Monday, August 9, 2010

आध्यात्म की दुकान

आध्यात्म अब फकीरों की जागीर नहीं रही। अब बड़े-बड़े आदमी कर्त्तव्यों को छोड़ आध्यात्म की चर्चा करने लगे हैं। स्कूलों में पूरी छुट्टी के बाद शाला निदेशक भूख से बिलबिला रहे बच्चों को पका रहे हैं। अपनी तकलीफों को लेकर वरिष्ठ अधिकारियों के पास जाने वाले अधीनस्थ कर्मचारियों को पकाया जा रहा है। समस्या का समाधान न ढूंढकर समस्या की आध्यात्मिक विवेचना की जा रही है। वंचित, पीड़ित, शोषित लोगों को समझाया जा रहा है कि सभी उंगलियां बराबर नहीं होतीं। जिस तरह उंगलियां छोटी-बड़ी होती हैं उसी तरह समाज में लोग ऊंचे-नीचे होते हैं। इसे कानून बनाकर नहीं बदला जा सकता। अंग्रेजों के जमाने का हवाला दिया जा रहा है जब जाति पूछकर ही नौकरियां दी जाती थीं। सबसे ज्यादा मुसीबत पत्रकारों की है। प्रवचनकारों का प्रवचन तो वे सुन भी लेते थे किन्तु प्रशासनिक एवं पुलिस के अधिकारियों का प्रवचन हजम करना मुश्किल हो रहा है। जाते दो मिनट के लिए हैं और प्रवचन सुनकर दो घंटे बाद खाली हाथ निकलना पड़ता है। फुर्सतिया पत्रकारों की बात और है किन्तु जिन्हें आम पाठकों के लिए खबरें लिखनी हो उन्हें यह भारी पड़ रहा है। इन दिनों थानों से एक ही रटा रटाया जवाब मिल रहा है। सब खैरियत है। कोई क्राइम नहीं। चोरी, लूट, छिनतई, बलात्कार अब रोजमर्रा की बातें हो गई हैं। ये भी कोई खबर है। बरबस ही नटवरलाल फिल्म के संवाद जेहन में ताजा हो जाते हैं जब अमिताभ बच्चों से कहते हैं, ‘ये जीना भी कोई जीना है लल्लू’। अब हर कोई काला-पीला तेल, प्लाट-मकान-दुकान की दलाली, नई-पुरानी कार की बात तो नहीं कर सकता। जुआ, सट्टा, कबाड़ में हर कोई दिलचस्पी नहीं ले सकता। हर किसी के पास कोई रैकेट भी नहीं होता कि वह उचंती खाता मेन्टेन कर सके। ऐसे बेकार लोगों के साथ पुलिस देश-विदेश, अंतरिक्ष स्वर्ग-नर्क की चर्चा न करे तो और क्या करे? जनता के बीच अपनी छवि बनाने को उतावली पुलिस की मीडिया से यह बेजारी समझ से परे है। कॉकस से घिरी पुलिस को यह भी शिकायत है कि उसकी अच्छी योजनाओं का प्रचार प्रसार नहीं हो पाता। लोगों को सिर्फ पुलिस की खामियां नजर आती हैं। दरअसल ऐसा है नहीं। सही मीडिया का चयन करें, प्रचार प्रसार भी होने लगेगा।

शिक्षा और वेश्यावृत्ति

नौकरी के लिए क्वालिफिकेशन चाहिए। क्वालिफिकेशन के लिए पैसे चाहिए। शिक्षा बेहद महंगी हो चुकी है। आपके परिवार के पास पैसे नहीं हैं। बैंक से ऋण लेना आसान नहीं है। आपके पास जिस्म है। बाजार में ग्राहकों की कमी नहीं है। आप किसी भी कीमत पर पढ़ना चाहती हैं। लिहाजा सौदा हो रहा है। विकसित देशों में तो अब बाकायदा उसी तरह जिस्मों की नीलामी हो रही है जिस तरह बताते हैं कि किसी जमाने में कोठे पर नथ उतराई की बोली लगाई जाती थी। फर्क केवल इतना है कि अब लड़की खुद अपनी नीलामी करती है। अब वह ग्राहकों की मंडी में नहीं खड़ी होती। कामातुर निगाहें उसे नहीं घूरतीं। यह नीलामी बेहद सभ्य ढंग से ई-बे नामक आनलाइन नीलामी साइट पर की जाती है। हाल ही में ब्रिटेन की मिस स्प्रिंग ने अपने जिस्म को नीलाम किया, दो लाख पाउंड में। इससे वह न केवल अपनी मेडिकल पढ़ाई का खर्च निकाल पाएगी बल्कि इस पढ़ाई के लिए लिए गए कर्ज को भी चुका पाएगी। भारत भी तेजी से इसी दिशा में बढ़ रहा है। सिम्बायसिस जैसी प्रबंधन संस्थान की छात्राएं कालगर्ल रैकेट में पकड़ी गई हैं। इतिहास में पढ़ा था कि किसी जमाने में शिक्षा पर आभिजात्य वर्ग का ही अधिकार था। केवल राजा, मंत्री और सेनापति के पुत्रों को ही विद्यादान किया जाता था। पढ़ा यह भी था कि वेदमंत्र सुन लेने मात्र से शूद्रों के कानों में पिघला शीशा डलवा दिया जाता था। रजवाड़े खत्म हो गए, जमींदारी छिन गई, जाति प्रथा भी टूट गई किन्तु समाज आज भी बंटा हुआ है। आज का गरीब शूद्र है। गरीब तो क्या निम्न मध्यमवर्गीय परिवारों की हालत भी खास अच्छी नहीं है। सरकारें गरीबों के सशक्तिकरण के बजाय उन्हें भिखारी बनाकर और नीचे धकेलने का प्रयास कर रही हैं। अच्छा भोजन, अच्छी शिक्षा, अच्छा आवास सबकुछ अब मुट्ठीभर लोगों के लिए सुरक्षित-संरक्षित हो गया है। हर कोई अपनी-अपनी क्षमताओं, विशेषताओं, विशिष्टताओं की कीमत लगवा रहा है। उपभोक्तावाद चरम पर है। ऐसे में किसी को नैतिकता का भाषण देना घूरे पर विश्व स्वास्थ्य संगठन की बैठक करने जैसा है। दूसरी तरफ सुरा-सुन्दरी के धंधे में लोग रातों रात लखपति-करोड़पति बन रहे हैं। इनकी मांगें बढ़ रही है। अब लड़ने भिड़ने के दिन नहीं रहे। लिहाजा वे खरीद रहे हैं। आजादी को तिरेसठ साल ही हुए हैं और भारत की जमीन, नदियां, तालाबों का सौदा होने लगा है। बावला पाकिस्तान कुछ हजार वर्ग किलोमीटर जमीन के लिए पिछले 50 सालों से युद्ध कर रहा है। किसी दलाल को बयाना दे दिया होता तो कश्मीर कबका उसका हो चुका होता।

पढ़े लिखे ढीठ

बचपन में गर्मियों की छुट्टियां गांवों में बिताया करता था। हमारा अपना गांव सैकड़ों किलोमीटर दूर था। हर साल वहां जाना संभव नहीं होता था। लिहाजा हम बच्चे गर्मियों में अपने अड़ोसी पड़ोसी के गांव चले जाते थे। वहां हमने देखा था कि जब भी बच्चा साइकिल उठाकर गांव से बाहर जा रहा होता तो उसके माता पिता उसे टोकते और कहते कि ध्यान से साइकिल चलाना। सड़क की बार्इं तरफ से ही चलना। आने-जाने वाली गाड़ियों को निकल जाने देना। अपना ख्याल रखना। गांव में मैने देखा था कि जंगली आदिवासी भी जब लकड़ी या तेंदूपत्ता का गट्ठर लेकर सड़कों पर चलते हैं तो वे एक कतार में आगे पीछे चलते हैं। मरनी नहावन में आज भी स्थानीय लोग, फिर चाहे वे शहर के निवासी ही क्यों न हों, कतार में ही चलते हैं। कहने-सुनने को बहुत कुछ होता है किन्तु सड़क पर वे मौन धारण किये रहते हैं। आगे पीछे चलती इन महिलाओं की कतार कभी-कभी चार-पांच सौ मीटर लंबी होती है पर क्या मजाल की दो महिलाएं भी आजू बाजू चलती मिल जाएं। रास्ते के किनारे किनारे समान रफ्तार से चलती इन महिलाओं के कदम एक साथ उठते और पड़ते हैं। उनके बीच समान दूरी होती है। ऐसा लगता है जैसे सेना ने इन्हें ट्रेनिंग दी हो। आज भी नक्सल प्रभावित इलाकों में गश्त कर रहे कोया कमाण्डो इसी तरह एक के पीछे एक चलते हैं। पर यह संस्कृति शिक्षा के साथ ही विलुप्त हो जाती है। इन परिवारों के पढ़े लिखे बच्चों को ही लें तो उनपर शहरी ढिठाई चुटकियों में हावी हो जाती है। वे तीन-तीन की कतार में साइकिल या दुपहिया चलाते मिल जाएंगे। हार्न बजाने पर भी वे आने जाने वाले को साइड नहीं देंगे। ज्यादा हार्न बजाया तो घूर कर देखेंगे। कुछ ऐसे ही युवाओं से जब यातायात सुरक्षा के बारे में पूछताछ की गई तो उनके जवाब ने निराश किया। इनमें से सभी ने केवल अपने अधिकारों की बात की। सभी ने बड़ी गाड़ी वालों को दोषी ठहराया। सभी को इस बात का ज्ञान था कि किसी जगह किस तरह की दुर्घटना होने से किसकी गलती मानी जाती है। किन मामलों में इन्श्योरेंस क्लेम मिलता है और कब उसमें दिक्कत आती है। मगर किसी ने भी ट्रैफिक में अपनी जिम्मेदारी पर एक शब्द नहीं कहा। शायद नए जमाने की सोच का असर था। वे नहीं मानते कि छुरा कद्दू पर गिरे या कद्दू छुरे पर, कटना कद्दू को ही होता है। उनकी दिलचस्पी सड़क दुर्घटना में गलती निकालने में है। वे बाल की खाल निकालना चाहते हैं पर यह नहीं सोच पाते कि इस दुर्घटना को टाला कैसे जा सकता था। दिक्कत यही है कि प्रत्येक व्यक्ति केवल अधिकारों में उलझा हुआ है, कर्त्तव्यों को लगभग सभी ने विस्मृत कर दिया है। ऐसे तो नहीं बनेगा बात।

इन्हें भी चिपकाओ तीन पेटी

पुलिस के पास एक अमोघ अस्त्र है तीन पेटी। हत्या, लूट, बलात्कार, हत्या के प्रयास के मामले में कभी-कभार पुलिस की भले ही न चले किन्तु तीन पेटी शराब चिपकाकर वह किसी का भी नाड़ा ढीला कर सकती है। यदि पुलिस नैतिकता के आधार पर समाज का कुछ भला करने की ठान ले तो कुछ ऐसे लोग हैं जिन्हें तीन पेटी चिपकाने से न केवल उन्हें पुण्य लाभ हो सकता है बल्कि देश की प्रतिभाओं का भी भला हो सकता है। इनमें से कुछ नाम खेल संगठनों से जुड़े हैं तो कुछ मुफ्त की नेतागिरी से। ऐसे लोगों की करतूतों का खामियाजा पहले कुछ लोग और बाद में पूरा समाज भुगतता है। ऐसे लोग किसी लिखित कानून को नहीं तोड़ते पर नन्हें खिलाड़ियों का दिल तोड़ने से लेकर देश की प्रतिभाओं का गला घोंटने और राष्ट्र को उसकी प्रतिभाओं से वंचित करने में इनकी बड़ी भूमिका होती है। देश का कोई कानून इनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। राज्य तथा केन्द्र की सरकारें इनके आगे नतमस्तक हैं। खेल के स्वतंत्र संघ इनके उदाहरण हैं। ऊपर से लेकर नीचे तक भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे इन संगठनों पर बैठे मठाधीश इन पदों का उपयोग जागीरदार की तरह करते हैं। वे जो कुछ भी कह देते हैं वह पूरे देश पर बाध्यकारी हो जाता है। अपने इशारों पर नहीं नाचने वाली प्रतिभाओं का वे गला घोंट देते हैं। शायद यही वजह है कि 130 करोड़ की आबादी वाले इस देश के हिस्से में अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतिस्पर्धाओं में केवल चुग्गा ही आता है। हम खिलाड़ियों और उनके प्रशिक्षकों को कोस कर रह जाते हैं। शैतान का सगा नाना पीछे बैठकर डोरियां खींचता रहता है। हाल ही में जबलपुर में आयोजित आॅल इंडिया जस्टिस तन्खा मेमोरियल ओपन चेस टूर्नामेन्ट में अपने हुनर की धाक जमाने वाले नन्हें खिलाड़ियों पर भी शतरंज से जुड़ी एक ऐसी ही संस्था की गाज गिरी हुई है। इसकी वजह से वे आफिशियल टूर्नामेन्ट में भाग नहीं ले सकते। यानी कि वे छत्तीसगढ़ का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते फिर भले ही वे प्रतिभा में कास्पारोव के समकक्ष क्यों न हो जाएं। कानूनन इन मठाधीशों का कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। पर पुलिस चाहे तो ऐसा कर सकती है। पुलिस कप्तान वैसे भी खेल प्रतिभाओं के सरपरस्त माने जाते हैं। दर्जनों लोगों के खिलाफ तीन पेटी चिपकाने वाली पुलिस यदि ऐसे मठाधीशों पर तीन पेटी चिपकाकर दिखाए तो बहुतेरे खिलाड़ियों को तसल्ली मिलेगी।

चिता का र्इंधन, पिंड का निवाला

कुछ ही दिनों में हम आजादी की 63वीं वर्षगांठ मना रहे होंगे। इस बीच देश में बहुत कुछ बदला है। विकास की रफ्तार में अंधाधुंध तेजी आई है। बादशाह के महल से बड़े अफसरों के बंगले हो गए हैं। जनसेवकों की वेतन-सुविधा मल्टीनेशनल कंपनियों के सीईओ के पे-पर्क्स को मात दे रही है। जिन्हें नौकरियां मिल रही हैं, उन्हें महंगाई भत्ता भी मिल रहा है। पद के लिहाज से वाहन का आकार प्रकार बढ़ रहा है। चार बस और बारह ड्राइवर कम करने की कोशिश में 200 लोगों को स्कूटर और कार अलाउंस दे रहे हैं। लोग इनकम टैक्स बचाने इनवेस्ट कर रहे हैं। खर्चे हैं कि पूरे नहीं पड़ रहे। करों का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है। खाने पीने की चीजें लगातार महंगी हो रही हैं। संसद से लेकर विधानसभा तक पक्ष-प्रतिपक्ष का टाईअप हो गया है। टाटा, बिड़ला, अंबानी, जिंदल, नेता, आईएएस, आईपीएस और भिखारी खाने-पीने की चीजों पर समान दर पर टैक्स अदा कर रहे हैं। जो खरीद पा रहे हैं वे खरीद रहे हैं। जो नहीं खरीद पा रहे वे चींटियों, बिल्लियों और कुत्तों का जीवन जी रहे हैं। ट्रेन में दो परिवार आमने सामने बैठे थे। एक अपर मिडिल क्लास तो दूसरी लोअर मिडिल क्लास का था। एक एलटीसी पर यात्रा कर रहा था तो दूसरा अंटी के पैसे खर्च कर किसी रिश्तेदार के यहां शादी में जा रहा था। एक परिवार ने ट्रेन में खाने का आर्डर दिया। दूसरे ने अपनी थैली से परांठा और अचार निकाल लिया। परांठे बच गए तो उसने करीने से उन्हें वापस पैक कर लिया और थैले में डाल दिया। ट्रेन का ‘मील’ कुछ विलंब से पहुंचा। बच्चे तब तक कुरकुरे और चिप्स खाकर सो चुके थे। उन्हें जगाया गया पर उनींदे बच्चों ने लंच पैक को जूठा करने के बाद खाने से इंकार कर दिया। सना-सनाया चावल दाल खिड़की से बाहर। गाड़ी स्टेशन पर रुकी थी। प्लेटफार्म पर अजीब नजारा था। मैले-कुचैले कपड़ों में बच्चे लंच पैक्स को लूट रहे थे। तकरीबन स्लीपर बोगियों के आसपास यही नजारा था। बनारस का घाट याद आ गया। वहां भी बच्चे, बूढ़े और जवान नदी में घंटों तैरते रहते हैं। उनके निशाना पर वे पिंड होते हैं जिन्हें लोग अपने पुरखों के नाम पर पानी में बहा देते हैं। कुछ ऐसे ही परिवार श्मशान के आसपास डेरा डाले रहते हैं। वे चिता की लकड़ी से घर के चूल्हे का र्इंधन और पिंड से बच्चों का निवाला चुराने कुत्तों से जंग करते हैं। अंधाधुंध शहरीकरण से कौए कम हो रहे हैं। कोई और उनकी जगह ले रहा है।

सड़क पर वीभत्स हादसे

कटे-फटे अंग प्रत्यंग, चीथड़ों की तरह शरीर पर झूलते कपड़ों के अवशेष, कुछ दूर पड़ी मुड़ी तुड़ी सी मोटरसाइकिल। चारों तरफ राहगीरों की भीड़। कोई सहानुभूति दर्शा रहा है तो कोई मोबाइल पर पुलिस को सूचित करने की कोशिश कर रहा है। इनके अलावा ढेर सारे लोग तमाशा देख रहे हैं। कोई मोबाइल का कैमरा आन कर लेता है तो कोई छू लेने को बेताब होता है। मुन्ना रोज 12:30 तक घर आ जाता है, आज एक बज रहे हैं फिर उसका पता नहीं। दो बजे खबर आती है कि मुन्ना अब इस दुनिया में नहीं रहा। माँ गश खाकर गिर जाती है। बस स्टैण्ड पर एक महिला धूल से सने वस्त्रों में बैठी है। बालों में जटाएं पड़ गई हैं। लोग बताते हैं कि उसका बेटा सड़क हादसे का शिकार होकर चल बसा। शव इतना विकृत हो चुका था कि माँ को आज भी यकीन नहीं है कि वह उसका बेटा था। बेटे के इंतजार में वह आज भी बस स्टैण्ड पर बैठी रहती है। वर्ष 2007 में देशभर में हुई 479216 सड़क दुर्घनाओं में 114444 लोगों को मौत हुई थी। देश में प्रति घंटे कम से कम 13 लोगों की मौत सड़क दुर्घटनाओं में हो जाती है। 75 फीसदी हादसे चालकों की लापरवाही या गलती से होते हैं। एक से तीन फीसदी मामलों में पैदल या साइकिल सवार की गलती पाई जाती है। देश की 36 लाख किलोमीटर से अधिक लम्बी सड़कों पर प्रति वर्ष औसतन चार लाख से अधिक सड़क दुर्घटनायें होती हैं। देश में राष्टÑीय राजमार्ग और राष्टÑीय एक्सप्रेस मार्ग की लम्बाई 70 हजार किलोमीटर से अधिक है। तकरीबन प्रमुख शहर राजमार्गों पर बसे हैं। राजनांदगांव, भिलाई, दुर्ग, रायपुर भी इसके अपवाद नहीं। इसलिए जब दुर्ग पुलिस ने बच्चों को यातायात के प्रति जागरूक एवं प्रशिक्षित करने का बीड़ा उठाया तो एक आस जगी कि इन हादसों में कमी आएगी। पर यह अकेली पुलिस का काम नहीं है। यह प्रत्येक जिम्मेदार नागरिक का कर्त्तव्य है कि वह यातायात व्यवस्था को सुचारू रखने की कोशिश करे। घर पर बच्चों के साथ यातायात सुरक्षा की बातें करे। दुर्घटनाओं की तरफ से आंखें न फेर लें बल्कि उसकी वीभत्सता और परिवार पर पड़ने वाले इसके प्रभाव की चिंता करे। जिस तरह साल में एक दिन पिकनिक मनाने जाते हैं उसी तरह एक दौरा बड़े अस्पतालों के अस्थि विभाग का भी करें।

यह कैसी फ्रेंडशिप

फ्रेंडशिप डे पर देशभर में रविवार को जो कुछ भी हुआ वह कोरी जिद की टकराहट का परिणाम था। न तो इसका फ्रेंडशिप से कोई लेना देना था और न ही हिन्दुत्व या राष्ट्रीयता की भावना से। एक तरफ जहां युवा मनमानी की जिद पर अड़े हैं वहीं ऐसे युवा, जिन्हें यह सुख हासिल नहीं उनकी मिट्टी पलीद करने में जुटे हैं। कम से कम इस मामले में प्रशासन उत्पातियों के साथ है क्योंकि इनका उत्पात प्रत्यक्ष है पर छोटा है। यह न तो सतयुग है और न द्वापर। अब कृष्ण और सुदामा नहीं होते। अब तो रईस बापों की बिगड़ैल औलादें सिम्बायसिस में मैनेजमेन्ट पढ़ती हैं। उनका मैनेजमेन्ट फंडा आम आदमी से अलग होना ही चाहिए। फ्रेंडशिप का मतलब अब मुंह में केक का क्रीम पोतकर एक दूसरे की गोद में बैठना हो गया है ताकि एक दूसरे के गालों को चाट कर साफ किया जा सके। किसी को दिक्कत भी नहीं है। जब किसी का 90 फीसदी ध्यान अपने तन को सजाने संवारने में हो तो उसका हासिल इससे जुदा नहीं हो सकता। आपका जिस्म है, आप जानो या आपके माडर्न माँ-बाप जानें। समाज को दिक्कत तब होती है जब आप शिकायत लेकर थाने पहुंचती हो। कभी कहती हो कि आपके बायफ्रेंड ने आपका एमएमएस बना लिया और अब ब्लैकमेल कर रहा है। कभी फूला हुआ पेट लेकर सहानुभूति बटोरने निकल पड़ती हो। हर बार वही कहानी। लड़के ने शादी का झांसा दिया। झांसा इतना तगड़ा था कि शादी से पहले ही हनीमून मना लिया। कई-कई साल तक मिल कर मजे किए और फिर आरोप लड़के पर मढ़ दिया कि उसने दैहिक शोषण किया। समाज को भरमाने के लिए मीडिया और कानून ने शब्दों का इजाद भले ही कर लिया हो किन्तु मेडिकल साइंस की राय इससे जुदा है। लंबे रिश्ते कभी एकतरफा नहीं होते। आप किसी मजबूरी में नहीं बंधी हुर्इं कि आपका शोषण किया जा सके। आपकी मजबूरी आपकी अपनी इच्छाएं हैं। बार-बार ठगी जा रही हैं फिर भी नहीं चेत रहीं। आपको एक बार भी नहीं सूझता कि जो युवक अपने माँ-बाप, भाई-बहन को धोखा देकर आपका साथ निभाने की कसमें खा रहा है वह किसी का नहीं। आप यह भी नहीं समझना चाहतीं कि कानून चाहे जो कहे किन्तु प्रकृति ने पुरुष और नारी को अलग-अलग बनाया है। आप अपनी लड़ाई खुद लड़ने निकल पड़ी हैं। कानून आपको हादसों से नहीं बचा सकता। हादसों के बाद हद से हद दोषी को सजा और आपको मुआवजा दिला सकता है। आप माडर्न बनें इसमें किसी को दिक्कत नहीं। बस इतनी मेहरबानी करें कि कुंवारी माँ बनें तो ठसन के साथ अकेले ही उसकी परवरिश करें। लड़का आपको छोड़े तो आप भी किसी दूसरे को पकड़ लें। पश्चिम हो या पूर्व किसी भी संस्कृति की आधी अधूरी नकल हमेशा तकलीफदेह होती है।

झोला वाले बाबा

बचपन में भिखारियों को देखने पर हम डर जाते थे। उसकी खिचड़ी बाल या दाढ़ी नहीं बल्कि उसके कंधे पर लटका थैला हमें डराता था। हमें बताया गया था कि उस झोले में ऐसे बच्चे होते हैं जो अपने माता-पिता की बात नहीं सुनते। अपने घर से दूर खेलने चले जाते हैं। झोला वाला बाबा दरअसल बच्चे पकड़ने के लिए ही घूमता रहता है। जहां भी कोई बच्चा अकेला दिखता है उसे झोले में डाल लेता है और फिर ले जाकर उसकी आंखें फोड़ देता है, उसकी टांगे तोड़ देता और उससे भीख मंगवाता है। कुछ ऐसा ही डर हमें अंधेरे से लगता था। हमें बताया गया था कि भूत प्रेत अंधेरे में रहते हैं। पेड़ों पर उनका निवास है। जैसे-जैसे हम बड़े होते गए यह खौफ जाता रहा तथा इन कहानियों का मर्म भी समझ में आने लगा। रात को पेड़ों के नीचे नहीं जाने के वैज्ञानिक कारणों का भी पता लगा। वहां चिड़ियों के बसेरे के प्रति हम संवेदनशील होने लगे। यह भी समझ में आया कि बच्चों को एकांत में जाने से रोकने के लिए बाबा एक बहाना था। डरने-डराने का यह खेल आज भी जारी है। गुरुजी, ज्योतिषी, डाक्टर, बीमा एजेंट, अखबार सभी हमें डराने में लगे हुए हैं। यह डर हमें जीने नहीं देता। हम विकास से डरते हैं, परिवर्तन से डरते हैं। बिना देखे, बिना जाने आने वाले से डरते हैं। देखा जा रहा है कि किसी भी उद्योग की स्थापना से पहले विरोध के स्वर उभरते हैं। देर सबेर ये शांत भी हो जाते हैं और फैक्ट्री स्थापित होकर रहती है। इस हंगामे में गरीब के घर चूल्हा नहीं जलता, उसका काम छूट जाता है, कुछ लोग मर भी जाते हैं। नेताओं की जेब गर्म हो जाती है और उद्योग स्थापित हो जाता है। ऐसे हर दूसरे मामले में गरीब, ग्रामीण जनता का केवल उपयोग किया जाता है। उसके हित की फिक्र किसी को नहीं होती। जिसके पास गंवाने को वैसे ही कुछ न हो उसे डर किस बात का। अलबत्ता झोला वाले बाबा, भूत प्रेत या चुड़ैल का डर उसे भी दिखाया जा सकता है। शहर के आसपास का हर तीसरा खेत बिल्डर के पास है। हर दूसरे खेत का बयाना हो चुका है। राष्ट्रीय राजमार्ग के आसपास कोई भूखण्ड शेष नहीं। पहले जमीन खरीद ली और फिर प्रशासन की मदद से वहां रहने वाले गरीबों को खेद दिया। यह रोज हो रहा है। प्रदेश ही नहीं पूरे देश की यही कहानी है। पर्यावरण के नाम पर जेके सीमेन्ट का विरोध करने वालों के घर में तुलसी के अलावा कोई पौधा नहीं। इसी तरह नक्सलियों के खिलाफ वायु सेना के प्रयोग की दलील देने वाले वायुसेना को जमीन देने को तैयार नहीं भली ही दो-चार पांच साल में वहां कालोनियां खड़ी हो जाएं।

दोस्ती की झेंप

समय के साथ शब्द के मायने बदल जाते हैं, सुना तो था किन्तु इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हाल ही में मिला। जिससे भी उसके दोस्तों के बारे में पूछा शर्म से लाल हो गया। किसी के घर का माहौल स्ट्रिक्ट था तो किसी पर उसके बडेÞ भाइयों का जोर चलता था। किसी के लिए यह बेहद निजी प्रसंग था तो किसी के लिए एकांत चर्चा का विषय। हम सोचते रह गए कि हमने सवाल मित्र के संबंध में किया था या...। 20-25 साल पहले इस सवाल के जवाब कुछ और होते थे। हमारे गुरुजी पुस्तकों को अपना सच्चा मित्र बताया करते थे। संगीत चाचाजी का अभिन्न मित्र था। जब भी फुर्सत मिलती वे या तो कोई गीत गुनगुना रहे होते या फिर कुछ सुन रहे होते। पौधे और फूल मेरे पिता के मित्र थे। सुबह शाम फुर्सत निकालकर वे बगीचे के चार पौधों को संवारते। घास निकालते, कीड़े छुड़ाते, सूखे पत्तों को अलग करते। खाद-पानी देते। वे पौधों और बच्चों में कोई फर्क नहीं करते थे। माँ दोपहर को बाहर पड़ोसनों के साथ बैठतीं। सुख-दुख की चर्चा करने के साथ ही स्वेटर बुनाई का नया डिजाइन, कोई खास रेसिपी, नाते रिश्तेदारी की चर्चा होती। फुर्सत लोगों को आज भी है किन्तु दोस्तों के नाम बदल गए हैं। अब रेसिपी पड़ोसन नहीं बल्कि फाइवस्टार होटलों के शेफ बताते हैं। पड़ोसनों का स्थान एकता कपूर के झोल-झाल परिवारों ने ले लिया है जो एक बात का कम से कम तीन मतलब तो निकाल ही लेती हैं। जो दिन भर महंगी साड़ियां और जूलरी पहनकर कैमरे की तरफ मुंह किये खड़े-खड़े ही बातें करती हैं। कभी आदमी सुकून और दो गज जमीन की बातें करता था। आज प्लाट, बंगला और टेंशन की बातें करता है। ऐसे में दोस्त के मायने न बदलें यह कैसे हो सकता है। अब ‘शोले’ के जय और वीरू की तरह कोई ‘ये दोस्ती... हम नहीं..’ गाते हुए नहीं घूमते। ‘आ जा मेरी गाड़ी में बैठ जा...’ से शुरू हुआ यह दौर ‘आती क्या खंडाला...’ से भी आगे निकल चुका है। अब तो अलग-अलग गाड़ियां होती हैं। जुदा-जुदा राहें होती हैं। कहीं पर मिलते हैं और फिर अपनी-अपनी राह चले जाते हैं। फास्ट फारवर्ड लाइफ में जरूरत की जान-पहचान है। कहीं धन की, कहीं करियर की तो कहीं शरीर की जरूरत बोलती है। वैसे दोस्ती का भाव खत्म नहीं हुआ। दो घूंट लगाते ही वह बाहर आ जाता है। पिया-खाया आदमी दोस्ती पर जान लुटा देता है। पर्स निकालकर दे देता है, गाड़ी की चाबी थमा देता है। सौ मुश्किलें आसान कर देता है। पर लोग अब दोस्ती में नहीं पीते बल्कि पीने के लिए दोस्ती करते हैं। ‘निंदक नियरे राखिए...’ वाले दिन लद चुके हैं। हाँ में हाँ मिलाई तो ठीक वरना जयश्री राम!

पनीर के टुकड़े

जिस तरह कुछ लोगों में ब्रांडेड पहनने की फैंसी होती है, ठीक उसी तरह कुछ लोगों में पनीर की फैंसी होती है जबकि खाने के लिए उससे कहीं बेहतर कई चीजें उससे कहीं कम कीमत पर दुनिया में, खासकर भारत में उपलब्ध है। देश में सैकड़ों प्रकार की सब्जियां, दर्जनों किस्म के अनाज और दालें, तरह-तरह के पारम्परिक व्यंजनों की भरमार है किन्तु पनीर इन सबके बीच ब्रांड बनकर उभरा है। यदि हम दिमाग से इसके ब्रांड का भूत उतारकर इसके स्वाद की चर्चा करें तो शायद इसका नम्बर 50 व्यंजनों की हॉट लिस्ट में भी कहीं न आए। यहां तक पढ़ने के बाद कुछ लोगों को लगने लगा होगा कि लेखक पनीर नहीं खाता, या उसे पनीर पसंद नहीं। ऐसी बात नहीं है। कोफ्त तब होती है जब लोग केवल ब्रांडेड डिश के नाते पनीर परोसना चाहते हैं किन्तु उनकी जेब उन्हें इसकी इजाजत नहीं देतीं। शादी की पार्टियों में मटर पनीर के बाउल में जब लोग चने में छिपे पनीर के टुकड़ों को तलाशते हैं तो हंसी छूट जाती है। इसी तरह जब ‘अक्षय पात्र’ की रेसिपी में पनीर पुलाव आ जाता है तो सिर पीटने को जी करता है। ‘अक्षय पात्र’ मध्यान्ह भोजन बनाने की एक स्टेट आॅफ द आर्ट संस्थान है। जो बीएसपी के बंद हो चुके डेयरी के भवन में संचालित है। यहां पकने के बाद भोजन स्टील के कनस्तरों में स्कूलों को भेजा जाता है। मंगलवार को अक्षय पात्र ने न जाने क्यों बच्चों को पनीर पुलाव खिलाने का विचार किया। जाहिर है बच्चे पीले चावल में पनीर के टुकड़े तलाशते रह गए। 25 किलो भात में पनीर के मुट्ठी भर टुकड़े डाले जाने का क्या मतलब निकाला जाए समझ में नहीं आया। इससे तो अच्छा होता मटर या चना पुलाव ही बना दिया होता। या कुछ हरी सब्जियां ही डाल दी होतीं। कम से कम बच्चे खा तो लेते। किन्तु ब्रांडेड के जमाने में ब्रांडेड मध्यान्ह भोजन पकानी वाली संस्था को इससे क्या? हमारे दिमाग पर छाई यही ब्रांडेड संस्कृति है जो हमें कच्चा केला, गवार फल्ली, सहजन (मुनगा) आदि खाने से रोकती है और देश की 80 फीसदी से अधिक औरतें रक्ताल्पता का शिकार हो जाती हैं। बड़ा अच्छा लगता है जब प्रति वर्ष अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट में भारत को भूखे नंगों का देश बताया जाता है, यहां के बच्चों को कुपोषण का शिकार बताया जाता है। यह स्थिति तब है जब यहां सुपाच्य, पोषक भोजन बेहद सस्ते में उपलब्ध है। क्यों हम अपनी जाने के दुश्मन बने हुए हैं। फ्रूट बोलने से क्यों हमारे दिमाग में सम्पूर्ण आहार केले की तस्वीर नहीं उभरती। फल का मतलब सेब और मोसंबी जैसे महंगे फल ही क्यों हैं। दरअसल भोजन पर हमारे शरीर की जरूरतों का कम और हमारे स्टेटस का अधिक जोर चलता है।

जान पहचान की ऐंठ

वह बड़े शहर से आया था। उसके कपड़े-लत्ते और गर्दन की ऐंठ बता रही थी कि वह बड़ा आदमी है। एक फैक्टरी के दरवाजे पर पहुंचकर उसने बेल पुश दबाया। दरवान ने दरवाजा खोला, झुककर सलाम किया और रिसेप्शन का रास्ता इशारे से बता दिया। अकड़ में घुटने सीधे रखता हुआ वह सेमीमार्च करता हुआ रिसेप्शन तक पहुंचा और रिसेप्शन पर खड़े खड़े फोन पर बात कर रहे युवक से कड़क कर पूछा, ..... कहां है। युवक ने एक बार उसे ऊपर से नीचे तक देखा पर टेलीफोन पर हो रही बातचीत में व्यवधान नहीं आने दिया। आगंतुक ने आवाज को और रौबीला बनाते हुए दोबारा सवाल किया, युवक ने उन्हें विजिटर्स सोफा दिखा दिया। साफ लग रहा था कि दोनों को एक दूसरे का रवैया कतई नहीं भा रहा था। रिसेप्शन डेस्क पर बैठी युवती दिलचस्प नजरों से आगंतुक को देख रही थी। आगंतुक को उसकी आंखों में विद्रुप नजर आया। उसका खून खौल गया। पर वह चुप रहा। शायद उसने ठीक ही किया था। युवक की फोन पर बातचीत खत्म हो चुकी थी। वह आगंतुक की तरफ मुड़ा। ‘हम दिल्ली से आए हैं’ उसने कहा। ‘तो?’ युवक ने सवाल किया। ‘तुम मुझसे इस तरह बात नहीं कर सकते’ आगंतुक हड़बड़ाया। इस बार युवक ने आवाज ऊंची की, उसके मुंह से एक ही लफ्ज निकला ‘गार्ड!’। तत्परता से एक गार्ड ने भीतर प्रवेश किया और बिना कुछ पूछे आगंतुक की बांह पकड़ी और उसे बाहर खींच लाया। गार्ड से हुई बातचीत में आगंतुक को पता लगा कि जिससे वह मिलने आया था वह दीवालिया हो चुका था और कंपनी एक माह पहले बिक चुकी थी। जिससे वह रिसेप्शन पर बातें कर रहा था वह कंपनी का नया मालिक था। ऐंठन में इस तरह की गलतियां अक्सर हो जाया करती हैं। एक पुलिस वाले ने मनचलों को पकड़ा तो तैश में सबको गालियां दीं। उसे क्या पता था कि इनमें से एक गृहमंत्रालय के संसदीय सचिव का पुत्र था। लोगों से ऐसी गलतियां अक्सर हो जाती हैं। एक अपराधी जिसके सामने पुलिस से अपनी पहचान की डींग मार रहा था, वह जिले का नया पुलिस कप्तान निकला। जिसके आगे प्रिंसिपल मैम की बुराई कर रही थी वह उसीकी बेटी निकली। बेहतर हो कि हम ऐंठन और हेकड़ी का प्रयोग केवल परिचितों के आगे ही करें। वरना पता नहीं कब उलटे बांस बरेली को लौट आएं।

100 रुपए का पास्ता

नेहरू नगर का रेलवे लेव्हल क्रासिंग बंद था। एक माल गाड़ी दुर्ग की तरफ से आती दिख रही थी। दूसरी पावर हाउस के आसपास कहीं हो सकती थी। जब तक वह यहां पहुंचती तीसरी गाड़ी फिर दुर्ग से आ रही हो सकती थी। जब से यहां तीन पटरियां हुई हैं, मुसीबतें बढ़ गई है। इधर बारिश के कारण अंडरब्रिज भसक गए हैं। इसलिए इंतजार करने के अलावा कोई चारा भी नहीं था। लिहाजा हमने इधर उधर नजर दौड़ाई और पिज्जा पार्लर में घुस गए। डिस्पले विंडो में काफी ताकाझांकी के बाद हमने पास्ता ट्राई करने की ठानी। 99 रुपए का पास्ता पूरे दस मिनट बाद पैक में सर्व किया गया। ठीक वैसा ही फॉयल पैक जिसमें इन दिनों ट्रेन में मील्स सर्व किए जाते हैं। क्लास वन के बच्चे के टिफिन बाक्स के आकार का पैक जिसमें एक सैंडविच और ऐप्पल के कुछ वेज (टुकड़े) ही आ पाते हैं। बहरहाल हमने फॉयल बाक्स का कार्ड का बना ढक्कन हटाया। अंदर दो मुट्ठी रंग बिरंगा सा, लिजलिजा सा सामान था। हमने उसे ट्राई किया, सॉस में लिपटी मैदे के उबले हुए पाइप जैसा लगा। सब्जी के कुछ टुकड़े थे। स्वाद के नाम पर उनमें भी केवल सॉस था। हम समझ गए कि पश्चिम को न तो खाना बनाना आता है और न भोज्य पदार्थ चुनना। वे अखाद्य, कुखाद्य भोजन को सॉस में लपेट कर निगल लेते हैं। नूडल्स से लेकर पास्ता तक सबका यही हाल है। बहरहाल हमने मित्रों से चखने को कहा। उन्हें भूख नहीं थी। फिर भी मेरे कहने पर उन्होंने एक एक चम्मच चखा और पास्ता खत्म हो गया। एक मित्र ने कहा, यार सॉस तो डब्बे में भी लगा है। क्यों न इसे भी चबा लें, कुछ पैसे और वसूल हो जाएंगे। दूसरे ने कहा, छोड़ भी यार इतना तो हमारे यहां थाली में छोड़ने का रिवाज है। अलबत्ता ऐसा कर सकते हैं कि बाक्स को धुलवा लेते हैं, बच्चे के क्राफ्ट बनाने के काम आ जाएगा। काश पापड़ी चाट और दही गुपचुप भी इस आलीशान सेटअप में बिकता। लिट्टी-चोखा और इडली-दोसा भी पार्सल में बिकता। शोबाजी में लोगों को आंसुओं के घूंट तो नहीं पीने पड़ते।

सफाई का फंडा

हम बेहद सफाई पसंद हैं। जीवन के लिए भले ही पांच लीटर पानी चाहिए हो हम सफाई के नाम पर प्रतिदिन सौ से पांच सौ लीटर पानी खर्च करते हैं। फिर भी सफाई सिफर। इसकी वजह है। हम सिर्फ पानी खर्च करने को सफाई मानते हैं। अब देखिए हम सफाई के लिए क्या-क्या करते हैं। सुबह-सुबह झाड़ू लगाकर घर का कूड़ा निकालकर सड़क पर या पड़ोसी के घर के आगे रख देते हैं। इसके बाद हम पोंछा मारकर पूरे घर को चिपचिपा कर लेते हैं। यह बैक्टीरिया के लिए परफेक्ट ब्रीडिंग ग्राउण्ड होता है। सब्जियों के डंठल, छिलके, पत्ते हम घर के बाहर या आजू-बाजू की नालियों में डाल देते हैं। यह कूड़ा वहीं सड़ता रहता है। सफाई की बात चली तो रामदेव बाबा याद आ गए। शहरों में बढ़ती भीड़ के साथ साथ उत्पन्न हुई कूड़ा निपटान की समस्या पर बाबा कहते हैं कि पहले हम घर से दूर केवल एक लोटा लेकर चले जाते थे। खेतों को देख लेते थे, दो चार सौ कदम चल भी लेते थे। शौच खुलकर होता था। पानी की बर्बादी भी कम होती थी। अब हम बिस्तर से उठते हैं। चंद कदम चलकर टायलट सीट पर बैठ जाते हैं और 15-20 मिनट गुजारने के बाद लटका हुआ मुंह लेकर बाहर चले आते हैं। अलबत्ता कई बार फ्लश कर देते हैं वरना बेडरूम में दुर्गंध जो आती है। टायलेट साफ होता है पर पेट नहीं। बारिश शुरू होते ही शहरों में निकासी की समस्या उठ खड़ी हुई है। नगर निगम सफाई में जुट गया है। सफाई के नाम पर हो क्या रहा है। नालियों के किनारे की घास खोदी जा रही है। इससे मिट्टी की पकड़ कमजोर होगी और वह नाली में बहकर उसे चोक कर देगी। यही नहीं पूरे मोहल्ले की नाली साफकर उसकी गंदगी को नाली के किनारे किसी एक स्थान पर इकट्ठा किया जा रहा है। इसे जेसीबी उठाएगा। जेसीबी कब आएगा पता नहीं। कूड़ा फिर से नाली में चला जाएगा। सफाई कर्मियों को वेतन मिल जाएगा। सफाई का काम भी होगा पर सफाई, फिर भी नहीं होगी।

एक लाचार बाप

मोहल्ले में आर्थिक रूप से हम सबसे कमजोर थे। यही नहीं हमारे घर में बच्चे भी कम थे। एक लड़का और एक लड़की। यानी की संख्या बल में भी हम पिट जाते थे। हमारी माँ हमेशा बीमार रहती थी। लिहाजा न भुजाओं से और न ही गले से हम कोई युद्ध जीतने की स्थिति में थे। जब कभी मोहल्ले में हमारा किसी बच्चे से विवाद होता, घर पर पिटाई हमारी ही होती, फिर चाहे गलती किसी की भी क्यों न रही है। हमें विवाद से बचने की सलाह दी जाती। घर से बाहर हमारी घिग्घी बंधी रहती थी इसलिए सारा उबाल घर के भीतर जाया हो जाता था। आज भी जब कभी देश के शीर्ष नेतृत्व की तरफ देखता हूँ तो मुझे अपने घर की याद आ जाती है। पाकिस्तान दुम ठोक दे तो हमारे यहां प्यालियों में तूफान आ जाता है। हम पाकिस्तान से भले ही साफ-साफ बात न कर सकें, देश के अन्दर बवंडर उठा देते हैं। अफजल गुरू की फांसी की फाइल इधर से उधर धूल खाती, रंग उड़ाती घूम रही है पर हम घर में हिन्दूवादियों की पलस्तर उधेड़ रहे हैं। हम बाहर नहीं गरज सकते, इसलिए घर में बरसते हैं। आखिर वह कौन से डर हैं, जो हमारे बाप को एक बार मरने के बजाय बार-बार किस्तों में मरने के लिए विवश किए हुए थे। महाभारत की कहानी हमने भी पढ़ी थी किन्तु उसका कोई असर हम पर नहीं हुआ था। रामायण में वनवासी राम की वानर सेना और रावण की त्रिलोकविजयी चतुरंगी सेना के बीच हुआ धर्मयुद्ध और उसकी परिणति भी हमें प्रभावित नहीं कर पाती। फिर क्या मतलब है इस तरह के धर्मग्रंथों से जनता को बहलाने का? क्या हमारी पूरी मर्दानगी समाज में अलग-थलग पड़ गए प्रेमी युगल को मौत के घाट उतारने, पाकेट मार की धज्जियां उड़ाने और भीड़ की शक्ल में सरकारी तथा सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने तक ही सीमित है? पत्रकारिता भी अब रसूख वालों की बांदी हो गई है। ऊपर महल के लोगों के इसमें शामिल होने के बाद से आलम यह है कि फाइल के चलने से पहले ही उसके पहुंचने की खबर आ जाती है। इसे खोजी पत्रकारिता कहते हैं। खबर आई कि अफजल गुरू की फाइल गृहमंत्रालय ने राष्ट्रपति को भेज दी है। फाइल में संसद हमले के मास्टरमाइंड को क्षमादान नहीं देने के सिफारिश की गई है। इसका जोरदार स्वागत हुआ। यूपीए की तारीफ में कसीदे काढ़े गए। गृहमंत्री का इकबाल बुलंद हो गया। संपादकीय तक लिख दिए गए। बाद में खबर आई कि फाइल अभी सरकी नहीं है। हाइप क्रिएशन का इससे बड़ा उदाहरण अब तक देखने में नहीं आया है। सरकार सूचना लीक करके शायद यह देख रही थी कि अफजल की फांसी बरकरार रखने का फैसला करने पर जनता की प्रतिक्रिया क्या होगी। सो उसने मिलीजुली प्रतिक्रिया देख ली। अब किस बात की देर है?

शाबास मधुसूदन

मधुसूदन दीप नाम के एक और ध्रुवतारा दुर्ग के आकाश में स्थापित हो गया। अमनदीप की तस्वीर से प्रेरणा लेकर शक्तितोलन की दिशा में आगे बढ़ने वाले मधुसूदन ने एकलव्य जैसी निष्ठा के साथ अपने कदम आगे बढ़ाए और शरीर सौष्ठव से भारोत्तोलन और फिर शक्तितोलन तक पहुंच गया। वह अभी अभी बालिग हुआ है और उसके सामने संभावनाओं का अनंत आकाश है। मधुसूदन की यह उपलब्धि इसलिए भी खास है कि वह एक साधारण रिक्शाचालक के परिवार से है। जिनका बॉडी बिल्डिंग या वेट लिफ्टिंग से वास्ता रहा है, उन्हें इस बात का बाखूबी पता होगा कि यह खेल एक अकेला बालक नहीं खेलता। इसमें उसका पूरा परिवार धीरे-धीरे सुलगता है। हम सभी ने महाबली खली के बारे में पढ़ा है। जिला पुलिस के शरीर सौष्ठव के खिलाड़ी पी सोलोमन के बारे में भी पढ़ा है। हमने देखा है कि किस तरह एक परिवार के सभी सदस्य अपनी थाली से एक एक कौर निकालकर अपने एक सदस्य के लिए आवश्यक खुराक जुटाता है। किस तरह उसके शरीर में बढ़ने वाली पेशियों की सरसराहट अपने भीतर महसूस करता है। मधुसूदन के लिए तो यह और भी कष्टदायी था। एक तो नन्ही सी उम्र ऊपर से अभावों का परिवार। जब उसकी उम्र के लड़के केवल बाल संवारते, स्टाइल मारते घूमते हैं तब वह पूरी निष्ठा से अपने खेल के प्रति समर्पित हो गया। अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए उसने छोटी उम्र में ही एक होटल में नौकरी की। पढ़ाई लिखाई के साथ साथ उसने अपनी हाबी की साधना जारी रखी। यह एक सर्वमान्य तथ्य है कि सफलता किसी खास करियर में नहीं छिपी होती। आप किसी भी क्षेत्र में सफल हो सकते हैं। शर्त सिर्फ यही होती है कि आपकी उसमें रुचि हो, आप उसमें स्वयं को साबित करने के लिए पूरी ताकत से जुट जाएं और किसी भी सूरत में अपना ध्यान बंटने न दें। फिर चाहे वह पहाड़ चढ़ने का शौक हो, घुड़सवारी का, शक्तिशाली बनने का शौक हो या साहब बनने का, आपकी मंजिल आपसे अधिक दूर नहीं होती। आधे अधूरे मन से की गई पढ़ाई से आप डाक्टर-इंजीनियर भी बन जाएं तो अपने लिए वह खास जगह नहीं बना सकते जिसका लोग छात्र जीवन में सपना देखा करते हैं। देश में लाखों आईपीएस हैं किन्तु किरण बेदी जैसी अफसर गिनती के। कुछ ऐसा ही आईएएस, चिकित्सा, विज्ञान या किसी भी अन्य क्षेत्र में है। लोग एक मुकाम पर आकर ठहर जाते हैं और भीड़ में खो जाते हैं किन्तु पी. सालोमन और मधुसूदन जैसे लोग निरंतर आगे बढ़ते रहते हैं और उनका पद नहीं उनका नाम एक उज्ज्वल नक्षत्र की तरह ज्वाजल्यमान बना रहता है। ठीक ध्रुवतारे की तरह जो लाखों करोड़ों तारों के बीच अपनी नाम से पहचाने जाते हैं।

टीचर की बेंत

कुछ दिन पहले हम वैष्णोदेवी प्रवास पर थे। खा-खाकर, अलसा कर मुटाए लोग भी यहां आते हैं। कुछ बहुत छोटे बच्चे होते हैं और थोड़े बुजुर्ग भी। ऐसे लोगों के लिए पहाड़ों पर चढ़कर माता के दर्शन करना मुश्किल होता है। लिहाजा यहां डोली, घोड़ी और पिट्ठू का इंतजाम है। डोली को चार से छह इंसान मिलकर उठाते हैं जबकि पिट्ठू उस व्यक्ति को कहते हैं जो अपने कंधों पर सामान, बच्चे यहां तक कि बड़ी उम्र के लोगों को भी ढोते हैं। यहीं दिखा बेजुबान जानवर पर होता जुल्म जिसे सभ्य समाज क्रुएल्टी टुवर्ड्स एनीमल्स कहता है। एक कमजोर सी घोड़ी पर जब एक बच्ची को बिठाया गया तो वह बिदक गई और आगे जाने से इंकार करने लगी। हिनहिना कर आगे पीछे होती घोड़ी से जब बच्ची को उसके अभिभावकों ने उतरवा लिया तो घोड़ी वाला छड़Þी लेकर घोड़ी पर पिल पड़ा। बेजुबान जानवर खामोशी से मार खाता रहा। क्या पता वह थक चुकी हो, उसकी पीठ पर काठी चुभ रही हो या कोई और तकलीफ हो। कुछ कुछ ऐसा ही स्कूलों में दिया जाने वाला कार्पोरल पनिशमेन्ट है। बच्चे की ड्रेस गंदी है, जूतों में पालिश नहीं लगी, होमवर्क पूरा नहीं किया और टीचर बेंत लेकर उसपर टूट पड़ता है। बेचारा तीसरी-पांचवीं का बच्चा बोल भी नहीं पाता कि मम्मी की तबियत ठीक नहीं, इसलिए कपड़े नहीं इस्त्री हुए। परिवार किसी शादी में गया था इसलिए होमवर्क पूरा नहीं हुआ। वह बेजुबान जानवर की तरह खड़ा-खड़ा मार खाता रहता है। इन दोनों ही तरह के प्रकरणों के खिलाफ कानून हैं किन्तु उनका पालन नहीं होता। घोड़ी, घोड़ीवाले की मिल्कियत है इसलिए वह उसे पीट सकता है। बच्चे के माता-पिता ने उसे जन्म दिया है इसलिए वे उसे पीट सकते हैं, उसे पीटने के लिए शिक्षकों को उकसा सकते हैं। इसी सोच के चलते कुछ लोग बीवी को पीट लेते हैं। इस मामले में समाज भी पीछे नहीं। वह सामाजिक अनुशासन का स्वयंभू कोर्ट है। समान गोत्र या भिन्न जाति में विवाह करने पर वह दोषी को बेंत मारने, सार्वजनिक रूप से अपमानित करने या फिर सीधे मृत्युदण्ड देने के लिए स्वतंत्र है। यहां हम यह भूल जाते हैं कि सजा से केवल शारीरिक पीड़ा ही नहीं होती बल्कि आत्मसम्मान को भी ठेस पहुंचती है। इंसान तो इंसान, जानवर भी अभिमानी होते हैं। मारपीट या सार्वजनिक प्रताड़ना वे बर्दाश्त नहीं कर पाते। वे खामोशी से आंसू बहाते हैं। खाने की तरफ से मुंह मोड़ लेते हैं और कभी कभी इसी तरह अपनी जान दे देते हैं। कोलकाता के एक नामी स्कूल ला मार्तिनिए के मेधावी छात्र रोवनजीत ने भी शायद सिर्फ इसीलिए मौत को गले लगा लिया कि उसके आत्मसम्मान को ठेस लगी थी। मारपीट और अपमान सहकर केवल ढीठ ही खामोश रहते हैं, फिर चाहे आप उसे कोई भी नाम दो। जिनमें आत्मसम्मान होता है वे या तो विद्रोह कर देते हैं या फिर खुद मिट जाते हैं। फैसला आपको करना है कि आप क्या चाहते हैं।

पापा कसम, हम झूठ नहीं बोलते

माँ कसम वाले देश में अंतत: एक ऐसा टीवी धारावाहिक आ ही गया जिसका एक प्रमुख किरदार बात बात में पापा कसम कहता है। शरद जोशी की कहानियों पर आधारित लापतागंज नाम के धारावाहिक में बिजी पाण्डे बात-बात पर पापा कसम कहता है। वैसे तो इस धारावाहिक को शुरू हुए काफी अरसा हो गया है किन्तु आज इसका विशेष उल्लेख इसलिए कि आज पापा-डे यानी कि फादर्स डे है। आज उसी बाप का दिन है जिसका मौजूदा परिवारों में एक ही काम रह गया है, घर चलाने के लिए पैसे कमा कर ले आना। वरना पर्दे से लेकर चादर तक, राशन से लेकर मेन्यू तक, फर्नीचर से लेकर गाड़ी तक कहीं भी उसकी मर्जी नहीं चलती। हालांकि अब महिलाएं भी पुरुषों के कंधे से कंधा रगड़ रही हैं पर घर चलाने की जिम्मेदारी आज भी पापा लोगों के ही कांधे पर है। उसकी कमाई पर आज भी पहला हक परिवार का है। विवाह की वेदी पर खाई गई कसम को वह आज भी निभाता चला जा रहा है। कम से कम इस मामले में उसकी स्थिति में कोई खास फर्क नहीं आया है। पर ऐसा नहीं है कि उसकी जिन्दगी बदली नहीं है। पहले वह न केवल परिवार के भरण पोषण का जिम्मेदार होता था बल्कि परिवार का मुखिया भी होता था। कहलाता तो वह आज भी घर का मुखिया ही है किन्तु उसकी यह भूमिका अब हाशिए पर है। माँ-बेटियां मिलकर जो भी फैसला करती हैं, वह उसके लिए बाध्यकारी होता है। हाल ही में इसका एक उदाहरण देखने को मिला। नए पुलिस कप्तान के निर्देश पर मजनू पकड़ अभियान चलाया जा रहा है। स्कूल, पार्क, सिनेमा हाल और मॉल पुलिस के निशाने पर हैं। पुलिस ऐसे स्थानों से न केवल मनचले लड़कों को बल्कि फैशनपरस्त लड़कियों की भी धरपकड़ कर रही है। ऐसे ही एक मामले में पुलिस ने दो जोड़ों को पकड़ा। यह जोड़ी क्लास 10-11 की थी। जब उनके माता पिता को समझाइश देने की कोशिश की तो पापा कसम, बाप बेजुबान जानवर की तरह खड़ा रहा। जो कुछ भी कहना सुनना था माँ ने ही बोला-सुना। एक अन्य मामले में यहां के एक तकनीकी संस्थान में अध्ययनरत तीन लड़कों को पुलिस पकड़ लाई। पूछताछ करने पर पता लगा कि वे सभी बारहवीं में सप्लीमेन्टरी सहित सेकण्ड डिविजन में पास थे किन्तु उनकी जिद और मम्मी की मर्जी के आगे पापा की एक नहीं चली थी और लाखों रुपए डोनेशन देकर उन्होंने उनका एडमिशन इस निजी कालेज में करवाया था। पापा खूब समझते थे कि बेटा यहां गुलछर्रे उड़ा रहा है फिर भी वह परिवार के दबाव के आगे विवश थे और प्रतिमाह बेटे को 5 से 10 हजार रुपए खर्चा भेज रहे थे। इसी खर्चे का प्रताप था कि बेटा अपनी गर्लफ्रेंड्स को महंगे गिफ्ट दे रहा था, उन्हें मॉल घुमा रहा था, आईनॉक्स में पिक्चर दिखा रहा था। शर्ट-पैंट और जूते तो दूर चड्डी बनियान तक ब्रांडेड पहन रहा था। उसकी जरूरतों को पूरा करने के लिए ‘नमक का दरोगा’ वाली कहानी पढ़ा हुआ बाप रिश्वत खा रहा था। पर आज वह खुश है। बच्चों ने सुबह सुबह हैप्पी फादर्स डे कहा है। शाम की पार्टी ड्यू हो गई है। बकरे का बाप आखिर कब तक खैर मनाएगा।

पुलिस, कुत्ता और आम आदमी

आॅनर किलिंग के मामले में हाईकोर्ट ने दिल्ली पुलिस को जमकर फटकार लगाई। जस्टिस शिव नारायण धींगड़ा ने कहा कि बॉस का कुत्ता खो जाए तो फोटो लेकर आप पूरा शहर छानते हैं, मगर लोगों को सुरक्षा मुहैया नहीं करा सकते। जब आपको शर्म ही नहीं, तो मानवीयता के बारे में क्या बात की जाए। जस्टिस धींगड़ा का यह बयान दो वर्ष पूर्व 30 मार्च 2008 की उस घटना से जुड़कर आया, जिसमें दिल्ली के पुलिस कमिश्नर का कुत्ता खो गया था और पुलिसवालों ने उसकी तलाश में पूरे शहर को छान डाला था। लोगों को आॅनर किलिंग के मामले में न बचा पाने पर पुलिस की खिंचाई करते हुए जस्टिस धींगड़ा ने कहा कि पुलिस पैसे के लिए संबंधित परिवारों से मिली हुई दिखती है। अदालत ने यह बात तब कही, जब विधिक सेवा सहायता प्राधिकरण की ओर से अधिवक्ता किरण सिंह ने बताया कि अपनी मर्जी से शादी करने वाली एक गर्भवती युवती इन दिनों अपनी सौतेली माँ के हाथों प्रताड़ित हो रही है जबकि पुलिस की कृपा से उसका शौहर जेल में बंद है। मेडिकल रिपोर्ट में लड़की 18 के करीब की बताई गई है जबकि लड़की वालों के कहने पर पुलिस ने 15 साल की किशोरी का मामला दर्ज कर रखा है। पुलिस ऐसा अकसर करती है। तबादले पर आने वाला हर एसपी-आईजी एक ही बात कहता है कि पुलिस आम लोगों की हिफाजत के लिए है। पुलिस अपना व्यवहार सुधारेगी। कर्त्तव्य में लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। आदि-आदि। किन्तु होता यही है कि मामूली चोरी की रिपोर्ट लिखाने के लिए भी आदमी मोहल्ले के नेता या पत्रकार के संरक्षण में ही थाना पहुंचने की हिम्मत जुटा पाता है। ऐसे लोगों की मौजूदगी में ही पुलिस का व्यवहार ठीक-ठाक रहता है। वरना वह किसे अबे! कहेगी और किसे साला बनाएगी इसका कोई ठिकाना नहीं रहता। कहते हैं कि काम की अधिकता और बहुत कम आराम के कारण पुलिस तनाव में रहती है, चिड़चिड़ाती है। तो क्या इस तरह से उसका तनाव कम हो सकता है। तनाव कम करने का सबसे बढ़िया नुस्खा तो यही है कि सुबह-सुबह चार काम अच्छे कर लो तो मन दिन भर तृप्त रहता है। व्यवहार अच्छा रहेगा तो अपनी शिकायत लेकर आम आदमी अकेला आएगा। थाने के कामकाज में नेता नुमा लोगों की दखलअंदाजी कम होगी। सब तरफ सुकून होगा। आप अपनी ही आफिस में बार-बार कुर्सी छोड़कर उठने और फोन पर आला अफसरों की बक-झक सुनने से बच जाएंगे। एक बार आजमा कर तो देखें.. फायदा ही फायदा नजर आएगा।

सात खून माफ

‘समरथ को नहीं दोस गुसार्इं’ यह कहावत बहुत पुरानी है। इसका आशय यह है कि जिसमें धन, बल, कला, कौशल से परिस्थितियों को अपने पक्ष में मोड़ने का सामर्थ्य होता है उसके लिए कोई भी अपराध अपराध नहीं होता। उसे किसी बात का दोष नहीं लगता। संभवत: इसी फलसफे को ध्यान में रखकर देश भर में जहां कहीं भी विदेशी या बहुराष्ट्रीय कल-कारखाने लगते हैं वहां इनका विरोध किया जाता रहा है। 70 और 80 के दशक में जहां इन विरोधों को थोड़ी बहुत तरजीह दी जाती थी वहीं अब इन्हें बर्बरता पूर्वक कुचल देने की प्रवृत्ति पनपने लगी है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण भोपाल की गैस त्रासदी है। यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड के 1982 के सुरक्षा अंकेक्षण में 30 ऐसे बिंदुओं की तरफ कंपनी का ध्यान आकर्षित किया गया था जिससे जनस्वास्थ्य को खतरा हो सकता था। इन बिंदुओं पर अमरीका स्थित कंपनी के प्लांट में तत्काल कदम उठाए गए किन्तु भोपाल स्थित इकाई में इन्हें नजरअंदाज कर दिया गया। 3 दिसम्बर 1084 को इसके परिणाम भी आ गए। दरमियानी रात रिसे मिथाइल आइसोसायानेट गैस की चपेट में भोपाल के 5,00,000 लाख लोग आ गए जिसमें से लगभग 3000 लोगों की तत्काल मौत हो गई। तीन सप्ताह में मृतकों की संख्या 8000 तक पहुंच गई। कालांतर में इतने ही और लोगों की मौत हो गई। सरकार ने क्या किया? कंपनी के सीईओ वारेन एंडरसन को सुरक्षित देश के बाहर भेज दिया जबकि वह गंभीर आपराधिक लापरवाही का दोषी था। प्लांट साइट पर तब से आज तक सैकड़ों टन विषैले पदार्ष लावारिस पड़े हैं जिससे भूजल संक्रमित होता रहा है। ऐसा नहीं है कि यह कोई इकलौता हादसा है। देश भर में इस तरह के हादसे होते रहे हैं और सरकारें विदेशी नागरिकों की सुरक्षा की नैतिक जिम्मेदारी के तहत आम भारतीयों की जान माल का सौदा करती रही है। 24 सितम्बर 2009 को कोरबा के बालको चिमनी हादसे में 35 लोगों की मौत हो गई। चिमनी का निर्माण चीनी कंपनी शैनडांग इलेक्ट्रिक पावर कंस्ट्रक्शन कारपोरेशन द्वारा गैनन डंकरले एंड कंपनी लिमिटेड के माध्यम से किया जा रहा था। हादसे के तुरन्त बाद इन फर्मों के विदेशी नागरिकों एवं तकनीशियों को सुरक्षा के वास्ते सुरक्षित बाहर निकाल दिया गया जबकि जनआक्रोश को शांत करने बालको के उपाध्यक्ष को गिरफ्तार कर लिया गया। खैर यह तो हुई सुरक्षा की दृष्टि से की गई कार्रवाई। सरकारें किस हद तक गिर सकती हैं इसका उदाहरण 2 जनवरी, 2006 को उड़ीसा के कलिंगनगर में देखने को मिला। यहां टाटा के प्रोजेक्ट का शांतिपूर्ण विरोध कर रहे आदिवासियों पर न केवल पुलिस ने गोलियां चलार्इं बल्कि बाद में पोस्टमार्टम के बहाने मृतकों के हाथ भी काट लिए। प्राकृतिक साधनों-संसाधनों के अंधाधुंध दोहन, केवल राजस्व और जीडीपी पर नजर रखकर बनाई जा रही योजनाओं की कीमत आखिर कब तक देश का आम नागरिक चुकाता रहेगा? क्या इन मामलों को जानने के बाद भी हम कहेंगे कि प्रत्येक आंदोलन केवल विकास विरोधी मानसिकता की उपज है?

एक मरीज तीन अटेंडेंट

मुन्नाभाई एमबीबीएस 99 फीसदी लोगों ने देखा है। इसलिए इस फिल्म के चरित्रों से लेकर प्रसंगों का उदाहरण यह सोचकर दिया जा सकता है कि हम रामायण या महाभारत से उद्धरण पेश कर रहे हैं। मुन्ना भाई ने अपनी पहली ही क्लास में डीन से सवाल किया था, ‘यदि कोई मरीज मर रहा है तो क्या उसके लिए फार्म भरना जरूरी है?’ सेक्टर-9 के मेन हास्पीटल में यह सवाल बार बार पूछने को जी करता है। अमूमन कोई सर्दी खांसी बुखार दिखाने के लिए इस अस्पताल में नहीं आता। वह तभी आता है जब हालत पतली होती है। थोड़ी बहुत तैयारी के साथ यहां आने वाला मरीज न केवल हक्का बक्का रह जाता है बल्कि हलाकान भी खूब होता है। जवाहर लाल नेहरू चिकित्सालय एवं अनुसंधान केन्द्र में प्रति प्राइवेट मरीज कम से कम तीन अटेंडेंट लगते हैं। एक मरीज के आसपास जो उसे उठा सके, बिठा सके, लिटा सके, थुका सके, व्हीलचेयर पर बैठाकर ले जा सके, स्ट्रेचर पर डाल सके। दूसरा अटेंडेंट कागजी कार्रवाई करने के लिए भागता दौड़ता रहे। कभी दवा तो कभी इंजेक्शन के लिए हास्पीटल सेक्टर मार्केट के चक्कर लगा सके। तीसरा व्यक्ति सबसे अहम होता है। उसकी ड्यूटी मरीज को कैजुअल्टी तक लाने के बाद सीधे बजरंगबली की शरण में पहुंचने की होती है। वह वहीं बैठकर तब तक हनुमानजी का स्मरण करता रहे जब तक कि मरीज सही सलामत अस्पताल से डिस्चार्ज न हो जाए। कैजुअल्टी या आपात चिकित्सा के लिए डाक्टर दिखाने की फीस 315 रुपए है। कैजुअल्टी में उपलब्ध चिकित्सक का विशेषज्ञ होना जरूरी नहीं फिर भी इतनी फीस। बहरहाल मामला एक बड़े अस्पताल में इलाज कराने से जुड़ा है इसलिए यह भी माना। यदि डाक्टर ने एडमिट करने के लिए लिख दिया तो तत्काल पांच हजार रुपए जमा करवाएं। रसीद प्राप्त करें तभी आगे की कार्रवाई होगी। अस्पताल पहुंचते समय यदि मरीज की तरफ से ध्यान मिनट भर के लिए भी हटा हो तो गेट के पास खड़ी एटीएम मशीन जरूर दिखी होगी। एक और एटीएम मशीन काफी हाउस के आसपास कहीं है। अच्छा होता कि एक डेबिट-क्रेडिट कार्ड रीडिंग मशीन काउंटर पर ही रख ली जाती। कम से कम भागदौड़ से तो मुक्ति मिलती। वैसे जिनके पास इतने आदमी फालतू नहीं हैं, उनके लिए भी यहां व्यवस्था है। यहां भाड़े पर अटेंडेंट मिल जाते हैं। इन अटेंडेंटों की सेवा हासिल करना अच्छा रहता है। वे अस्पताल के सभी अली-गली से परिचित हैं। यही नहीं कौन सा काम किस तरह आसानी से हो सकता है इसकी भी उन्हें जानकारी होती है। अस्पताल के कर्मचारियों से लेकर सुरक्षाकर्मियों तक से इनकी पहचान होती है जिसके कारण अटेंडेंट और फुड पास से भी मुक्ति मिल जाती है। ऐसा नहीं है कि अस्पताल को अपनी जिम्मेदारियों का अहसास नहीं है। अस्पताल में क्या-क्या और कैसा-कैसा होना चाहिए इसकी जानकारी आपको यहां हर गलियारे में लगे डिस्प्ले फ्लेक्स पर मिल जाएंगे। यह बात और है कि इसका लेश मात्र भी असर यहां के कर्मचारियों पर नहीं होता।

ओहदे का गुरूर

मेंगलुरु में 22 मई को हुआ भीषण एयर इंडिया विमान हादसा टाला जा सकता था अगर विदेशी कैप्टन ने को-पायलट आहलूवालिया की सलाह मान ली होती। इस हादसे में 158 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी। पायलट और एयर ट्रैफिक कंट्रोल के बीच बातचीत के रिकॉर्ड से पता चलता है कि को-पायलट एचएस आहलूवालिया ने कैप्टन ज़्लॉट्को ग्लूसिका से लैंड न करने का अनुरोध किया था। उन्होंने कम से कम दो बार यह अनुरोध किया, मगर कैप्टन ने उनकी सलाह की अनदेखी की। सबसे बड़ी बात यह कि को-पायलट ने समय रहते यह सलाह दे दी थी। सूत्रों के मुताबिक उन्होंने लैंड न करने की सलाह तभी दे दी थी जब विमान 800 फुट की ऊंचाई पर था। आहलूवालिया मेंगलुरु के ही थे और उन्हें वहां के रनवे की पूरी जानकारी थी। वह 66 बार वहां लैंड कर चुके थे। एटीसी सूत्रों के मुताबिक, आहलूवालिया ने कम से कम दो बार अपने कमांडर से अनुरोध किया कि वह थोड़ी देर मंडराते रहें। संभवत: उन्हें एहसास हो गया था कि विमान या तो ज्यादा तेज है या ज्यादा ऊंचाई पर है-यानी एप्रोच करने लायक स्थिति में नहीं है। ऐसे में मंडराते रहना सबसे मान्य तरीका होता है ताकि दूसरी कोशिश में विमान सुरक्षित लैंड कराया जा सके। मगर, आहलूवालिया की सलाह पर ध्यान नहीं दिया गया और नतीजा भीषण हादसे के रूप में सामने आया। ऐसा अकसर होता है। चलती ओहदे की ही है फिर भले ही वह गलत हो। यह कोई पहली मर्तबा नहीं है जब किसी ओहदेदार की ढिठाई की वजह से निरपराध लोगों की जान गई हो। छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित इलाके में एक बार हुक्म हुआ कि फौरन बल भेजा जाए। एक हवलदार ने सकुचाते हुए कहा, साहब इसमें खतरा है। इन सड़कों पर लैंड माइन्स हो सकती हैं। पर लताड़ पड़ी। उल्लू का पट्ठा कह दिया गया। डरपोक बताकर उसे पीछे थाने में छोड़ दिया गया और रंगरूटों को लेकर ट्रक रवाना हो गया। आगे बारूदी सुरंग तो नहीं मिली किन्तु वहां पेड़ गिराकर एम्बुश लगाया गया था। ड्राइवर के कानों में हवलदार की बातें तब भी गूंज रही थीं। उसने गाड़ी धीमी की और तेजी से यू टर्न देकर वापस दौड़ा दिया। पीछे से हमले हुए किन्तु वे उसकी जद से बाहर थे। जानते हैं उस हवलदार का क्या हुआ? उसे काली जुबान वाले की संज्ञा दे दी गई। पिछले वर्ष के पूर्वार्द्ध में कांकेर के जंगल वारफेयर कालेज जाने का सौभाग्य मिला था। वहां जंगलों की रणनीति पर चर्चा के दौरान यह बात उभर कर सामने आई थी कि जवानों को चुस्त दुरुस्त करने की जरूरत है किन्तु इनके आला अफसरों को जंगल वारफेयर सीखने की कहीं ज्यादा जरूरत है। ये जवान चाहे कितने भी तेज तर्रार और समझदार क्यों न हो जाएं वे वरिष्ठ अफसरों का हुक्म बजाने के लिए बाध्य हैं। यदि रणनीतिकारों से चूक होगी तो जवानों को बचाना मुश्किल होगा। तब से अब तक गंगा में काफी पानी बह चुका है, बस्तर से लेकर राजनांदगांव तक काफी खून खराबा हो चुका है और अब तो केन्द्र सरकार भी किंकर्त्तव्य विमूढ़ की स्थिति में आ गई है। क्या ओहदेदार का ढीठ होना जरूरी है?