Wednesday, January 12, 2011

इस घर को आग लगी

नगर निगम सभापति चुनाव में आखिर ऐसा क्या हुआ कि 29 पार्षदों तथा राज्य में सत्तासीन पार्टी की बखिया उधड़Þ गई? इस चुनाव में कांग्रेस को बहुमत जुटाना तो दूर बराबरी करने के लिए भी सात मतों की जरूरत थी पर उसका सभापति प्रत्याशी एक दो नहीं वरन पूरे छह वोटों से आगे निकल गया। इसे सीधे-सीधे पार्टी की लोकप्रियता से जोड़कर देखना हिमाकत होगी। जाहिर है कि इस उलटफेर के लिए जिम्मेदार कारण कुछ और ही हैं। दरअसल वैशाली नगर उपचुुनाव के बाद से ही भारतीय जनता पार्टी की अंदरूनी लड़ाई इतनी तेज हो गई कि इसका सीधा असर नगर निगम के चुनाव पर पड़ा। सांसद सरोज पाण्डेय ने एकतरफा अपनी चलाकर विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष प्रेम प्रकाश पाण्डेय खेमे को हाशिए पर ला खड़ा किया। महापौर पद पर कांग्रेस प्रत्याशी निर्मला यादव भारी मतों से जीती किन्तु जहां तक पार्षदों का सवाल है कांग्रेस अल्पमत में ही रही। कांग्रेस के 22 के मुकाबले भाजपा ने 29 सीटें जीतीं। परिणाम के बाद उम्मीद थी कि निगम अध्यक्ष पद पर भाजपा का कब्जा होगा। भाजपा के वरिष्ठ नेता लीलाराम भोजवानी व सच्चिदानंद उपासने ने जी तोड़ कोशिशें कीं, यहां तक कि पार्षदों को बारनवापारा भेज दिया गया। पर बात बनी नहीं। बागियों को मिलाना तो दूर पार्टी टिकट पर विजयी पार्षदों ने भी क्रास वोटिंग की। भाजपा के पार्षदों की मानें तो सभापति प्रत्याशी को लेकर हुई सहमति पर उन्हें धोखा दिया गया। रात को तय कुछ हुआ और सुबह रजनीशकांत कन्नौजे से नामांकन पत्र भरवाया गया। बागियों की राय को दरकिनार कर दिया गया। इधर कांग्रेस के रणनीतिकार पूरे घटनाक्रम पर नजर रखे हुए थे। जैसे ही कन्नौजे ने नामांकन दाखिल किया वैसे ही विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रविन्द्र चौबे के करीबी राजेन्द्र अरोरा को कांग्रेस ने उम्मीदवार घोषित कर दिया। राजेन्द्र अरोरा ने न केवल पार्षद चुनाव में हैट्रिक बनाई है बल्कि रिकार्ड मतों से जीते हैं। कांग्रेस ने निर्दलियों को अपनी तरफ करने का काम पहले ही शुरु कर दिया था तथा छत्तीसगढ़ स्वाभिमान मंच को अपने पक्ष में करने में कामयाब रही थी। मंच की तरफ से एक दिन पहले ही समर्थन की घोषणा सार्वजनिक की जा चुकी थी। कांग्रेस की तरफ से राजनांदगांव के महापौर नरेश डाकलिया ने जबरदस्त लाबिंग की थी। इसके बावजूद भाजपा ने कमजोर प्रत्याशी खड़ा कर एक तरह से अपने हाथ खड़े कर दिये। नतीजा यह रहा कि तीसरी बार रिकार्ड मतों से जीत दर्ज करने वाले राजेन्द्र अरोरा ने विपरीत परिस्थितियों में भी सभापतित्व का चुनाव रिकार्ड मतों से जीत लिया। यही नहीं भाजपा ने अपील समिति या नेता प्रतिपक्ष चुनने में भी ढिलाई का परिचय दिया तथा कद्दावर पार्षदों को हाशिए पर ही रखा। इससे यह कहा जा सकता है कि आगे भी निगम में भाजपा का प्रदर्शन कमजोर ही रहेगा। बहरहाल भाजपा के पास 29 पार्षदों की फौज होगी जिसके बूते वह विकास कार्यों में अपनी भूमिका को रेखांकित करने में समर्थ हो सकती है बशर्ते पार्टी के बड़े नेता अपने प्रभुत्व को तिलांजलि दें। घमंड ने तो प्रकांड विद्वान त्रिलोक विजयी रावण को नहीं बख्शा था...

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