photo journalist from chhattisgarh. Worked for the Navabharat in Orissa as bureau chief. Presently with the Haribhoomi Super Central Desk.
Sunday, January 16, 2011
लोकतंत्र के कीड़े-मकोड़े
अगर जूडिशरी गरीबों के लिए कोई पहल न करे तो हाशिए पर रहने वालों का क्या होगा- यह सवाल किसी भी संवेदनशील नागरिक को परेशान कर सकता है। इसकी वजह शायद यह है कि हमारे यहां की जूडिशरी पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप पर आधारित है। यहां के 99.99 फीसदी वकील निजी तौर पर प्रैक्टिस करते हैं और अपनी इमेज बनाना चाहते हैं। इसे एक विडंबना ही कहा जाएगा कि हमारी जनतांत्रिक व्यवस्था में निर्धनों के लिए एकमात्र सहारा अदालतें बनी हुई हैं। सरकार ने तो जैसे मान रखा है कि बेघर- बेसहारा नागरिकों के प्रति उसकी कोई जवाबदेही नहीं है। वे मरें, चाहे जीएं, उसे कोई फर्क नहीं पड़ता। सरकारी बाबुओं की खाल इतनी मोटी हो चुकी है कि उन्हें हाड़ कंपा देने वाली ठंड में भी गरीबों के रैन-बसेरों को उजाड़ देने और उनके लिए आवंटित राशि को डकार लेने में भी शर्म नहीं आती। जब कोर्ट का डंडा बरसता है तो आनन-फानन में रैन-बसेरे बनते हैं सिर्फ दिखाने के लिए। इस बात की जांच नहीं होती कि वहां बुनियादी सुविधाएं भी ढंग से उपलब्ध कराई गई हैं या नहीं? यह कोई एक-दो जगह की बात नहीं है। पिछले कई सालों से उत्तर भारत के अनेक राज्यों में यही कहानी दोहराई जा रही है। जब कड़ाके की ठंड पड़ने लगती है तो हाई कोर्ट सरकार को यह याद दिलाती है कि वह गरीबों के लिए कदम उठाए। दबाव में सरकारें सक्रिय होती हैं। राजधानी में तो लगता है कि सरकारी एजेंसियां संवेदनहीनता का रेकॉर्ड बनाने पर आमादा हैं। यहां फुटपाथ पर रहने वाली कई गर्भवती औरतों को मजबूरन सड़क पर ही अपने बच्चे को जन्म देना पड़ता है। सिर्फ इसलिए कि सरकारी अस्पताल उन्हें एडमिट करने से इनकार कर देते हैं। दो साल पहले शांति देवी नामक महिला को यह कहकर लौटा दिया गया था कि वह बीपीएलमें नहीं आती। जबकि वह इस कैटिगरी में आती थी। अस्पताल वालों की बेरुखी के कारण वह महिला जान से हाथ धो बैठी। ऐसे ही कुछ मामलों को ध्यान में रखकर दिल्ली हाई कोर्ट ने सरकार को निर्देश दिया है कि वह बेसहारा गर्भवती स्त्रियों के लिए विशेष शेल्टर बनाए। कहने को तो सरकार ने गरीब गर्भवती स्त्रियों के लिए कई तरह की स्कीमें चला रखी हैं, पर सरकारी अस्पताल उन योजनाओं का पालन करने में कोई रुचि नहीं दिखाते। अगर उनसे कुछ कहा जाए तो वे संसाधनों की कमी का रोना रोने लगते हैं। दरअसल हमारे सिस्टम में जवाबदेही और संवेदनशीलता का घोर अभाव हो गया है। अब सिर्फ प्रेशर ग्रुप्स की बात सुनी जाती है। चूंकि गरीब इस देश में प्रेशर ग्रुप नहीं हैं, इसलिए उनकी चिंता कोई नहीं करता। सरकारी तंत्र की संवेदनहीनता के लिए क्या आज का सामाजिक माहौल भी जिम्मेवार नहीं है? इस बात पर विचार करना चाहिए कि कहीं हमारे भीतर जड़ जमाते व्यक्तिवाद ने हमें कमजोर वर्ग से दूर तो नहीं कर दिया है?
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
जिस कमजोर वर्ग की आप बात कर रहे है उसका कमजोर रहना ही इस भीड तंत्र के लिऐ जरूरी हैं, असप इस कमजोर वर्ग को मक्कार कहने से इस लिऐ कतरा रहे हैं बंअवारे के लोकतंत्र में इनके वोट हमेशा ज्यादा रहते हैं और यहां मनोविज्ञान भी यही हैं जिधर दम उधर हम....वैसे दीपक जी व्यवस्था को कोसना सबसे आसान काम हैं .. सतीश कुमार चौहान भिलाई
ReplyDelete