दूसरी लोअर मिडिल क्लास का था। एक एलटीसी पर यात्रा कर रहा था तो दूसरा अंटी के पैसे खर्च कर किसी रिश्तेदार के यहां शादी में जा रहा था। एक परिवार ने ट्रेन में खाने का आर्डर दिया। दूसरे ने अपनी थैली से परांठा और अचार निकाल लिया। परांठे बच गए तो उसने करीने से उन्हें वापस पैक कर लिया और थैले में डाल दिया। ट्रेन का ‘मील’ कुछ विलंब से पहुंचा। बच्चे तब तक कुरकुरे और चिप्स खाकर सो चुके थे। उन्हें जगाया गया पर उनींदे बच्चों ने लंच पैक को जूठा करने के बाद खाने से इंकार कर दिया। सना-सनाया चावल दाल खिड़की से बाहर। गाड़ी स्टेशन पर रुकी थी। प्लेटफार्म पर अजीब नजारा था। मैले-कुचैले कपड़ों में बच्चे लंच पैक्स को लूट रहे थे। तकरीबन स्लीपर बोगियों के आसपास यही नजारा था। बनारस का घाट याद आ गया। वहां भी बच्चे, बूढ़े और जवान नदी में घंटों तैरते रहते हैं। उनके निशाना पर वे पिंड होते हैं जिन्हें लोग अपने पुरखों के नाम पर पानी में बहा देते हैं। कुछ ऐसे ही परिवार श्मशान के आसपास डेरा डाले रहते हैं। वे चिता की लकड़ी से घर के चूल्हे का र्इंधन और पिंड से बच्चों का निवाला चुराने कुत्तों से जंग करते हैं। अंधाधुंध शहरीकरण से कौए कम हो रहे हैं। कोई और उनकी जगह ले रहा है।

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