photo journalist from chhattisgarh. Worked for the Navabharat in Orissa as bureau chief. Presently with the Haribhoomi Super Central Desk.
Monday, January 10, 2011
चिकने का शेविंग किट
लोकतंत्र है तो क्या हुआ? सरकार पांच साल के लिए आॅल पावरफुल होती है। वह जो जी में आए कर सकती है। उसे कोई नहीं रोक सकता। उसके पास अधिकार है। पालन कराने को पुलिस है। वह चिकनों को शेविंग किट बांट सकती है और फिर उन्हें तालियां बजाने के लिए भी कह सकती है। कुछ कुछ ऐसा ही हो रहा है भिलाई में फोरलेन रोड के साथ। टाउनशिप का सेन्ट्रल एवेन्यू सिक्स लेन है पर वह हाईवे नहीं है। उसपर चलने के पैसे भी नहीं लगते। जीई रोड फोरलेन है पर हाईवे है। इस सड़क के लिए जनता प्रतिवर्ष हजारों करोड़ रुपए अदा कर रही है, वह भी प्रत्यक्ष। बावजूद इसके चल सरकार की रही है। यह नए जमाने की जमींदारी है। पैसे वाले आपकी सड़क, आपका मैदान आपके अधिकार कुछ भी खरीद सकते हैं। लोगों को एक चौड़ी सड़क चाहिए थे। गलियों में हर दस मीटर पर गड्ढा और हर चिकनी सड़क पर बीसियों ब्रेकर हैं। शहर के बीच से दौड़ती प्रमुख सड़क एकाएक सुपर फास्ट हो गई। इस मार्ग पर पैदल चलने वालों के लिए कोई फुटपाथ नहीं है फिर भी फुट ओवर ब्रिज बन रहा है। एक या दो नहीं पूरे पांच। पर हासिल क्या है? लोग जनरल स्टोर से निकलेंगे और फुटवेयर दुकान में उतरेंगे। चलने के लिए जगह कहां है? अब तो तरीका एक ही है कि एक और सड़क फोरलेन के ऊपर से फ्लाइओवर की तरह बनाई जाए और उससे एक एक सीढ़ी दोनों तरफ की दुकानों के लिए उतार दी जाए। या फिर जीई रोड के दोनों तरफ की दुकानों के मुंह पीछे कर दिए जाएं और एक एक सड़क आम आदमी के लिए पीछे की तरफ से बना दी जाए। जिस सड़क के लिए एक-एक पैसा जनता दे रही है वह यदि जनता के लिए ही सिरदर्द साबित हो तो इसे क्या कहेंगे? सरकार की बेहिसी या बेशर्मी। अव्वल तो जिस दर्जे की सड़क इसे बताया जा रहा है वह शहर के बीच से होकर क्यों है? दरअसल यातायात के बढ़ते दबाव के चलते सड़क के चौड़ीकरण की जरूरत थी। सड़क बनाने के पैसे सांसदों, विधायकों और सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों के वेतन भत्तों पर ही खर्च हो जाते हैं। लिहाजा सड़क बनाने के लिए बीओटी पद्धति विकसित की गई। अब सड़क बनाने वाला पैसे तो वसूलेगा ही। इसके लिए उसने टोल बैरियर लगाए और तगड़ी वसूली शुरू कर दी। चूंकि सरकारी वाहन फ्री हैं इसलिए वह कितने पैसे वसूल रहा है इससे सरकार को कोई वास्ता नहीं। इसमें सबसे ज्यादा पैसा कमर्शियल ट्रांसपोर्टर दे रहा है इसलिए उसे सपाट खुली हुई सड़क चाहिए। सो उसे सपाट खुली हुई सड़क देने की कोशिश की जा रही है। किन्तु मुश्किल यह है कि जिस सड़क का वे एक्सप्रेस हाईवे की तरह इस्तेमाल करना चाह रहे हैं उसके दोनों तरफ घनी आबादी है। छोटी छोटी जरूरतों के लिए उन्हें सड़क पार करनी पड़ती है। यह सिलसिला नेहरू नगर से लेकर कुम्हारी तक लगातार चलता रहता है। वे रुक नहीं सकते कि उनकी मजबूरी है। फिर चाहे इस कोशिश में उनकी जान ही क्यों न चली जाए। फोरलेन पर मरेगा तो बीमा कम्पनी भी हाथ झाड़कर अलग खड़ा हो जाएगा। सरकार थोड़ा मुआवजा दे देगी। यही गरीब की जिन्दगी है।
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