Monday, August 9, 2010

इन्हें भी चिपकाओ तीन पेटी

पुलिस के पास एक अमोघ अस्त्र है तीन पेटी। हत्या, लूट, बलात्कार, हत्या के प्रयास के मामले में कभी-कभार पुलिस की भले ही न चले किन्तु तीन पेटी शराब चिपकाकर वह किसी का भी नाड़ा ढीला कर सकती है। यदि पुलिस नैतिकता के आधार पर समाज का कुछ भला करने की ठान ले तो कुछ ऐसे लोग हैं जिन्हें तीन पेटी चिपकाने से न केवल उन्हें पुण्य लाभ हो सकता है बल्कि देश की प्रतिभाओं का भी भला हो सकता है। इनमें से कुछ नाम खेल संगठनों से जुड़े हैं तो कुछ मुफ्त की नेतागिरी से। ऐसे लोगों की करतूतों का खामियाजा पहले कुछ लोग और बाद में पूरा समाज भुगतता है। ऐसे लोग किसी लिखित कानून को नहीं तोड़ते पर नन्हें खिलाड़ियों का दिल तोड़ने से लेकर देश की प्रतिभाओं का गला घोंटने और राष्ट्र को उसकी प्रतिभाओं से वंचित करने में इनकी बड़ी भूमिका होती है। देश का कोई कानून इनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। राज्य तथा केन्द्र की सरकारें इनके आगे नतमस्तक हैं। खेल के स्वतंत्र संघ इनके उदाहरण हैं। ऊपर से लेकर नीचे तक भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे इन संगठनों पर बैठे मठाधीश इन पदों का उपयोग जागीरदार की तरह करते हैं। वे जो कुछ भी कह देते हैं वह पूरे देश पर बाध्यकारी हो जाता है। अपने इशारों पर नहीं नाचने वाली प्रतिभाओं का वे गला घोंट देते हैं। शायद यही वजह है कि 130 करोड़ की आबादी वाले इस देश के हिस्से में अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतिस्पर्धाओं में केवल चुग्गा ही आता है। हम खिलाड़ियों और उनके प्रशिक्षकों को कोस कर रह जाते हैं। शैतान का सगा नाना पीछे बैठकर डोरियां खींचता रहता है। हाल ही में जबलपुर में आयोजित आॅल इंडिया जस्टिस तन्खा मेमोरियल ओपन चेस टूर्नामेन्ट में अपने हुनर की धाक जमाने वाले नन्हें खिलाड़ियों पर भी शतरंज से जुड़ी एक ऐसी ही संस्था की गाज गिरी हुई है। इसकी वजह से वे आफिशियल टूर्नामेन्ट में भाग नहीं ले सकते। यानी कि वे छत्तीसगढ़ का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते फिर भले ही वे प्रतिभा में कास्पारोव के समकक्ष क्यों न हो जाएं। कानूनन इन मठाधीशों का कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। पर पुलिस चाहे तो ऐसा कर सकती है। पुलिस कप्तान वैसे भी खेल प्रतिभाओं के सरपरस्त माने जाते हैं। दर्जनों लोगों के खिलाफ तीन पेटी चिपकाने वाली पुलिस यदि ऐसे मठाधीशों पर तीन पेटी चिपकाकर दिखाए तो बहुतेरे खिलाड़ियों को तसल्ली मिलेगी।

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