Monday, January 10, 2011

इसे कहते हैं सरकारी काम

सरकार ने सुबह की पाली में लगने वाले स्कूलों को 9:30 बजे के बाद खोलने के लिए कहा है। वह भी खून जमाने वाली सर्दी पड़ने के लगभग पखवाड़े बाद। बच्चों के सबसे करीब रहने वाले गुरुजी और स्कूल के संचालकों को एक बार भी नहीं सूझा कि वे बच्चों को राहत दें। सरकारी स्कूल तो खैर बिना जिला शिक्षा अधिकारी या कलेक्टर के आदेश के अपना समय नहीं बदल सकते किन्तु परीक्षा, स्पोटर््स डे, वार्षिक उत्सव, टैलेन्ट सर्च के नाम पर घड़ी-घड़ी स्कूल के समय में परिवर्तन करने या अवकाश की घोषणा करने वाले निजी क्षेत्र के स्कूलों में भी न जाने कहां की होड़ है कि वे बच्चों की फिक्र बिल्कुल नहीं करते। वैसे कष्टों का यह काम्पीटिशन हमारे खून में है। जिसके उपवास में जितने अधिक कष्ट, वह उतना बढ़िया उपवास। जिसके यहां शादी में ज्यादा क्लिष्ट रिवाज वह उतना ही ज्यादा कुलीन। ईश्वर को खुश करने जो हाथ, पांव, मुंह, जीभ को बानों से भेद लेता है वह बड़ा भक्त। उससे भी बड़ा भक्त वह जो जीभ को काटकर देवी के चरणों में चढ़ा आता है। दरअसल सवाल सिर्फ कष्टों का नहीं है। गरीब तो कष्ट सहने का ही आदी है। सप्ताह में तीन दिन उपवास करने पर उसके यहां राशन बचता है। एचबी 8 भी हो तब भी अंडी की साड़ी लपेटने के अलावा उसके पास कोई विकल्प नहीं। कष्टों का यह अहसास अधिकारियों को तब स्पर्श करता है जब स्वेटर ब्लेजर पहनकर कार से स्कूल जाने वाला उसका लाल भी सुबह कंबल से निकलने से इंकार कर देता है। जब उनकी बीवियां सुबह-सुबह उठकर चाय या बूस्ट बनाने से इंकार कर देती हैं। तब उन्हें लगता है कि हां, ठंड पड़ गई है। वैसे अंचल में कुछ निजी स्कूल भी हैं जहां प्राइमरी के बच्चों की कक्षाएं सुबह की पाली में लगाई जाती हैं और बड़े बच्चों की दूसरी पाली में। ये बच्चे अकेले ठंड ही नहीं बल्कि बारिश के दिनों में भी मुंह अंधेरे स्कूल जाते हैं। कहना न होगा कि ऐसे बच्चों के साथ सख्ती सुबह साढ़े पांच बजे के आसपास उनके घर से ही शुरू हो जाती है। उन्हें जबरदस्ती बिस्तरों से खींचा जाता है, साफ सुथरा किया जाता है और दूध ब्रेड खिलाकर स्कूल भेज दिया जाता है। क्या उसके बाल मन में अपने माता-पिता, अपने स्कूल और टीचर्स के प्रति आक्रोश नहीं उत्पन्न होता होगा? स्कूल और समाज के प्रति अरुचि, विद्वेष और वितृष्णा कहीं इसीका नतीजा तो नहीं?

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