photo journalist from chhattisgarh. Worked for the Navabharat in Orissa as bureau chief. Presently with the Haribhoomi Super Central Desk.
Sunday, January 16, 2011
लोकतंत्र के कीड़े-मकोड़े
अगर जूडिशरी गरीबों के लिए कोई पहल न करे तो हाशिए पर रहने वालों का क्या होगा- यह सवाल किसी भी संवेदनशील नागरिक को परेशान कर सकता है। इसकी वजह शायद यह है कि हमारे यहां की जूडिशरी पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप पर आधारित है। यहां के 99.99 फीसदी वकील निजी तौर पर प्रैक्टिस करते हैं और अपनी इमेज बनाना चाहते हैं। इसे एक विडंबना ही कहा जाएगा कि हमारी जनतांत्रिक व्यवस्था में निर्धनों के लिए एकमात्र सहारा अदालतें बनी हुई हैं। सरकार ने तो जैसे मान रखा है कि बेघर- बेसहारा नागरिकों के प्रति उसकी कोई जवाबदेही नहीं है। वे मरें, चाहे जीएं, उसे कोई फर्क नहीं पड़ता। सरकारी बाबुओं की खाल इतनी मोटी हो चुकी है कि उन्हें हाड़ कंपा देने वाली ठंड में भी गरीबों के रैन-बसेरों को उजाड़ देने और उनके लिए आवंटित राशि को डकार लेने में भी शर्म नहीं आती। जब कोर्ट का डंडा बरसता है तो आनन-फानन में रैन-बसेरे बनते हैं सिर्फ दिखाने के लिए। इस बात की जांच नहीं होती कि वहां बुनियादी सुविधाएं भी ढंग से उपलब्ध कराई गई हैं या नहीं? यह कोई एक-दो जगह की बात नहीं है। पिछले कई सालों से उत्तर भारत के अनेक राज्यों में यही कहानी दोहराई जा रही है। जब कड़ाके की ठंड पड़ने लगती है तो हाई कोर्ट सरकार को यह याद दिलाती है कि वह गरीबों के लिए कदम उठाए। दबाव में सरकारें सक्रिय होती हैं। राजधानी में तो लगता है कि सरकारी एजेंसियां संवेदनहीनता का रेकॉर्ड बनाने पर आमादा हैं। यहां फुटपाथ पर रहने वाली कई गर्भवती औरतों को मजबूरन सड़क पर ही अपने बच्चे को जन्म देना पड़ता है। सिर्फ इसलिए कि सरकारी अस्पताल उन्हें एडमिट करने से इनकार कर देते हैं। दो साल पहले शांति देवी नामक महिला को यह कहकर लौटा दिया गया था कि वह बीपीएलमें नहीं आती। जबकि वह इस कैटिगरी में आती थी। अस्पताल वालों की बेरुखी के कारण वह महिला जान से हाथ धो बैठी। ऐसे ही कुछ मामलों को ध्यान में रखकर दिल्ली हाई कोर्ट ने सरकार को निर्देश दिया है कि वह बेसहारा गर्भवती स्त्रियों के लिए विशेष शेल्टर बनाए। कहने को तो सरकार ने गरीब गर्भवती स्त्रियों के लिए कई तरह की स्कीमें चला रखी हैं, पर सरकारी अस्पताल उन योजनाओं का पालन करने में कोई रुचि नहीं दिखाते। अगर उनसे कुछ कहा जाए तो वे संसाधनों की कमी का रोना रोने लगते हैं। दरअसल हमारे सिस्टम में जवाबदेही और संवेदनशीलता का घोर अभाव हो गया है। अब सिर्फ प्रेशर ग्रुप्स की बात सुनी जाती है। चूंकि गरीब इस देश में प्रेशर ग्रुप नहीं हैं, इसलिए उनकी चिंता कोई नहीं करता। सरकारी तंत्र की संवेदनहीनता के लिए क्या आज का सामाजिक माहौल भी जिम्मेवार नहीं है? इस बात पर विचार करना चाहिए कि कहीं हमारे भीतर जड़ जमाते व्यक्तिवाद ने हमें कमजोर वर्ग से दूर तो नहीं कर दिया है?
मूर्ख चापलूसों की दोस्ती
कहते हैं दुनिया में दोस्त न हों तो मनुष्य एकाकी हो जाता है और छोटी छोटी मुसीबतें उसकी कमर तोड़ देती हैं किन्तु यदि दोस्त हों पर वे मूर्ख हों तो नित्य प्रतिदिन उसके लिए नई मुसीबतें खड़ी करते हैं। कुछ-कुछ ऐसा ही उनके साथ भी होता है जो चापलूसों की दरबार सजाते हैं। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण पिछले कुछ वर्षों से छत्तीसगढ़ में देखने को मिल रहा है। जब राज्य का गठन हुआ तो चूंकि मध्यप्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी इसलिए यहां भी कांग्रेस की ही सरकार बनी। बंटवारे में शायद छत्तीसगढ़ बुरी तरह ठगा जाता यदि एक बेहद काबिल प्रशासनिक अधिकारी यहां का पहला मुख्यमंत्री न बना होता। पर चर्चा उनके गुणों की नहीं बल्कि उनकी प्रशासनिक सख्तियों की होती रही। लिहाजा राज्य के पहले चुनाव में जनता ने कांग्रेस को सत्ता से बेदखल कर भाजपा की सरकार बना दी। इसमें भी कोई शक नहीं कि डॉ रमन सिंह के रूप में प्रदेश को एक ईमानदार, स्वच्छ, आम जन को समर्पित मुख्यमंत्री मिला। राज्य को न केवल केन्द्र से इफरात धनराशि मिली बल्कि कृषि-वन उपज एवं खनिज संपदाओं से परिपूर्ण छत्तीसगढ़ में निवेश की गंगा बहने लगी। साक्षरता, रोजगार, प्रति व्यक्ति आय, निर्माण सभी क्षेत्रों में हमने नए रिकार्ड बनाए। यह पूर्ण सत्य नहीं था पर चापलूसों की फौज ने सरकार की आंखों पर पट्टी बांध दी। जिनका काम सरकार के कामकाज की समीक्षा करना और गरीबों के जीवन की दुश्वारियों की तरफ उनका ध्यान आकर्षित करना था वे चापलूसों की जमात में शामिल हो गए। नि:संदेह प्रदेश में बहुमत से भाजपा की सरकार चुनी गई थी किन्तु यह कहना भी गलत था कि कांग्रेस का पूरी तरह सफाया हो गया है। हार जीत का अंतर कुछ ही सीटों का था। चंद सीटों का इधर से उधर होना पासा पलट सकता था। पर माहौल ऐसा बनाया गया जैसे कांग्रेस पूरी तरफ साफ हो चुकी है और भाजपा का एकछत्र राज स्थापित हो गया है। जबकि जीत का यह अंतर भी उस अंचल की वजह से था जिसे हम लगातार नक्सल संक्रमित बताते रहे हैं। यहां जनजीवन सामान्य नहीं था। करीब से भिलाई को देखें तो चापलूसी से लुटिया डुबोने का सबसे बढ़िया उदाहरण यहां देखने को मिला। मध्यप्रदेश सरकार में मंत्री रहे प्रेमप्रकाश पाण्डेय ने यहां विधानसभा अध्यक्ष की कुर्सी संभाली। विधानसभा में उन्होंने अपनी काबीलियत और सोच का परिचय दिया पर अपने ही घर में चाटुकारों से घिर गए। नतीजा सामने है। फिर बारी आई नगर की होनहार बेटी सरोज पाण्डेय की। उनके दुर्ग महापौर का कार्यकाल उपलब्धियों से परिपूर्ण था। दुर्ग की शक्ल ही बदल गई थी। उन्हें वैशालीनगर विधानसभा चुनाव लड़ाया गया और फिर लोकसभा का। वे दोनों चुनाव जीत गर्इं। इसके साथ ही चाटुकारों की फौज ने उन्हें घेर लिया तो नगर निगम में मात खानी पड़ गई। इससे पहले चाटुकारों ने महापौर विद्यारतन भसीन की नौका में छेद कर दिये थे। अब यही चाटुकारों की फौज विधायक निरंकारी, महापौर निर्मला यादव और सभापति राजेन्द्र अरोरा को घेरे है। भगवान उन्हें सदबुद्धि दे। सच वह नहीं होता जो अखबारों में छपता है बल्कि वह होता है जो आपके कार्यकर्ता बताते हैं।
Wednesday, January 12, 2011
इस घर को आग लगी
नगर निगम सभापति चुनाव में आखिर ऐसा क्या हुआ कि 29 पार्षदों तथा राज्य में सत्तासीन पार्टी की बखिया उधड़Þ गई? इस चुनाव में कांग्रेस को बहुमत जुटाना तो दूर बराबरी करने के लिए भी सात मतों की जरूरत थी पर उसका सभापति प्रत्याशी एक दो नहीं वरन पूरे छह वोटों से आगे निकल गया। इसे सीधे-सीधे पार्टी की लोकप्रियता से जोड़कर देखना हिमाकत होगी। जाहिर है कि इस उलटफेर के लिए जिम्मेदार कारण कुछ और ही हैं। दरअसल वैशाली नगर उपचुुनाव के बाद से ही भारतीय जनता पार्टी की अंदरूनी लड़ाई इतनी तेज हो गई कि इसका सीधा असर नगर निगम के चुनाव पर पड़ा। सांसद सरोज पाण्डेय ने एकतरफा अपनी चलाकर विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष प्रेम प्रकाश पाण्डेय खेमे को हाशिए पर ला खड़ा किया। महापौर पद पर कांग्रेस प्रत्याशी निर्मला यादव भारी मतों से जीती किन्तु जहां तक पार्षदों का सवाल है कांग्रेस अल्पमत में ही रही। कांग्रेस के 22 के मुकाबले भाजपा ने 29 सीटें जीतीं। परिणाम के बाद उम्मीद थी कि निगम अध्यक्ष पद पर भाजपा का कब्जा होगा। भाजपा के वरिष्ठ नेता लीलाराम भोजवानी व सच्चिदानंद उपासने ने जी तोड़ कोशिशें कीं, यहां तक कि पार्षदों को बारनवापारा भेज दिया गया। पर बात बनी नहीं। बागियों को मिलाना तो दूर पार्टी टिकट पर विजयी पार्षदों ने भी क्रास वोटिंग की। भाजपा के पार्षदों की मानें तो सभापति प्रत्याशी को लेकर हुई सहमति पर उन्हें धोखा दिया गया। रात को तय कुछ हुआ और सुबह रजनीशकांत कन्नौजे से नामांकन पत्र भरवाया गया। बागियों की राय को दरकिनार कर दिया गया। इधर कांग्रेस के रणनीतिकार पूरे घटनाक्रम पर नजर रखे हुए थे। जैसे ही कन्नौजे ने नामांकन दाखिल किया वैसे ही विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रविन्द्र चौबे के करीबी राजेन्द्र अरोरा को कांग्रेस ने उम्मीदवार घोषित कर दिया। राजेन्द्र अरोरा ने न केवल पार्षद चुनाव में हैट्रिक बनाई है बल्कि रिकार्ड मतों से जीते हैं। कांग्रेस ने निर्दलियों को अपनी तरफ करने का काम पहले ही शुरु कर दिया था तथा छत्तीसगढ़ स्वाभिमान मंच को अपने पक्ष में करने में कामयाब रही थी। मंच की तरफ से एक दिन पहले ही समर्थन की घोषणा सार्वजनिक की जा चुकी थी। कांग्रेस की तरफ से राजनांदगांव के महापौर नरेश डाकलिया ने जबरदस्त लाबिंग की थी। इसके बावजूद भाजपा ने कमजोर प्रत्याशी खड़ा कर एक तरह से अपने हाथ खड़े कर दिये। नतीजा यह रहा कि तीसरी बार रिकार्ड मतों से जीत दर्ज करने वाले राजेन्द्र अरोरा ने विपरीत परिस्थितियों में भी सभापतित्व का चुनाव रिकार्ड मतों से जीत लिया। यही नहीं भाजपा ने अपील समिति या नेता प्रतिपक्ष चुनने में भी ढिलाई का परिचय दिया तथा कद्दावर पार्षदों को हाशिए पर ही रखा। इससे यह कहा जा सकता है कि आगे भी निगम में भाजपा का प्रदर्शन कमजोर ही रहेगा। बहरहाल भाजपा के पास 29 पार्षदों की फौज होगी जिसके बूते वह विकास कार्यों में अपनी भूमिका को रेखांकित करने में समर्थ हो सकती है बशर्ते पार्टी के बड़े नेता अपने प्रभुत्व को तिलांजलि दें। घमंड ने तो प्रकांड विद्वान त्रिलोक विजयी रावण को नहीं बख्शा था...
महंगाई-बिचौलिए-सरकार
महंगाई-बिचौलिए-सरकार
महंगाई के मुद्दे पर प्रधानमंत्री द्वारा बुलाई गई उच्चस्तरीय बैठक किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सकी। बैठक के बाद प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से जारी इस एक पंक्ति के बयान में यह नहीं बताया गया है कि महंगाई से लड़ने के आखिर वे कौन से उपाय हैं, जिन पर सहमति बनाना इतना मुश्किल साबित हो रहा है। वित्तमंत्री, गृहमंत्री, कृषि मंत्री और योजना आयोग के उपाध्यक्ष के अलावा इस बैठक में कैबिनेट सचिव और वित्त मंत्रालय के मुख्य आर्थिक सलाहकार भी शामिल थे। इतनी हाई प्रोफाइल बैठक महज प्याज के आढ़तियों पर छापामारी करने के लिए तो नहीं बुलाई गई होगी। पिछले हफ्ते आए खाद्य पदार्थों की महंगाई के आंकड़े थर्राने वाले थे, लेकिन आने वाले समय में हालात और बिगड़ सकते हैं। अभी की महंगाई में मुख्य योगदान प्याज और बाकी सब्जियों के अलावा दूध, मांस और अंडे का है। गेहूं, चावल, दालें, खाद्य तेल और चीनी महंगे जरूर हैं, लेकिन इनकी कीमतों में इधर तुलनात्मक स्थिरता देखी जा रही है। सरकार की असल चिंता यह है कि आने वाले समय में प्याज और सब्जियों के मोर्चे पर कुछ राहत मिले तो बाकी चीजों की कीमतें लोगों के लिए आफत बन जाएंगी। खाद्य जिन्सों का अंतरराष्ट्रीय बाजार अमेरिका से निर्धारित होता है, जहां दिसंबर के आंकड़ों के मुताबिक पिछले साल के मुकाबले गेहूं की वायदा कीमतों में 47 फीसदी, मक्का में 50 फीसदी और सोयाबीन में 34 फीसदी की बढ़त दर्ज की गई है। विश्व व्यापार में सिर्फ चावल को छोड़कर बाकी सभी जिन्सों की स्थिति चिंताजनक है। सबसे बुरा हाल वहां चीनी का है, हालांकि भारत में पेराई सीजन शुरू होते ही चीनी का भंडारण बढ़ाने के बजाय इसके निर्यात के लिए दरवाजे खोल दिए गए हैं। यूपीए सरकार के साथ सबसे बड़ी मुश्किल यही है कि जैसे ही देश में किसी खेतिहर उपज की आवक बढ़ती है, उसका निर्यात तेज कर दिया जाता है, जबकि किसी जरूरी खाद्यान्न का आयात तब तक टाला जाता है, जब तक उसकी अंतरराष्ट्रीय कीमतें आसमान न छूने लगें। ये दोनों काम सीधे सरकार के स्तर पर ही हो रहे हैं, लिहाजा इनके लिए बिचौलियों को जिम्मेदार ठहराने का कोई मतलब नहीं है। बिचौलियों का नंबर इसके बाद आता है, जिनकी तादाद और ताकत में इधर बेतहाशा वृद्धि देखी गई है। इस सूची में पहले सिर्फ सप्लायरों और आढ़तियों का नाम आता था, लेकिन अब इसमें वायदा कारोबारी, रिटेल चेन्स के मालिकान और कभी किसी जिन्स की शक्ल तक न देखने वाले बैंकर भी शामिल हैं। सरकार में बैठे लोग कभी किसानों, तो कभी उपभोक्ताओं के हितों की बात करते हैं। लेकिन यह सारा इंतजाम दोनों की कीमत पर कुछ ताकतवर लोगों का पेट भरने का है। प्रधानमंत्री अगर खाद्य पदार्थों की महंगाई पर कुछ करते हुए दिखना चाहते हैं, तो इसकी शुरुआत वे खाद्य आपूर्ति मंत्रालय और कृषि मंत्रालय की पतवार अलग-अलग हाथों में थमाकर कर सकते हैं, हालांकि अनिर्णय की उनकी सहज वृत्ति को देखते हुए लगता नहीं कि महंगाई पर वे बैठकों से ज्यादा कुछ कर पाएंगे।
महंगाई के मुद्दे पर प्रधानमंत्री द्वारा बुलाई गई उच्चस्तरीय बैठक किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सकी। बैठक के बाद प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से जारी इस एक पंक्ति के बयान में यह नहीं बताया गया है कि महंगाई से लड़ने के आखिर वे कौन से उपाय हैं, जिन पर सहमति बनाना इतना मुश्किल साबित हो रहा है। वित्तमंत्री, गृहमंत्री, कृषि मंत्री और योजना आयोग के उपाध्यक्ष के अलावा इस बैठक में कैबिनेट सचिव और वित्त मंत्रालय के मुख्य आर्थिक सलाहकार भी शामिल थे। इतनी हाई प्रोफाइल बैठक महज प्याज के आढ़तियों पर छापामारी करने के लिए तो नहीं बुलाई गई होगी। पिछले हफ्ते आए खाद्य पदार्थों की महंगाई के आंकड़े थर्राने वाले थे, लेकिन आने वाले समय में हालात और बिगड़ सकते हैं। अभी की महंगाई में मुख्य योगदान प्याज और बाकी सब्जियों के अलावा दूध, मांस और अंडे का है। गेहूं, चावल, दालें, खाद्य तेल और चीनी महंगे जरूर हैं, लेकिन इनकी कीमतों में इधर तुलनात्मक स्थिरता देखी जा रही है। सरकार की असल चिंता यह है कि आने वाले समय में प्याज और सब्जियों के मोर्चे पर कुछ राहत मिले तो बाकी चीजों की कीमतें लोगों के लिए आफत बन जाएंगी। खाद्य जिन्सों का अंतरराष्ट्रीय बाजार अमेरिका से निर्धारित होता है, जहां दिसंबर के आंकड़ों के मुताबिक पिछले साल के मुकाबले गेहूं की वायदा कीमतों में 47 फीसदी, मक्का में 50 फीसदी और सोयाबीन में 34 फीसदी की बढ़त दर्ज की गई है। विश्व व्यापार में सिर्फ चावल को छोड़कर बाकी सभी जिन्सों की स्थिति चिंताजनक है। सबसे बुरा हाल वहां चीनी का है, हालांकि भारत में पेराई सीजन शुरू होते ही चीनी का भंडारण बढ़ाने के बजाय इसके निर्यात के लिए दरवाजे खोल दिए गए हैं। यूपीए सरकार के साथ सबसे बड़ी मुश्किल यही है कि जैसे ही देश में किसी खेतिहर उपज की आवक बढ़ती है, उसका निर्यात तेज कर दिया जाता है, जबकि किसी जरूरी खाद्यान्न का आयात तब तक टाला जाता है, जब तक उसकी अंतरराष्ट्रीय कीमतें आसमान न छूने लगें। ये दोनों काम सीधे सरकार के स्तर पर ही हो रहे हैं, लिहाजा इनके लिए बिचौलियों को जिम्मेदार ठहराने का कोई मतलब नहीं है। बिचौलियों का नंबर इसके बाद आता है, जिनकी तादाद और ताकत में इधर बेतहाशा वृद्धि देखी गई है। इस सूची में पहले सिर्फ सप्लायरों और आढ़तियों का नाम आता था, लेकिन अब इसमें वायदा कारोबारी, रिटेल चेन्स के मालिकान और कभी किसी जिन्स की शक्ल तक न देखने वाले बैंकर भी शामिल हैं। सरकार में बैठे लोग कभी किसानों, तो कभी उपभोक्ताओं के हितों की बात करते हैं। लेकिन यह सारा इंतजाम दोनों की कीमत पर कुछ ताकतवर लोगों का पेट भरने का है। प्रधानमंत्री अगर खाद्य पदार्थों की महंगाई पर कुछ करते हुए दिखना चाहते हैं, तो इसकी शुरुआत वे खाद्य आपूर्ति मंत्रालय और कृषि मंत्रालय की पतवार अलग-अलग हाथों में थमाकर कर सकते हैं, हालांकि अनिर्णय की उनकी सहज वृत्ति को देखते हुए लगता नहीं कि महंगाई पर वे बैठकों से ज्यादा कुछ कर पाएंगे।
Tuesday, January 11, 2011
छुपाए नहीं छुपता पाप
अंग्रेजी में कहावत है, ‘क्राइम नेवर पेज़’ अर्थात अपराध आपको स्थायी लाभ नहीं दे सकता। यह एक न एक दिन फूट कर बाहर आता ही है और तब जिन्दगी का सब पाया खोया बराबर हो जाता है। शुद्ध हिन्दी में कहें तो अपराधी लाख होशियार हो, अपराध के बाद वह सबूत और सुराग छोड़ता ही है। केम्प-1 के अजय राम ने भी यही किया। उसने आवेश में आकर हत्या नहीं की बल्कि ठंडे दिमाग से सोच समझकर हत्या की योजना बनाई। लाश को ठिकाने लगाने की जगह भी तय कर ली। दिसम्बर के अंतिम सप्ताह में योजना बनाकर वह 5 जनवरी तक मौके की तलाश में रहा। अपनी योजना की भनक उसने किसी दोस्त को भी नहीं लगने दिया। उसने सारा काम खुद किया ताकि गवाह न रहें। हत्या कर चुकने के बाद भी उसके चेहरे पर शिकन नहीं आई और वह परिवार के साथ बच्चे को ढूंढने का नाटक करता रहा। उड़ती चिड़िया के पर गिनने वाली पुलिस को भी गच्चा दे दिया किन्तु अपराध का राज खुलकर रहा। उसकी होशियारी ही उसके गले का फांस बन गई। हत्या करने के दूसरे दिन उसने मृतक के पिता को हाथ से पत्र लिखकर फिरौती की मांग की और अपनी राइटिंग नहीं छुपा पाया। पुलिस ने उसकी बनावटी लिखाई में भी स्ट्रोक्स को पहचान लिया और फिर उसकी गर्दन दबोच ली। अब चूंकि बच्चे की हत्या उसके अपहरण के चंद घंटों के भीतर ही कर दी गई थी इसलिए उसे रोक पाना शायद संभव नहीं होता किन्तु यहां फिर भी कुछ सवाल उठ खड़े होते हैं। पहला यह कि गुमशुदगी के मामले में मोहल्ले के लोग या पुलिस उस व्यक्ति तक पांच दिन बाद भी नहीं पहुंच पाई थी जिसके साथ 10 साल के सत्यजीत को अंतिम बार देखा गया था। गुमशुदगी या हत्या के मामलों में ऐसे व्यक्ति की तलाश पहली प्राथमिकता होती है जिसके साथ गुमशुदा या मृतक को अंतिम बार देखा गया होता है। जिस मोहल्ले में यह वारदात हुई वह नेहरू नगर नहीं था जहां पड़ोसी का मकान भी गिर जाए तो पड़ोसी को भनक नहीं लगती। यह वारदात एक ऐसे मोहल्ले में हुई जहां सुबह 5 बजे से रात 10 बजे तक सड़क पर लोगों का मजमा होता है। जहां लोग एक दूसरे को नाम एवं घर से पहचान लेते हैं। यहां इस बात का उल्लेख करना जरूरी होगा कि मृतक और आरोपी दोनों एक ही मोहल्ले के रहने वाले हैं और लोग दोनों को ही भली भांति पहचानते हैं। फिर भी पुलिस को सूचना नहीं मिलने की एक ही वजह हो सकती है कि लोग आज भी पुलिस का सहयोग कर ‘आ बैल मुझे मार नहीं कहना चाहते।’ यहां एक बात और है जो चुभती है। 15 दिन पहले आरोपी से मृतक की एक मामूली सी झड़प को इसका कारण बताया गया है। किन्तु जिस तरह ‘कोल्ड ब्लडेड डेलिबरेट मर्डर’ प्लान किया गया उससे यह क्षणिक आवेश का मामला नहीं जान पड़ता। चूंकि मृतक और प्रार्थी के बीच उम्र का एक बड़ा फासला है और मामला व्यवसायिक प्रतिद्वंद्विता का भी नहीं इसलिए यहां किसी तीसरे कोण की संभावना बनती है। आखिर क्या जानता था पांचवी का छात्र सत्यजीत? उसने ऐसा क्या देख लिया था कि उसे रास्ते से हटाना जरूरी हो गया? ये कुछ ऐसे सवाल हैं जो जनता के जेहन में उमड़ घुमड़ रहे हैं।
Monday, January 10, 2011
असामान्य सर्दी
जब दिल्ली का तापमान रिकार्ड तोड़कर शिमला से कम हो जाए और रेगिस्तानी इलाके राजस्थान के माउंटआबू का तापमान हिमांक से पांच डिग्री नीचे चला जाए तो निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि सर्दी असामान्य है। यूं तो अमेरिका व यूरोप असामान्य बर्फबारी की चपेट में हैं, वहां जनजीवन अस्तव्यस्त है। लेकिन संपन्न देशों की सरकारें व लोग आसन्न बर्फबारी की चुनौती के लिए तैयार रहते हैं। अपने देश में एक तो गरीबी की मार है, दूसरे सरकार व प्रशासन की काहिली। अब तक शीतलहर से मरने वालों का आंकड़ा पचास से ऊपर जा पहुंचा है। पिछले साल भी सौ से ऊपर था। लेकिन अबकी बार सर्दी का कहर जानलेवा है। लेह में तापमान -22 डिग्री तक जा पहुंचा है तथा कारगिल में हिमांक से 18 डिग्री नीचे तक जा पहुंचा है। ऐसे में देश के उन जवानों को श्रद्धापूर्वक याद किया जाना चाहिए जो रक्त जमाती सर्दी में सीमाओं की रक्षा में जुटे हैं। साइबेरिया व अन्य ठंडे प्रदेशों से भारत आने वाले प्रवासी पक्षी भी मौसम के बदलते तेवर देखकर हैरत में हैं और गर्म झरनों की तलाश में भटक रहे हैं। लेकिन गिरते पारे के रिकॉर्ड ने पक्षियों ही नहीं आदमी को भी हैरत में डाल दिया है। पारे में गिरावट के तमाम रिकॉर्ड टूट रहे हैं। मौसम विभाग की भविष्यवाणी डरा रही है कि मौसम के तेवर में हाल-फिलहाल सुधार की गुंजाइश नहीं है। इस रक्त जमाती सर्दी में इससे बचाने की सारी तैयारियां धरी की धरी रह गई है। सर्दी ने ऐसा सितम ढहाया है कि बच्चे-बूढ़े सभी बेदम है। कड़ाके की सर्दी ने अघोषित कर्फ्यू जैसी स्थिति पैदा कर दी है। लोग जैसे-तैसे सर्दी से लोहा लेने की कोशिश कर रहे हैं। सूरज देव के दर्शन दुर्लभ हो चले हैं। भारत जैसे गर्म जलवायु वाले देश में सर्दी का ये आलम चौंकाने वाला है। मौसम विज्ञानी दलील दे रहे हैं कि पश्चिमी विक्षोभ के कारण यह अप्रत्याशित ठंड पड़ रही है। लेकिन विज्ञानियों का एक समूह ऐसा भी है जो इसे हिमयुग की दस्तक मान रहा है। यूरोप में तो बर्फबारी के तमाम रिकार्ड टूट चुके हैं। इसका दूरगामी प्रवाह अंतर्राष्ट्रीय तापमान पर निश्चित पड़ेगा। दुनियाभर में मौसम की गड़बड़ी सामने आ रही है जिसे ग्लोबल कूलिंग की दस्तक के रूप में देखा जा रहा है। देहरादून स्थित बहुचर्चित वाडिया इंस्टिच्यूट आॅफ हिमालयन जियोलॉजी के वैज्ञानिकों का मानना है कि ये हिमयुग की शुरुआत की दस्तकभर है। वैज्ञानिकों का मानना है कि आने वाले दशकों में भारत में इसके प्रभाव बड़े पैमाने पर नजर आएंगे जिसके कारण आने वाले दशकों में तापमान गिरता ही जाएगा। यूरोप में होने वाली अप्रत्याशित बर्फबारी को भी इसी कड़ी में देखा जा रहा है। इसमें गर्मी का मौसम सर्दी के मुकाबले कम रहने के आसार हैं। धीरे-धीरे बर्फबारी का स्तर बढ़ता जाएगा जो फिर जानलेवा स्तर तक जा पहुंचेगा। वाडिया इंस्टिच्यूट के वैज्ञानिकों का कहना है कि उनके पास हिमयुग के आंकड़े उपलब्ध हैं जो 13वीं से 17वीं सदी के बीच के हैं। बहरहाल, हड्डियों में सिहरन पैदा करने वाली सर्दी से आम आदमी आसन्न खतरे की आहट तो महसूस कर ही रहा है। कश्मीर, उत्तराखंड व हिमाचल के कई इलाकों में हो रही अत्यधिक बर्फबारी व बारिश से मैदानी इलाके ठिठुर रहे हैं। मौसम विभाग की भविष्यवाणी पर विश्वास करें तो इस सर्दी से फिलहाल राहत मिलने वाली नहीं है। हालांकि, मोटे-मोटे कपड़े भी राहत नहीं दे रहे हैं लेकिन फिर भी ठंड से लोहा लेने का हौसला तो जुटाना ही होगा।
जनाकांक्षाओं पर भाजपा
कांग्रेस के दीर्घ शासनकाल में जनता को ऐसा लगा था कि अब कुछ नया होना चाहिए। जनता को एक बड़े विकल्प की तलाश थी। यह तलाश 1977 में पूरी हुई थी जनता पार्टी के रूप में। पर यह दुकान ज्यादा दिनों तक चली नहीं। इसके बाद दोबारा जनता ने मौका दिया भारतीय जनता पार्टी को। राजनीतिक विश्लेषकों को भले ही यह लगा हो कि रामजन्मभूमि का मुद्दा इसका कारण था पर यह उसकी असल वजह नहीं थी। जनता एक बार फिर बोर हो गई थी। बोरियत दूर करने के लिए ही उसने चैनल बदला था, बाहर खाने का प्रोग्राम बनाया था किन्तु शौक पूरा होते ही घर का बच्चा घर लौट आया था। कुछ-कुछ ऐसा ही छत्तीसगढ़ में भाजपा शासन के साथ होने जा रहा है। कहीं न कहीं समझने का फेर है। बेशक सरकार गरीबों की जिन्दगी आसान बनाने की फिक्रमंद है। सरकार ने अनगिनत ऐसी योजनाएं बनाईं और उसके क्रियान्वयन की शुरुआत की जिससे गरीबों के जीवन से कष्टों को दूर किया जा सके, मजदूरों की दुनिया से अनिश्चितता के बादलों को हटाया जा सके। इसका असर भी हुआ किन्तु जितना होना चाहिए था उतना नहीं हुआ। वजह एक ही थी। मुख्यमंत्री या कोई भी मंत्री राज्य के कोने कोने में जाकर योजनाओं का क्रियान्वयन नहीं कर सकता। इस काम के लिए सरकारी मशीनरी है। इसमें कब तेल डालना है, कहां तेल डालना है, कहां हथौड़ी चलानी है और कहां छेनी, इसका ज्ञान होना बहुत जरूरी है। भाजपा अब तक जितने भी बार फेल हुई है, प्रशासनिक नासमझी ही इसका कारण रही है। दूसरे भाजपा स्वयं को बौद्धिक रूप से इतना उन्नत मानती है कि वह किसी की नहीं सुनती। ठस दिमाग जड़ प्रवृत्ति का होता है। इससे डिक्टेटरशिप तो चलाया जा सकता है पर लोकतांत्रिक सत्ता नहीं चलाई जा सकती। डिक्टेटरशिप कभी नहीं चली न हिटलर की और न ही रूस में कम्युनिज्म की। जनाकांक्षाओं के प्रति बेपरवाही हमेशा भारी पड़ती है। बस्तर या देश के किसी भी वनांचल में प्रशासन दशकों तक ताकत का नग्न प्रदर्शन करता रहा है। नतीजा सामने है। आज पूरा प्रदेश बस्तर जैसा हो रहा है। कोई किसी की नहीं सुनता। प्रशासन और पुलिस ढिठाई की सारी सीमाएं लांघ चुके हैं। सरकार उन्हें बचाने में लगी है। किसानों पर लाठियां भांजी जा रही है, युवाओं की रैली को ठेंगा दिखाया जा रहा है। ऐन चुनावों से पहले की गई घोषणाओं एवं कार्यक्रमों ने एक हद तक जनता को भले ही भ्रमित किया हो किन्तु भिलाई नगर निगम चुनाव से ऐन पहले ‘वार फुटेज’ पर किए गए विकास कार्यों को जनता ने ठेंगा दिखा दिया। ढिठाई का सबसे बड़ा उदाहरण बिहार में देखने को मिला। यहां एक स्कूल टीचर रूपम पाठक ने पूर्णिया के बीजेपी एमएलए की हत्या कर दी। बीजेपी ने जांच का भी इंतजार नहीं किया और अपने आदमी को बचाने के लिए रूपम पाठक के चरित्र पर ही लांछन लगा दिया। जबकि अगर किसी व्यक्ति पर यौन शोषण के आरोप लग रहे हैं तो वह कानून की निश्चित प्रक्रिया द्वारा ही बरी हो सकता है।
मनमौजी चीथड़ा संस्कृति
बहुतों को यह शिकायत है कि हम जनरेशन गैप पर लिखते हैं। पर यह सही नहीं है। जनरेशन गैप तो हमेशा से रहा है। कभी चार पीढ़ियां एक घर में एक साथ रहा करती थी। फिर तीन हुई और अब दो पीढ़ियां मजबूरी में एक साथ रह रही हैं। दो पीढ़ियों का एक साथ रहना भी दरअसल एक भ्रम की तरह है। अब जो दो पीढ़ियां एक साथ एक छत के नीचे रह रही हैं वे अजनबी हैं। इनमें से एक पीढ़ी की जिम्मेदारी घर और दूसरी पीढ़ी की आवश्यकताओं को पूरा करना है जबकि दूसरी पीढ़ी अपने करियर और अपनी लाइफ से आगे कुछ नहीं देखती। यह पीढ़ी मनमौजी है। इन दोनों पीढ़ियों के बीच बहुत कम संवाद होता है। युवा पीढ़ी पूरी तरह युवाओं के लिए समर्पित है। वह मोबाइल, फेसबुक, आरकुट, ई-मेल और मैसेज की दुनिया में जीता है। हिन्दी फिल्मों के इंटरवेल से पहले तक की हीरो हीरोइन की जिन्दगी उसका आदर्श है। यह पीढ़ी बाजार से दुगुने पैसे देकर फटी जींस खरीदती है, चीथड़ों जैसे कपड़ों को ‘फंकी’ कहती है और पार्टी में उछल कूद करना चाहती है। उलटे सीवन के कपड़े उसकी पसंद हैं। वह शोरूम से पैबंद लगे कपड़े खरीदती है। पेट को डस्टबिन की तरह यूज़ करती है और त्वचा और बाल के लिए डाक्टर और विज्ञापन की सलाह लेती है। इस पीढ़ी का युवा टेस्ट देखकर केक खरीदता है और उसे मुंह पर पोतकर बर्थडे मनाता है। वह फुग्गे फुलाता ही उसे फोड़ने के लिए है। पर इसमें भी दोष उसका नहीं है। विज्ञान के नाम पर प्रकृति से इतनी छेड़छाड़ हुई है कि वह अपने मौसम भूल चुकी है। कहते हैं कि नवम्बर 2012 से आगे का पंचाङ्ग बनाने में दिक्कतें आ रही हैं। समूचा यूरोप इस महीने हिमयुग की यादें ताजा कर रहा है। भूगर्भ का तेल चुकने वाला है। हरी भरी धरती की बैंड बजाने के बाद इंसान चांद और मंगल पर डेरा डालने की तैयारी कर रहा है। इस सबका असर इंसानों पर भी पड़ेगा इससे इंकार नहीं किया जा सकता। इसका असर पड़ा है और वह प्रत्यक्ष दिखाई दे रहा है। 18-19 साल का युवा एक तरफ तो इंजीनियरिंग और आईटी बूम की बातें करता है वहीं दूसरी तरफ नशे की गिरफ्त में चूर होकर रातें काली कर रहा है। जरूरी नहीं कि यह नशा शरब, सिगरेट, हशिश, चरस, एलएसडी का हो। यह नशा दोस्तों की तलाश का भी हो सकता है। लोग फेसबुक पर, आर्कुट पर, फ्रेंड फाइंडर पर दोस्त तलाश रहे हैं। उनके आसपास रहने वाले उनके कोई नहीं। इनके बीच चेहरे पर मुखौटा लगाकर रहना होता है। इसलिए अब ऐसे दोस्तों की तलाश है जिनसे वे दिल खोलकर बातें कर सकें। जो उन्हें परवर्ट न कहें, जो उन्हें ताने न दें। भले ही इस काम के वह पैसे ले। प्रोफेशनल दोस्ती निभाए। पर वह उनके साथ उनके सपनों की दुनिया की सैर करे और उनकी सही गलत हर बात की ‘एप्रिशिएट’ करे। उसके लिए शरीर एक साधन मात्र है जिसके चुकने की उसे परवाह नहीं। उसका यह बेपरवाह रवैया उसकी हरकतों से झलकता है। हम इस पीढ़ी पर लिखते हैं।
इसे कहते हैं सरकारी काम
सरकार ने सुबह की पाली में लगने वाले स्कूलों को 9:30 बजे के बाद खोलने के लिए कहा है। वह भी खून जमाने वाली सर्दी पड़ने के लगभग पखवाड़े बाद। बच्चों के सबसे करीब रहने वाले गुरुजी और स्कूल के संचालकों को एक बार भी नहीं सूझा कि वे बच्चों को राहत दें। सरकारी स्कूल तो खैर बिना जिला शिक्षा अधिकारी या कलेक्टर के आदेश के अपना समय नहीं बदल सकते किन्तु परीक्षा, स्पोटर््स डे, वार्षिक उत्सव, टैलेन्ट सर्च के नाम पर घड़ी-घड़ी स्कूल के समय में परिवर्तन करने या अवकाश की घोषणा करने वाले निजी क्षेत्र के स्कूलों में भी न जाने कहां की होड़ है कि वे बच्चों की फिक्र बिल्कुल नहीं करते। वैसे कष्टों का यह काम्पीटिशन हमारे खून में है। जिसके उपवास में जितने अधिक कष्ट, वह उतना बढ़िया उपवास। जिसके यहां शादी में ज्यादा क्लिष्ट रिवाज वह उतना ही ज्यादा कुलीन। ईश्वर को खुश करने जो हाथ, पांव, मुंह, जीभ को बानों से भेद लेता है वह बड़ा भक्त। उससे भी बड़ा भक्त वह जो जीभ को काटकर देवी के चरणों में चढ़ा आता है। दरअसल सवाल सिर्फ कष्टों का नहीं है। गरीब तो कष्ट सहने का ही आदी है। सप्ताह में तीन दिन उपवास करने पर उसके यहां राशन बचता है। एचबी 8 भी हो तब भी अंडी की साड़ी लपेटने के अलावा उसके पास कोई विकल्प नहीं। कष्टों का यह अहसास अधिकारियों को तब स्पर्श करता है जब स्वेटर ब्लेजर पहनकर कार से स्कूल जाने वाला उसका लाल भी सुबह कंबल से निकलने से इंकार कर देता है। जब उनकी बीवियां सुबह-सुबह उठकर चाय या बूस्ट बनाने से इंकार कर देती हैं। तब उन्हें लगता है कि हां, ठंड पड़ गई है। वैसे अंचल में कुछ निजी स्कूल भी हैं जहां प्राइमरी के बच्चों की कक्षाएं सुबह की पाली में लगाई जाती हैं और बड़े बच्चों की दूसरी पाली में। ये बच्चे अकेले ठंड ही नहीं बल्कि बारिश के दिनों में भी मुंह अंधेरे स्कूल जाते हैं। कहना न होगा कि ऐसे बच्चों के साथ सख्ती सुबह साढ़े पांच बजे के आसपास उनके घर से ही शुरू हो जाती है। उन्हें जबरदस्ती बिस्तरों से खींचा जाता है, साफ सुथरा किया जाता है और दूध ब्रेड खिलाकर स्कूल भेज दिया जाता है। क्या उसके बाल मन में अपने माता-पिता, अपने स्कूल और टीचर्स के प्रति आक्रोश नहीं उत्पन्न होता होगा? स्कूल और समाज के प्रति अरुचि, विद्वेष और वितृष्णा कहीं इसीका नतीजा तो नहीं?
चिकने का शेविंग किट
लोकतंत्र है तो क्या हुआ? सरकार पांच साल के लिए आॅल पावरफुल होती है। वह जो जी में आए कर सकती है। उसे कोई नहीं रोक सकता। उसके पास अधिकार है। पालन कराने को पुलिस है। वह चिकनों को शेविंग किट बांट सकती है और फिर उन्हें तालियां बजाने के लिए भी कह सकती है। कुछ कुछ ऐसा ही हो रहा है भिलाई में फोरलेन रोड के साथ। टाउनशिप का सेन्ट्रल एवेन्यू सिक्स लेन है पर वह हाईवे नहीं है। उसपर चलने के पैसे भी नहीं लगते। जीई रोड फोरलेन है पर हाईवे है। इस सड़क के लिए जनता प्रतिवर्ष हजारों करोड़ रुपए अदा कर रही है, वह भी प्रत्यक्ष। बावजूद इसके चल सरकार की रही है। यह नए जमाने की जमींदारी है। पैसे वाले आपकी सड़क, आपका मैदान आपके अधिकार कुछ भी खरीद सकते हैं। लोगों को एक चौड़ी सड़क चाहिए थे। गलियों में हर दस मीटर पर गड्ढा और हर चिकनी सड़क पर बीसियों ब्रेकर हैं। शहर के बीच से दौड़ती प्रमुख सड़क एकाएक सुपर फास्ट हो गई। इस मार्ग पर पैदल चलने वालों के लिए कोई फुटपाथ नहीं है फिर भी फुट ओवर ब्रिज बन रहा है। एक या दो नहीं पूरे पांच। पर हासिल क्या है? लोग जनरल स्टोर से निकलेंगे और फुटवेयर दुकान में उतरेंगे। चलने के लिए जगह कहां है? अब तो तरीका एक ही है कि एक और सड़क फोरलेन के ऊपर से फ्लाइओवर की तरह बनाई जाए और उससे एक एक सीढ़ी दोनों तरफ की दुकानों के लिए उतार दी जाए। या फिर जीई रोड के दोनों तरफ की दुकानों के मुंह पीछे कर दिए जाएं और एक एक सड़क आम आदमी के लिए पीछे की तरफ से बना दी जाए। जिस सड़क के लिए एक-एक पैसा जनता दे रही है वह यदि जनता के लिए ही सिरदर्द साबित हो तो इसे क्या कहेंगे? सरकार की बेहिसी या बेशर्मी। अव्वल तो जिस दर्जे की सड़क इसे बताया जा रहा है वह शहर के बीच से होकर क्यों है? दरअसल यातायात के बढ़ते दबाव के चलते सड़क के चौड़ीकरण की जरूरत थी। सड़क बनाने के पैसे सांसदों, विधायकों और सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों के वेतन भत्तों पर ही खर्च हो जाते हैं। लिहाजा सड़क बनाने के लिए बीओटी पद्धति विकसित की गई। अब सड़क बनाने वाला पैसे तो वसूलेगा ही। इसके लिए उसने टोल बैरियर लगाए और तगड़ी वसूली शुरू कर दी। चूंकि सरकारी वाहन फ्री हैं इसलिए वह कितने पैसे वसूल रहा है इससे सरकार को कोई वास्ता नहीं। इसमें सबसे ज्यादा पैसा कमर्शियल ट्रांसपोर्टर दे रहा है इसलिए उसे सपाट खुली हुई सड़क चाहिए। सो उसे सपाट खुली हुई सड़क देने की कोशिश की जा रही है। किन्तु मुश्किल यह है कि जिस सड़क का वे एक्सप्रेस हाईवे की तरह इस्तेमाल करना चाह रहे हैं उसके दोनों तरफ घनी आबादी है। छोटी छोटी जरूरतों के लिए उन्हें सड़क पार करनी पड़ती है। यह सिलसिला नेहरू नगर से लेकर कुम्हारी तक लगातार चलता रहता है। वे रुक नहीं सकते कि उनकी मजबूरी है। फिर चाहे इस कोशिश में उनकी जान ही क्यों न चली जाए। फोरलेन पर मरेगा तो बीमा कम्पनी भी हाथ झाड़कर अलग खड़ा हो जाएगा। सरकार थोड़ा मुआवजा दे देगी। यही गरीब की जिन्दगी है।
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