Tuesday, January 11, 2011

छुपाए नहीं छुपता पाप

अंग्रेजी में कहावत है, ‘क्राइम नेवर पेज़’ अर्थात अपराध आपको स्थायी लाभ नहीं दे सकता। यह एक न एक दिन फूट कर बाहर आता ही है और तब जिन्दगी का सब पाया खोया बराबर हो जाता है। शुद्ध हिन्दी में कहें तो अपराधी लाख होशियार हो, अपराध के बाद वह सबूत और सुराग छोड़ता ही है। केम्प-1 के अजय राम ने भी यही किया। उसने आवेश में आकर हत्या नहीं की बल्कि ठंडे दिमाग से सोच समझकर हत्या की योजना बनाई। लाश को ठिकाने लगाने की जगह भी तय कर ली। दिसम्बर के अंतिम सप्ताह में योजना बनाकर वह 5 जनवरी तक मौके की तलाश में रहा। अपनी योजना की भनक उसने किसी दोस्त को भी नहीं लगने दिया। उसने सारा काम खुद किया ताकि गवाह न रहें। हत्या कर चुकने के बाद भी उसके चेहरे पर शिकन नहीं आई और वह परिवार के साथ बच्चे को ढूंढने का नाटक करता रहा। उड़ती चिड़िया के पर गिनने वाली पुलिस को भी गच्चा दे दिया किन्तु अपराध का राज खुलकर रहा। उसकी होशियारी ही उसके गले का फांस बन गई। हत्या करने के दूसरे दिन उसने मृतक के पिता को हाथ से पत्र लिखकर फिरौती की मांग की और अपनी राइटिंग नहीं छुपा पाया। पुलिस ने उसकी बनावटी लिखाई में भी स्ट्रोक्स को पहचान लिया और फिर उसकी गर्दन दबोच ली। अब चूंकि बच्चे की हत्या उसके अपहरण के चंद घंटों के भीतर ही कर दी गई थी इसलिए उसे रोक पाना शायद संभव नहीं होता किन्तु यहां फिर भी कुछ सवाल उठ खड़े होते हैं। पहला यह कि गुमशुदगी के मामले में मोहल्ले के लोग या पुलिस उस व्यक्ति तक पांच दिन बाद भी नहीं पहुंच पाई थी जिसके साथ 10 साल के सत्यजीत को अंतिम बार देखा गया था। गुमशुदगी या हत्या के मामलों में ऐसे व्यक्ति की तलाश पहली प्राथमिकता होती है जिसके साथ गुमशुदा या मृतक को अंतिम बार देखा गया होता है। जिस मोहल्ले में यह वारदात हुई वह नेहरू नगर नहीं था जहां पड़ोसी का मकान भी गिर जाए तो पड़ोसी को भनक नहीं लगती। यह वारदात एक ऐसे मोहल्ले में हुई जहां सुबह 5 बजे से रात 10 बजे तक सड़क पर लोगों का मजमा होता है। जहां लोग एक दूसरे को नाम एवं घर से पहचान लेते हैं। यहां इस बात का उल्लेख करना जरूरी होगा कि मृतक और आरोपी दोनों एक ही मोहल्ले के रहने वाले हैं और लोग दोनों को ही भली भांति पहचानते हैं। फिर भी पुलिस को सूचना नहीं मिलने की एक ही वजह हो सकती है कि लोग आज भी पुलिस का सहयोग कर ‘आ बैल मुझे मार नहीं कहना चाहते।’ यहां एक बात और है जो चुभती है। 15 दिन पहले आरोपी से मृतक की एक मामूली सी झड़प को इसका कारण बताया गया है। किन्तु जिस तरह ‘कोल्ड ब्लडेड डेलिबरेट मर्डर’ प्लान किया गया उससे यह क्षणिक आवेश का मामला नहीं जान पड़ता। चूंकि मृतक और प्रार्थी के बीच उम्र का एक बड़ा फासला है और मामला व्यवसायिक प्रतिद्वंद्विता का भी नहीं इसलिए यहां किसी तीसरे कोण की संभावना बनती है। आखिर क्या जानता था पांचवी का छात्र सत्यजीत? उसने ऐसा क्या देख लिया था कि उसे रास्ते से हटाना जरूरी हो गया? ये कुछ ऐसे सवाल हैं जो जनता के जेहन में उमड़ घुमड़ रहे हैं।

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