photo journalist from chhattisgarh. Worked for the Navabharat in Orissa as bureau chief. Presently with the Haribhoomi Super Central Desk.
Monday, August 9, 2010
दोस्ती की झेंप
समय के साथ शब्द के मायने बदल जाते हैं, सुना तो था किन्तु इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हाल ही में मिला। जिससे भी उसके दोस्तों के बारे में पूछा शर्म से लाल हो गया। किसी के घर का माहौल स्ट्रिक्ट था तो किसी पर उसके बडेÞ भाइयों का जोर चलता था। किसी के लिए यह बेहद निजी प्रसंग था तो किसी के लिए एकांत चर्चा का विषय। हम सोचते रह गए कि हमने सवाल मित्र के संबंध में किया था या...। 20-25 साल पहले इस सवाल के जवाब कुछ और होते थे। हमारे गुरुजी पुस्तकों को अपना सच्चा मित्र बताया करते थे। संगीत चाचाजी का अभिन्न मित्र था। जब भी फुर्सत मिलती वे या तो कोई गीत गुनगुना रहे होते या फिर कुछ सुन रहे होते। पौधे और फूल मेरे पिता के मित्र थे। सुबह शाम फुर्सत निकालकर वे बगीचे के चार पौधों को संवारते। घास निकालते, कीड़े छुड़ाते, सूखे पत्तों को अलग करते। खाद-पानी देते। वे पौधों और बच्चों में कोई फर्क नहीं करते थे। माँ दोपहर को बाहर पड़ोसनों के साथ बैठतीं। सुख-दुख की चर्चा करने के साथ ही स्वेटर बुनाई का नया डिजाइन, कोई खास रेसिपी, नाते रिश्तेदारी की चर्चा होती। फुर्सत लोगों को आज भी है किन्तु दोस्तों के नाम बदल गए हैं। अब रेसिपी पड़ोसन नहीं बल्कि फाइवस्टार होटलों के शेफ बताते हैं। पड़ोसनों का स्थान एकता कपूर के झोल-झाल परिवारों ने ले लिया है जो एक बात का कम से कम तीन मतलब तो निकाल ही लेती हैं। जो दिन भर महंगी साड़ियां और जूलरी पहनकर कैमरे की तरफ मुंह किये खड़े-खड़े ही बातें करती हैं। कभी आदमी सुकून और दो गज जमीन की बातें करता था। आज प्लाट, बंगला और टेंशन की बातें करता है। ऐसे में दोस्त के मायने न बदलें यह कैसे हो सकता है। अब ‘शोले’ के जय और वीरू की तरह कोई ‘ये दोस्ती... हम नहीं..’ गाते हुए नहीं घूमते। ‘आ जा मेरी गाड़ी में बैठ जा...’ से शुरू हुआ यह दौर ‘आती क्या खंडाला...’ से भी आगे निकल चुका है। अब तो अलग-अलग गाड़ियां होती हैं। जुदा-जुदा राहें होती हैं। कहीं पर मिलते हैं और फिर अपनी-अपनी राह चले जाते हैं। फास्ट फारवर्ड लाइफ में जरूरत की जान-पहचान है। कहीं धन की, कहीं करियर की तो कहीं शरीर की जरूरत बोलती है। वैसे दोस्ती का भाव खत्म नहीं हुआ। दो घूंट लगाते ही वह बाहर आ जाता है। पिया-खाया आदमी दोस्ती पर जान लुटा देता है। पर्स निकालकर दे देता है, गाड़ी की चाबी थमा देता है। सौ मुश्किलें आसान कर देता है। पर लोग अब दोस्ती में नहीं पीते बल्कि पीने के लिए दोस्ती करते हैं। ‘निंदक नियरे राखिए...’ वाले दिन लद चुके हैं। हाँ में हाँ मिलाई तो ठीक वरना जयश्री राम!
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