Thursday, April 5, 2012

महंगी शिक्षा हमारा शौक


आदमी पैसे कमाता है तो अपना जीवन स्तर ऊपर उठाने की कोशिश करता है। प्लास्टिक की कुर्सियां गायब हो जाती हैं सोफे लग जाते हैं। चारपाई और दीवान के बजाय डबल बेड और वार्डरोब आ जाता है। रोटी सब्जी खाने के बजाय ब्रेकफास्ट, लंच और डिनर करने लगता है। खाने से पहले एपेटाइजर, स्टार्टर और बाद में डेसर्ट की तलब हो जाती है। इलाज की नौबत आने से पहले ही हेल्थ चेकअप पर खर्च करने लगता है। वह अपने बच्चे को बेहतर से बेहतर न्यूट्रिशन (पोषण) देना चाहता है। ऐसे में स्कूलों को कैसे साइड किया जा सकता है। स्कूल भी उसे सबसे अच्छा चाहिए। अच्छे स्कूल की उसकी परिभाषा भी अजीब है। अच्छे स्कूल का मतलब शानदार बिल्डिंग, एसी क्लासरूम, सीबीएसई का सिलेबस और हर रूट पर बसों से है। ऐसे स्कूलों को वह मुंहमांगी रकम देने को तैयार हो जाता है। फिर भले ही उसे तीन की बजाय दो रोटियों से काम चलाना पड़े। फटी बनियान और घिसी चप्पलें पहननी पड़ें। जहां तक परफारमेन्स का सवाल है तो यहां सोच में थोड़ा सा लोचा है। डीपीएस के नतीजे सबसे अच्छे क्यों हैं? आसान सा जवाब है कि वहां एडमिशन चुन-चुन कर अच्छे बच्चों को ही दिया जाता है। यहां पढऩे वाले सभी बच्चे संपन्न परिवारों से हैं (न होते तो यहां एडमिशन लेने का सपना भी न आता)। वे जितने चाहे ट्यूशन लगा सकते हैं, टीचिंग एड (शिक्षण सामग्री) खरीद सकते हैं। यदि इन स्कूलों का मुकाबला उन स्कूलों से करें जहां गधे-घोड़े सबको एडमिशन दिया जाता है और इसके बाद भी 100 परसेन्ट रिजल्ट आता है तो डीपीएस की टीचिंग क्वालिटी फीकी पड़ जाती है। इन छोटे छोटे स्कूलों में ऐसे बच्चे आते हैं जिनके माता पिता ज्यादा पढ़े लिखे नहीं हैं। पढ़े लिखे हैं भी तो उन्हें अंग्रेजी के नाम पर सिर्फ गुडमार्निंग सर और थैंकयू कहना आता है। ये अपने बच्चे की ऊंची ट्यूशन नहीं लगवा पाते। ये बच्चे पूरी तरह स्कूल के भरोसे होते हैं। ऐसे बच्चे जब 60-70 परसेन्ट माक्र्स के साथ पास होते हैं तो उनकी पीठ थपथपाने को मन करता है। ऐसे स्कूलों और वहां के टीचर्स को गोल्ड मेडल देने की इच्छा होती है। पर एक गरीब पत्रकार के मन में उठे इन नपुंसक विचारों का कोई मोल नहीं। जहां तक ट्विन सिटी का सवाल है तो यहां सभी तरह के स्कूल मौजूद हैं। यहां डीपीएस है, केपीएस है, शंकरा है, एमजीएम है, गुरुनानक है, शकुंतला है, डीएवी है, केएचएम है, महर्षि है। बूफे पार्टी सजी हुई है, जिसकी जो मर्जी हो खा सकता है। पर जब भूखा ऐसी पार्टी में जाता है तो वह पनीर और मलाई कोफ्ता ही खाता है। मिठाई और आईसक्रीम खाकर अपना स्टेटस ऊंचा करता है। वह जानबूझकर महंगे स्कूल में जाता है। वहां एसी क्लासरूम की फीस भरता है। जब वह महंगी शिक्षा का रोना रोता है तो हंसी आती है। देने वाला दे रहा है तो लेने वाले का क्या दोष? सरकार को कष्ट है तो क्यों नहीं वह खुद सीबीएसई के इंग्लिश मीडियम स्कूल खोलती?

Tuesday, April 3, 2012

कौन कहता है महंगा है पेट्रोल?


कौन कहता है महंगा है पेट्रोल?
रोना एक तरह का शौक है। वास्तव में आदमी जिन्दगी में सिर्फ दो बार रोता है। पहली बार पैदा होने के बाद अपना गला और फेफड़ा साफ करने के लिए और दूसरी बार गलत लड़की से शादी करने के बाद। इसके अलावा वह जब भी रोता है... उसमें सिर्फ और सिर्फ दिखावा और फरेब होता है। महंगी होती शिक्षा, चिकित्सा और पेट्रोल को लेकर रोना भी इसी तरह का रोना है। आज के तकरीबन अखबारों के पहले पन्ने पेट्रोल कीमतों पर रंगे हुए थे। खबर थी, यदि पेट्रोल के दाम नहीं बढ़ाए गए तो पेट्रोलियम कंपनियां सप्लाई रोक देंगी। बेवक्त का यह हल्ला समझ में नहीं आता। यह प्रायोजित तो नहीं? बचपन में जब भी हम स्कूल से कोई शरारत करके लौटते थे तो हमारा भरसक प्रयास होता था कि स्कूल की चर्चा घर पर बिल्कुल न हो। हम मुद्दे पैदा कर लेते थे। ऐसे मुद्दे जो सबको बिजी कर दे। भूख लगी है से लेकर चोट लगी है तक, यह कुछ भी हो सकता था। होमवर्क नहीं किया। स्कूल में पिटाई होगी। स्कूल जाने से बचने के लिए सिरदर्द और पेटदर्द का बहाना आम था। पेट्रोल कीमतों पर हो रहे बवाल को देखकर भी कुछ ऐसा ही महसूस होता है। देश भर के स्कूलों में भर्तियां चल रही हैं। प्राइवेट स्कूल इस साल भी फीस बढ़ाए बैठे हैं। जमकर कैपिटेशन फीस वसूल रहे हैं। आरटीई का धनिया बो रहे हैं। एक महीने तक इसके विरोध में हल्ला होगा फिर एडमिशन हो जाएंगे और सबकुछ झाग की तरह बैठ जाएगा। बहरहाल यहां चर्चा पेट्रोल की हो रही थी। पेट्रोल कंपनियां हमेशा एक ही सुर में रोती हैं- 'घाटा लग रहा है.. घाटा लग रहा है..Ó उन्होंने धमकी दी है कि रेट नहीं बढ़ाया तो सप्लाई रोक देंगे। सप्लाई रोक देंगे तो खाएंगे क्या? उनके अफसरों-कर्मचारियों का वेतन कौन भरेगा? यह कोई सोने चांदी की दुकान है कि बंद किए पड़े रहो। बहरहाल, यहां चर्चा पेट्रोल की कीमतों की हो रही थी। पेट्रोल की कीमतें काफी पहले सरकारी नियंत्रण से आजाद हो चुकी हैं। वे कीमतें खुद तय कर सकते हैं। वे इस बात की फिक्र बिल्कुल न करें कि जनता क्या सोचेगी। वैसे भी पेट्रोलियम कंपनियों को कौन सा चुनाव लडऩा है। और फिर देश में पेट्रोल महंगा कहां है? यदि पेट्रोल महंगा होता तो क्या गाडिय़ों की बिक्री हर साल नए रिकार्ड बनाती? क्या जनता एवरेज वाली गाडिय़ों को दरकिनार कर कम एवरेज वाली सेल्फ स्टार्ट गाडिय़ां खरीदती? युवा तो इन सबसे एक कदम आगे है। उन्हें अब हाई परफारमेन्स बाइक चाहिए - एवरेज भले ही 10 किलोमीटर प्रति लीटर हो। यदि देश में पेट्रोल महंगा होता तो क्या लोग आधा किलोमीटर दूर स्कूल जाने के लिए गाडिय़ों का इस्तेमाल करते। गाडिय़ों के नाम देखिए -प्ले•ार, डियो, वेगो, स्टनर... ये सब शौक हैं। और शौक पूरा करते समय कीमत नहीं देखी जाती। इसलिए टेंशन मत ले... खा-खुजा बत्ती बुझा... और चुपचाप सो जा! देश की सरकारें साठ साल से ऐसा ही कर रही हैं।

Sunday, April 1, 2012

खाली पड़े ड्राइंग रूम



1200 वर्गफुट के मकान में बड़े शौक से 400 वर्गफुट का ड्राइंग रूम बनवाया था। बाकी कमरों में सादा और वहां विट्रीफाइड ग्लेज्ड टाइल्स लगवाया था। टाइल्स पर उम्दा गलीचे का भी प्रबंध किया था। ब्रांडेड सोफा सेट, कॉर्नर टेवल, एक्वेरियम, टेलीफोन स्टूल, झाडफ़ानूस पर हजारों रुपए खर्च किये थे। बैठक घर का आईना होता है। दीवारों को रंगने में भी छोटी-मोटी पूंजी खर्च की थी। पर अब यह ड्राइंग रूम खाली पड़ा रहता है। थ्रीसीटर पर लेटे-लेटे बेटा टीवी देखता है। बेटी को सोफे के हैंडल पर बैठकर खाना खाते हुए टीवी देखने की आदत है। वरना इस कमरे में अब कोई आता नहीं। तीस साल अचानक ही ड्राइंग रूम का कंसेप्ट भारत आया था। अब यह धीरे-धीरे खुद ही हाशिए पर चला जा रहा है। जब लोगों के यहां फोन नहीं था तो एक दूसरे के यहां आना जाना लगा रहता था। अब तो दिन में दो चार बार फोन पर ही सम्पर्क कर लेते हैं। जिनके यहां कम्प्यूटर और ब्रॉड बैंड है वे अपने जन्मदिन से लेकर भगवान श्रीराम के जन्मदिन तक की बधाई फेसबुक पर दे देते हैं। कोई बात अच्छी या बुरी लगी तो ट्विटर पर ट्वीट कर देते हैं। मोबाइल एसएमएस का मार्केट डाउन हो गया है। इसपर इतने कमर्शियल एसएमएस आते हैं कि लोगों ने एसएमएस पढऩा ही बंद कर दिया है। कंपनियां 12-14 रुपए में हजारों एसएमएस करने के ऑफर देकर भी ग्राहक नहीं जुगाड़ पा रही हैं। फेसबुक पर अब मोबाइल से भी कनेक्ट हुआ जा सकता है। लोग ऑनलाइन हो गये हैं। किसी को बधाई देने के लिए अब दूसरे दिन का इंतजार करने की किसी को फुर्सत नहीं। वैसे भी देर रात तक जागने की नई बीमारी पैदा हो चुकी है। रात के बारह तो यूं ही बज जाते हैं। अब जब जाग ही रहे हैं तो एक बार फेसबुक को ही देख लिया जाए। सैकड़ों दोस्तों का बर्थडे, एनीवर्सरी याद रखना मुश्किल है। आपके लिए फेसबुक इन्हें याद रखता है। कम्प्यूटर खुद ही बता देता है कि आज किसका जन्मदिन है, किसकी शादी की सालगिरह है। 12 बजते ही तारीख बदल जाती है। आप तत्काल बधाई संदेश भेज कर सुबह याद रखने के टेंशन से मुक्त हो सकते हैं। एक तो संदेशा मिस नहीं होता और दूसरा जिसे भेजा गया हो वह चटपट वहीं पर 'थैंक्सÓ लिखकर अपनी प्रतिक्रिया भी दे सकता है। पर कुछ दोस्त खास होते हैं। इनसे रोज रोज की मुलाकातें तय होती हैं। पर ये मुलाकातें अब घर पर नहीं होतीं। ड्राइंग रूम में प्राइवेसी नहीं होती। हर किसी को लेकर बेडरूम में नहीं जाया जा सकता। ऐसे लोगों से मिलने के बाहर के अड्डे तय होते हैं। ऐसे अड्डे जहां केवल आपही की उम्र के लोग आया जाया करते हैं। जहां जाने से सोशल एक्टिविटी•ा बढ़ती हैं। देश दुनिया के बारे में पता लगता है। ज्ञान-चक्षु खुलते हैं। इन अड्डों पर बेस्ट फ्रेंड, बेस्ट करियर, हायर एजुकेशन के चर्चे होते हैं।  दोस्तों के डिप्रेशन, फ्रस्ट्रेशन का इलाज होता है। खाना-पीना तो आप्शनल है... एक दो प्लेट में चार छह लोग खाकर वे दोस्ती को ही मजबूत करते हैं।

बाहर झांकते अंत:वस्त्र




अंत:वस्त्र नहीं समझते? अरे भई.. अंडरगारमेन्ट्स। हमारे समय में किसी की चड्डी का रंग दिख जाता था तो पूरे क्लास में हल्ला हो जाता था... 'नीली चड्डी पहना है.. पीली चड्डी पहना है...।Ó खेलकूद के दौरान किसी के पैंट की सीवन उधड़ जाती, तो हम कहते Óब्लैडर दिख रहा हैÓ। उन दिनों हाथ की सिलाई वाले फुटबाल हुआ करते थे। खेलते खेलते सिलाई टूट जाती तो भीतर का लाल-लाल ब्लैडर दिखने लगता। दोनों दृश्यों में गजब की समानता हुआ करती थी। किसी की पैंट के  बटन खुले रह जाते, तो उसे Óपोस्ट ऑफिस' कहते थे। खुदा न खास्ता किसी की चड्डी दिख जाती तो ऐसा लगता था जैसे भरे बाजार उसे नंगा कर दिया गया हो। किन्तु अब जमाना बदल गया है। अब अंत:वस्त्र खुद ही बाहर झांकने लगे हैं। पहले आवारा टाइप के लड़कों की कमीज के बटन खुले रहते थे और बंडी दिखाई देती थी। फिर बंडी ही गायब हो गई। अब चड्डी की बारी है। आधुनिक चड्डी का न केवल रंग बल्कि उसका ब्रांड भी दिखाई दे जाता है।  नीचे तंग लो वेस्ट जीन्स और ऊपर शॉर्ट शर्ट। कमर और नाभी के साथ ही चड्डी का इलास्टिक भी दिखाई देना चाहिए। अब जब इलास्टिक दिखाई दे रहा हो तो चड्डी की उपेक्षा भी नहीं की जा सकती। लिहाजा चड्डी का ब्रांड एक बड़ा फैक्टर हो गया है। दोस्तों के बीच जब इसकी चर्चा छिड़ी तो एक ने तपाक से कहा, 'चड्डी से इंसान की औकात पता लगती है। गाड़ी किसी की भी मांगी जा सकती है। दोस्तों में शर्ट और जीन्स की अदला बदली कॉमन है। पर चड्डी के मामले में उधारी नहीं चलती। यह सिर्फ भीतर का नहीं बल्कि बेहद निजी मामला होता है। लिहाजा यदि किसी की वास्तविक औकात मालूम करनी हो तो उसकी चड्डी को ही देखना होगा।Ó काश! बैंक की ऋण शाखा को इस फंडे का पता होता। वैसे अंत:वस्त्रों के प्रदर्शन में केवल लड़के ही आगे हैं, ऐसा नहीं है। कभी ब्रा के स्ट्रैप्स को ब्लाउज में छिपाने के लिए सेफ्टीपिन का इस्तेमाल करने वाली महिलाएं अब उसकी डोरी को गले में पहना करती हैं। ठीक उसी तरह जिस तरह टूटी बांह को सहारा देने के लिए प्लास्टर को लटकाया जाता है। लोग समझते हैं कि यही तरक्की है। यह उठते हुए जीवन स्तर की निशानी है। पर कहानी कुछ और है। यह मार्केटिंग है। अकसर चर्चा उन्हीं चीजों की होती है जो दिखाई देती हैं। लोग अंडरगारमेन्ट्स पर कम खर्च करते थे, या यूं कहें कि शॉपिंग लिस्ट में वह लास्ट आईटम होता था। वह कैसा भी हो, काम चल जाता था। उसे मोड़ माड़कर रखा जाता था। किसी और कपड़े के नीचे फैलाकर सुखाया जाता था। पर अब वह जमाना लद गया। अब उसका सुन्दर व ब्रांडेड होना जरूरी है। क्या पता कब कहां उसके प्रदर्शन की नौबत आ जाए। क्या पता कब कौन चुपचाप हमारी औकात नाप जाए।


पर्यावरण पर हाय-हाय


पर्यावरण के नाम पर देश के साथ ही दुनिया भर में काफी हंगामा हो रहा है। लोग पर्यावरण बचाने के लिए भोजन छोड़ रहे हैं। प्रदर्शन कर रहे हैं। एनजीओ बना और चला रहे हैं। सरकारें करोड़ों रुपए के पेड़ लगवा रही है। तरह-तरह के चोंचले किए जा रहे हैं किन्तु ये सभी ठठकर्म साबित हो रहे हैं। अर्थात इनका कोई फायदा होता हुआ नहीं दिख रहा। विदेश कभी गया नहीं इसलिए पता नहीं, वहां के लोग क्या करते हैं किन्तु भारत अपने आप में तीन दर्जन देशों के समूह के बराबर है। यहीं अपने आस-पास जो कुछ देखता हूँ, उसी की चर्चा करता हूँ। हमारे यहां का वनवासी अपने घर के आसपास के पर्यावरण की चिंता खुद करता है किन्तु वन विभाग सबसे ज्यादा उसीको परेशान करता है। वनवासी को पता है कि सल्फी, महुआ, चार, इमली, छिन्द के पेड़ों से ही उसके जीवन में छांव है, भोजन है, पानी है। उसे प्रकृति को समझने के लिए स्कूल कालेज की पढ़ाई की जरूरत ही नहीं। दूसरी ओर शहरी जमात है। सैकड़ों वर्गकिलोमीटर में पसरे हुए कंक्रीट के जंगलों के बीच मिट्टी तक नहीं है, पेड़ों की तो बात ही क्या करें। ऐसे लोग जो पेड़ों के लिए एक इंच जगह नहीं छोडऩा चाहते पर्यावरण का रोना रोते हैं। जहां बैठकर ये बहस करते हैं, उन कमरों के दरवाजे शीशम के होते हैं, कम से कम चौखट तो बीजा का होता ही है। जिस फर्नीचर पर ये बैठते हैं वे भी शीशम के होते हैं। इनके घर के हर कोने में बेशकीमती लकडिय़ों के फर्नीचर और सजावटी सामान मिल जाएंगे। जिनके पास पैसे हैं वे हवन पूजन भी कराते रहते हैं। हवन पूजन के लिए भी लकडिय़ां लगती हैं। यही नहीं हम अपने सगों की लाशों को सवा चार मन लकड़ी से जलाते हैं। यह सबकुछ तब तक तो ठीक था जब तक देश की आबादी सीमित थी। किन्तु अब पासा पलट गया है। शहरों के शवदाह गृहों से अकसर यह खबर आती है कि वहां लाश जलाने के लिए लकडिय़ां कम पड़ रही हैं या हैं ही नहींं। सवा अरब की जनसंख्या वाले इस देश में प्रतिदिन लाखों की संख्या में लोग मरते हैं और पैदा भी होते हैं। इतने लोगों के दाह संस्कार के लिए या तो हम पेड़ों के सूख जाने की मन्नत मांगें या फिर हरे भरे पेड़ों को काटकर सूखने दें। दूसरा नाटक स्कूलों का है। कम्प्यूटर के जमाने में भी लगातार किताबों और कापियों की जरूरत बढ़ती ही जा रही है। इसकी पूर्ति के लिए टनों कागज चाहिए। नया शिगूफा किताबों के साथ सीडी बेचने की है। किताब भी सीडी में हो तो मजा आ जाए। तीसरी बीमारी भी इसीसे जुड़ी है। जो काम लोग घर पर बैठकर इंटरनेट के जरिए आनलाइन कर सकते हैं, उसके लिए भी दफ्तर खुले हुए हैं। यदि आनलाइन कार्यसंस्कृति को बढ़ावा दिया जाए तो शायद सड़कों से कम से कम आधे वाहन गायब ही हो जाएं। पेट्रोल और पर्यावरण दोनों की जान छूटे। पर दफ्तर न हो तो नमस्ते भी न हो। फिर बॉस के इगो का क्या हो? शुरुआत हुई है, पर जड़ समाज में परिवर्तन भी धीरे-धीरे आते हैं। लिहाजा परिवर्तन आते तक दो चार पीढिय़ां तो गुजर ही जाएंगी।

रोना संयुक्त परिवार का


कुछ लोगों को रोने की आदत होती है। वे हमेशा किसी न किसी बात को रोते रहते हैं। पिछले कुछ अरसे से लगातार टूटते परिवारों का रूदन सुन-सुनकर खुद से कोफ्त होने लगी है। ऐसा लगने लगा है जैसे नई पीढ़ी तो जो कर रही है सो कर रही है, खुद हमने कोई बहुत बड़ा तीर नहीं मारा हुआ था। बीस या पच्चीस साल पहले हम भी नई पीढ़ी ही कहलाया करते थे। हमें भी लोग कोसा करते थे। लोग कहते थे कि यंग जनरेशन मनमौजी हो गई है। उन्हें अपने से बड़ों का आदर करना तक नहीं आता। अब हम पूछते हैं कि क्यों आना चाहिए। कथित मैच्योर (वोट देने वाली) पीढ़ी लगातार पश्चिम परस्त लोगों की सरकारें चुनती रही है। देश की शिक्षा व्यवस्था हमें प्रतिस्पर्धी बना रही है। जीवन स्तर नाम का एक नया शिगूफा उथल-पुथल मचाए हुए है। पूरा का पूरा सेटअप पश्चिमी हो चला है। घर में चौपाल और बेडरूम में संडास हमें भाने लगे हैं। नाश्ता से लेकर भोजन तक पैकेट में आ रहा है। गिल्ली डंडा छोड़कर हाथ क्रिकेट का बल्ला थाम चुके हैं। लोग पांव के बजाय घुटना छूने लगे हैं। पूजनीय पिताजी, डियर पापा हो चुके हैं। माँ कब की ममी बन चुकी है। जमाना इसी तरह बदलता है। उसे कोई रोक नहीं सकता। कभी जंगलों में रहने वाले इंसान सुरक्षा के लिहाज से झुंडों में रहा करते थे। बीवियां और भाई बहन कॉमन हुआ करती होंगी। पापा का मतलब पुरुष और माँ का मतलब औरत हुआ करती होगी। फिर लोगों ने इसमें कुछ व्यवस्थाएं बनाईं। आदिम पुरुषों का यह झुण्ड परिवार नाम की इकाइयों में बंट गया। समय का चक्का चलता रहा और परिवार नाम की इकाइयों भी एकल परिवारों में बंट गईं। नौकरीपेशा लोगों को घर छोडऩा पड़ा। नौकरी के स्थान पर चाचा-ताऊ, माता-पिता, जीजा-साली सबको लेकर जाने का कोई औचित्य नहीं था। ऐसे एकल परिवारों के घर उपभोग की वस्तुएं बढऩे लगीं। उनकी देखा देखी औरों ने भी ऐसे जीवन स्तर की कल्पना की और समाज बदलता चला गया। आज जो लोग संयुक्त परिवार की दुहाई दे देकर भिनभिनाते रहते हैं, उनमें से अधिकांश को केवल बुजुर्गों की पीड़ा दिखाई देती है। यह समाज की एकतरफा सोच है। कोई भी समाज केवल बूढ़ों और बीमारों को टारगेट पर रखकर आगे नहीं बढ़ सकता। काश! किसी ने यह भी कहा होता कि यदि संयुक्त परिवार होता तो शायद आरुषि तलवार को नहीं मरना पड़ता। कमाऊ माता पिता के एकल बच्चे घर में किसके भरोसे रहते हैं, क्या करते हैं, जब तक इसकी चिंता नहीं की जाएगी, तब तक यह बहस अधूरी रहेगी। चिंता करते समय इस बात का ख्याल रखा जाना बेहद जरूरी है कि बालिका वधुएं जिस तरह परिवारों में आसानी से एडजस्ट हो जाया करती थीं वैसी उम्मीद पोस्ट ग्रैजुएट कमाऊ बीवियों से नहीं की जा सकती।

Monday, June 13, 2011

पत्रकार की हत्या

पत्रकार भी इंसान हैं। खासकर वे उस बिरादरी से हैं जहां व्यक्ति विशेषज्ञ किसी भी फील्ड का नहीं होता पर उससे उम्मीद प्रत्येक फील्ड की विशेषज्ञता की की जाती है। वह डाक्टर से बेहतर डाक्टर, इंजीनियर से बेहतर इंजीनियर, सबसे बड़ा समाजशास्त्री और मनोवैज्ञानिक होता है। पुलिस सेवाओं का तो उसे खास विशेषज्ञ माना जाता है। राजनीति में भी उसकी टिप्पणियों को चाणक्य का ओपीनियन समझ लिया जाता है। अपनी इस ताकत का जब से उसे अंदाजा हुआ है, बड़े बड़े उद्योगपति मीडिया के फील्ड में घुस गए हैं। यहां तक तो फिर भी सबकुछ ठीक है किन्तु जब से उद्योगपति और गंदे रईस इस धंधे में आए हैं तब से खोजी पत्रकारिता का एक नया सिलसिला शुरू हुआ है। खोजी पत्रकारिता को दूसरे शब्दों में दबंग पत्रकारिता कहा जाता है। इसमें पत्रकार येन केन प्रकारेण किसी सरकारी अधिकारी के खिलाफ ऐसे दस्तावेज और सबूत जुटा लेता है जिससे उस पर जबरदस्त दबाव बनाया जा सके। इसका दोहरा इस्तेमाल किया जा सकता है। खोजी पत्रकार या उसके आका पहले तो खोज कर निकाले गए सांप को झांपी में बंद कर देता है और फिर बीच-बीच में उसका ढक्कन उठाकर लोगों को फन के दर्शन कराता रहता है। उसकी खबरें भी ऐसी होती हैं कि उसमें इशारों के तीर तो बहुत चलते हैं पर मुद्दे की बात गोल होती है। अकसर अधिकारी डर जाता है और पत्रकार या उसके आका के मन की मुराद पूरी कर देता है। पर जिस तरह हाथ की पांचों उंगलियां एक जैसी नहीं होती, उसी तरह ब्लैकमेल होने वाला प्रत्येक व्यक्ति एक जैसी तासीर का नहीं होता। इनमें से कुछ तो डर कर अपनी इज्जत बचाने में जुट जाते हैं। कुछ बात खुलने के डर से सौदा कर लेते हैं। पर कुछ ऐसे भी होते हैं जो एक बार पत्रकार से कह देते हैं कि उससे जो बन पड़े कर ले, उसे उससे कोई बात नहीं करनी। वहीं कुछ लोग, भले ही वे संख्याबल में कम हों, ऐसे भी होते हैं जो अपनी तरफ उठी उंगलियों को तोड़ने, आंखों को फोड़ने में यकीन करते हैं। यदि खोजी पत्रकार ऐसे लोगों को ताड़ नहीं पाता तो अपने लिए मुसीबत बुला लेता है। मेरी नजर में यह पत्रकारिता नहीं है। यह महज सनसनी की मार्केटिंग है। आप लोगों को आवश्यक सूचनाएं देंगे नहीं। शासन की योजनाएं अंदर के किसी पृष्ठ पर छापेंगे। लोगों को जानकारी होगी नहीं और फिर जब वे छले जाएंगे तो उनके छले जाने की खबरें प्रथम पृष्ठ पर छापेंगे। आप लोगों को जानकार, जागरूक और जिम्मेदार बनाने के बजाय उन गिने चुने लोगों को खोजने में अपनी सारी ऊर्जा खर्च कर देंगे जो लोगों की अज्ञानता का लाभ उठाते हैं तो फिर जब आप मारे जाएंगे तो रोने वाले भी नहीं मिलेंगे। मुम्बई में या जहां कहीं भी पत्रकार की हत्या होती है, उसके पीछे अकसर इसी तरह की घटनाओं का हाथ होता है। हत्या पत्रकारिता की वजह से हुई हो यह भी जरूरी नहीं है। यह प्रेम त्रिकोण, लेन देन या जमीन की दलाली से भी जुड़ी हो सकती है। पर आधुनिक पत्रकारिता को यह देखने की फुर्सत कहां। वह एक रेपिस्ट दलित की हत्या को वह केवल दलित की पीट-पीट कर हत्या के रूप में देखता और दिखाता है। दलित, अजा और अजजा के लोग आईएएस और आईपीएस होने के बाद भी दलित थानों में मामले दर्ज कराते हैं और इन्हीं कानूनों की धाराओं के तहत उसकी सुनवाई शुरू होती है। क्या पहला, क्या दूसरा, क्या तीसरा और क्या चौथा स्तंभ? यहां तो हमाम में सभी नंगे हैं। इनमें से सभी अपने अपने किये की सजा भुगत रहे हैं तो फिर हाय तौबा कैसी?