photo journalist from chhattisgarh. Worked for the Navabharat in Orissa as bureau chief. Presently with the Haribhoomi Super Central Desk.
Monday, August 9, 2010
एक मरीज तीन अटेंडेंट
मुन्नाभाई एमबीबीएस 99 फीसदी लोगों ने देखा है। इसलिए इस फिल्म के चरित्रों से लेकर प्रसंगों का उदाहरण यह सोचकर दिया जा सकता है कि हम रामायण या महाभारत से उद्धरण पेश कर रहे हैं। मुन्ना भाई ने अपनी पहली ही क्लास में डीन से सवाल किया था, ‘यदि कोई मरीज मर रहा है तो क्या उसके लिए फार्म भरना जरूरी है?’ सेक्टर-9 के मेन हास्पीटल में यह सवाल बार बार पूछने को जी करता है। अमूमन कोई सर्दी खांसी बुखार दिखाने के लिए इस अस्पताल में नहीं आता। वह तभी आता है जब हालत पतली होती है। थोड़ी बहुत तैयारी के साथ यहां आने वाला मरीज न केवल हक्का बक्का रह जाता है बल्कि हलाकान भी खूब होता है। जवाहर लाल नेहरू चिकित्सालय एवं अनुसंधान केन्द्र में प्रति प्राइवेट मरीज कम से कम तीन अटेंडेंट लगते हैं। एक मरीज के आसपास जो उसे उठा सके, बिठा सके, लिटा सके, थुका सके, व्हीलचेयर पर बैठाकर ले जा सके, स्ट्रेचर पर डाल सके। दूसरा अटेंडेंट कागजी कार्रवाई करने के लिए भागता दौड़ता रहे। कभी दवा तो कभी इंजेक्शन के लिए हास्पीटल सेक्टर मार्केट के चक्कर लगा सके। तीसरा व्यक्ति सबसे अहम होता है। उसकी ड्यूटी मरीज को कैजुअल्टी तक लाने के बाद सीधे बजरंगबली की शरण में पहुंचने की होती है। वह वहीं बैठकर तब तक हनुमानजी का स्मरण करता रहे जब तक कि मरीज सही सलामत अस्पताल से डिस्चार्ज न हो जाए। कैजुअल्टी या आपात चिकित्सा के लिए डाक्टर दिखाने की फीस 315 रुपए है। कैजुअल्टी में उपलब्ध चिकित्सक का विशेषज्ञ होना जरूरी नहीं फिर भी इतनी फीस। बहरहाल मामला एक बड़े अस्पताल में इलाज कराने से जुड़ा है इसलिए यह भी माना। यदि डाक्टर ने एडमिट करने के लिए लिख दिया तो तत्काल पांच हजार रुपए जमा करवाएं। रसीद प्राप्त करें तभी आगे की कार्रवाई होगी। अस्पताल पहुंचते समय यदि मरीज की तरफ से ध्यान मिनट भर के लिए भी हटा हो तो गेट के पास खड़ी एटीएम मशीन जरूर दिखी होगी। एक और एटीएम मशीन काफी हाउस के आसपास कहीं है। अच्छा होता कि एक डेबिट-क्रेडिट कार्ड रीडिंग मशीन काउंटर पर ही रख ली जाती। कम से कम भागदौड़ से तो मुक्ति मिलती। वैसे जिनके पास इतने आदमी फालतू नहीं हैं, उनके लिए भी यहां व्यवस्था है। यहां भाड़े पर अटेंडेंट मिल जाते हैं। इन अटेंडेंटों की सेवा हासिल करना अच्छा रहता है। वे अस्पताल के सभी अली-गली से परिचित हैं। यही नहीं कौन सा काम किस तरह आसानी से हो सकता है इसकी भी उन्हें जानकारी होती है। अस्पताल के कर्मचारियों से लेकर सुरक्षाकर्मियों तक से इनकी पहचान होती है जिसके कारण अटेंडेंट और फुड पास से भी मुक्ति मिल जाती है। ऐसा नहीं है कि अस्पताल को अपनी जिम्मेदारियों का अहसास नहीं है। अस्पताल में क्या-क्या और कैसा-कैसा होना चाहिए इसकी जानकारी आपको यहां हर गलियारे में लगे डिस्प्ले फ्लेक्स पर मिल जाएंगे। यह बात और है कि इसका लेश मात्र भी असर यहां के कर्मचारियों पर नहीं होता।
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