photo journalist from chhattisgarh. Worked for the Navabharat in Orissa as bureau chief. Presently with the Haribhoomi Super Central Desk.
Monday, January 10, 2011
मनमौजी चीथड़ा संस्कृति
बहुतों को यह शिकायत है कि हम जनरेशन गैप पर लिखते हैं। पर यह सही नहीं है। जनरेशन गैप तो हमेशा से रहा है। कभी चार पीढ़ियां एक घर में एक साथ रहा करती थी। फिर तीन हुई और अब दो पीढ़ियां मजबूरी में एक साथ रह रही हैं। दो पीढ़ियों का एक साथ रहना भी दरअसल एक भ्रम की तरह है। अब जो दो पीढ़ियां एक साथ एक छत के नीचे रह रही हैं वे अजनबी हैं। इनमें से एक पीढ़ी की जिम्मेदारी घर और दूसरी पीढ़ी की आवश्यकताओं को पूरा करना है जबकि दूसरी पीढ़ी अपने करियर और अपनी लाइफ से आगे कुछ नहीं देखती। यह पीढ़ी मनमौजी है। इन दोनों पीढ़ियों के बीच बहुत कम संवाद होता है। युवा पीढ़ी पूरी तरह युवाओं के लिए समर्पित है। वह मोबाइल, फेसबुक, आरकुट, ई-मेल और मैसेज की दुनिया में जीता है। हिन्दी फिल्मों के इंटरवेल से पहले तक की हीरो हीरोइन की जिन्दगी उसका आदर्श है। यह पीढ़ी बाजार से दुगुने पैसे देकर फटी जींस खरीदती है, चीथड़ों जैसे कपड़ों को ‘फंकी’ कहती है और पार्टी में उछल कूद करना चाहती है। उलटे सीवन के कपड़े उसकी पसंद हैं। वह शोरूम से पैबंद लगे कपड़े खरीदती है। पेट को डस्टबिन की तरह यूज़ करती है और त्वचा और बाल के लिए डाक्टर और विज्ञापन की सलाह लेती है। इस पीढ़ी का युवा टेस्ट देखकर केक खरीदता है और उसे मुंह पर पोतकर बर्थडे मनाता है। वह फुग्गे फुलाता ही उसे फोड़ने के लिए है। पर इसमें भी दोष उसका नहीं है। विज्ञान के नाम पर प्रकृति से इतनी छेड़छाड़ हुई है कि वह अपने मौसम भूल चुकी है। कहते हैं कि नवम्बर 2012 से आगे का पंचाङ्ग बनाने में दिक्कतें आ रही हैं। समूचा यूरोप इस महीने हिमयुग की यादें ताजा कर रहा है। भूगर्भ का तेल चुकने वाला है। हरी भरी धरती की बैंड बजाने के बाद इंसान चांद और मंगल पर डेरा डालने की तैयारी कर रहा है। इस सबका असर इंसानों पर भी पड़ेगा इससे इंकार नहीं किया जा सकता। इसका असर पड़ा है और वह प्रत्यक्ष दिखाई दे रहा है। 18-19 साल का युवा एक तरफ तो इंजीनियरिंग और आईटी बूम की बातें करता है वहीं दूसरी तरफ नशे की गिरफ्त में चूर होकर रातें काली कर रहा है। जरूरी नहीं कि यह नशा शरब, सिगरेट, हशिश, चरस, एलएसडी का हो। यह नशा दोस्तों की तलाश का भी हो सकता है। लोग फेसबुक पर, आर्कुट पर, फ्रेंड फाइंडर पर दोस्त तलाश रहे हैं। उनके आसपास रहने वाले उनके कोई नहीं। इनके बीच चेहरे पर मुखौटा लगाकर रहना होता है। इसलिए अब ऐसे दोस्तों की तलाश है जिनसे वे दिल खोलकर बातें कर सकें। जो उन्हें परवर्ट न कहें, जो उन्हें ताने न दें। भले ही इस काम के वह पैसे ले। प्रोफेशनल दोस्ती निभाए। पर वह उनके साथ उनके सपनों की दुनिया की सैर करे और उनकी सही गलत हर बात की ‘एप्रिशिएट’ करे। उसके लिए शरीर एक साधन मात्र है जिसके चुकने की उसे परवाह नहीं। उसका यह बेपरवाह रवैया उसकी हरकतों से झलकता है। हम इस पीढ़ी पर लिखते हैं।
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