photo journalist from chhattisgarh. Worked for the Navabharat in Orissa as bureau chief. Presently with the Haribhoomi Super Central Desk.
Monday, May 31, 2010
जान का दुश्मन कैमरा मोबाइल
मध्यप्रदेश के छतरपुर में पुलिस वालों ने एक जोड़े को पार्क में पकड़ा। उन्होंने छोरे का कैमरा मोबाइल छीन लिया और उसे मारपीट कर भगा दिया। छोरी को वे एक खाली दुकान में ले गए और वहां उसकी अश्लील वीडियो बनाई। इसके बाद लड़की को भी छोड़ दिया। अब जोड़े की जान कैमरा मोबाइल में अटक गई। वे उसे वापस पाने के लिए चिरौरी-विनती करने लगे। पुलिस को इसी का इंतजार था। उन्होंने दस हजार रुपए की मांग कर दी। यह एक बड़ी रकम थी। ऊपर से पैसे देने के बाद भी इस बात की कोई गारंटी नहीं थी कि एमएमएस का अस्तित्व मिट जाएगा या मोबाइल वापस मिल जाएगा। हिम्मत करके उन्होंने इसकी रिपोर्ट दर्ज करा दी। बस फिर क्या था। पुलिस ने संगठित गिरोह की तरह उन्हें डराना धमकाना शुरू कर दिया। किशोरी और उसकी 14 वर्ष की छोटी बहन इतना डर गई कि अपने टीचर पिता का सामना करने के बजाय उन्होंने आत्महत्या कर ली। पुलिस वाले सस्पेंड हो गए। उनसे कैमरा मोबाइल बरामद हो गया किन्तु एमएमएस डिलीट हो चुका था। एक अन्य घटना में पांच साल पहले वडोदरा शिक्षा महाविद्यालय में एक महिला प्रशिक्षार्थी ने अपनी सहेली का बाथरूम में एमएमएस बना लिया। इसे उसने अपने मित्र को भेज दिया। मित्र ने एमएमएस कुछ और लोगों को भेज दिया। मामला पकड़ में आया पर कुछ खास कार्रवाई नहीं हुई। पहला मामला वसूली का था जबकि दूसरा मामला मजा लेने का। चित्रकारी और मूर्तिकला आरंभ से ही मनुष्य की फितरत में शामिल है। जब कैमरा नहीं था लोग पोट्रेट बनवाया करते थे। फिर स्टिल कैमरा आया। फोटोग्राफी तब भी आसान नहीं थी। आम लोगों के लिए उतनी प्राइवेट भी नहीं थी। वे फोटो तो खींचते थे किन्तु फिल्म धुलवाने और प्रिंट बनवाने के लिए वे स्टूडियो या कलर लैब पर निर्भर थे। मूवी कैमरा आम आदमी के लिए नहीं था। लोगों ने मजबूरी में अपनी आदिम इच्छाओं को दबाए रखा था। इस बीच डिजिटल फोटोग्राफी का दौर शुरू हो गया। फोटोग्राफी न केवल सस्ती हो गई बल्कि प्राइवेसी की गारंटी हो गई। स्टूडियो या प्रोसेसिंग लैब का झंझट खत्म हो गया। जब चाहो खींचो, चुटकियों में नेट पर डालो, साथियों को भेजो। पकड़े जाओ तो चुटकियों में डिलीट कर दो। अकेला कैमरा संदिग्ध उपकरण था। इसकी भी राह निकल आई। कैमरा मोबाइल में इनबिल्ट हो गया। अब कोई नहीं बता सकता कि आप फोन पर बात कर रहे हैं या किसी की वीडियो रिकार्डिंग कर रहे हैं। लोग इसका खूब लाभ उठा रहे हैं। अब कोई भी इससे सुरक्षित नहीं। कब कौन किसकी एमएमएस बना लेगा कहना मुश्किल है। अब तो बस एक ही चारा रह गया है कि लोग जेम्स बाण्ड की फिल्में देखें। हर किसी पर शक करना सीखें। बेडरूम-बाथरूम का खास ध्यान रखें। खिड़की, वेन्टीलेटर की नियमित चेकिंग करें, दरवाजे, दराज के हैण्डल, नॉब, की होल्स, गुलदस्ता सबकुछ चेक करने के बाद ही अपनी प्राइवेसी के प्रति सुनिश्चित हों। ऐसा करते समय इस बात का भी ख्याल रखें कि चीनी स्पाई कैमरा, कैमरा पेन, कैमरा बटन का आकार एक-डेढ़ सेन्टीमीटर तक छोटा हो सकता है। हाईटेक जिन्दगी मुबारक हो।
Friday, May 28, 2010
बैल की सवारी
टीवी पर राखी के स्वयंवर रचाने से बहुत पहले छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के घुमका गांव की अन्नपूर्णा ने स्वयंवर रच कर अपने लिए दूल्हे का चयन किया था। अपने विवाह को खास बनाने के लिए इनोवेटिव होना प्रत्येक व्यक्ति का निजी मामला है। पैसे वाले लोग आसमान में, अंतरिक्ष में, समुद्र की गहराईयों में विवाह करते हैं। गांव-खेड़े का आदमी इतना इनोवेटिव नहीं है, न ही उसके पास इतने साधन हैं। वे तो पुराणों में प्रेरणा की तलाश करते हैं। इसलिए अन्नपूर्णा ने सीता से प्रेरणा लेकर अपने लिये वर चुना तो बालोद के कृषक पुत्र पोषण साहू ने शिव पार्वती विवाह से प्रेरणा लेकर बैल पर बारात निकाली। उन्होंने दल्लीराजहरा की प्रेरणा के साथ बैल पर बैठकर ही फेरे लिए। यही नहीं दुल्हन के साथ घर पहुंचने के बाद टिकावन की रस्म भी उन्होंने बैल पर बैठकर ही अदा की और मंडप के फेरे लिए। कृषक पुत्र के जीवन में बैल का महत्व सर्वोपरि है। यदि उसने अपने विवाह के साथ भी इसका संबंध जोड़े रखा तो विवाह संस्था के प्रति उसके समर्पण और निष्ठा को ही रेखांकित करता है किन्तु यह बात सामाजिक बैलों की समझ में आए तब न। समाज के नाम पर कुछ बैलों ने इसपर आपत्ति दर्ज करा दी है। उनका कहना है कि यह भगवान शिव की सवारी है और पोषण ने उनकी धार्मिक भावना को ठेस पहुंचाई है। यह वही समाज है जो सब्जी मण्डी में घुस आए बैल तो क्या सांड को भी लाठी से पीटता है। जो विघ्नहर्ता गणेश के वाहन को चूहा मार दवाई खिलाकर मारता है। जो माता दुर्गा के वाहन का शिकार कर उसपर पांव धर कर फोटो खिंचवाता है। जो यमराज के वाहन भैंस की बलि देता है। शीतला माता के वाहन गधे पर भार ढोता है और उसे गधा होने का उलाहना देता है। अपनी नस्ल के बेवकूफों को भी गधे की संज्ञा देता है। जिस बैल की चिंता में वे दुबले हो रहे हैं उसी बैल को वह हल में, गाड़ा में, कोल्हू में जोतता है। क्या बेहूदगी है? विरोध करने को दुनिया में और कुछ नहीं मिला। क्या बैल की सवारी करने मात्र से पोषण ने खुद को शिव और अपनी पत्नी प्रेरणा को पार्वती के रूप में पेश कर दिया। यदि यह सही है तो क्या गांव-गांव में बारिश के दिनों में भैंसों की सवारी करने वाले बच्चे यमराज के क्लोन होते हैं। दरअसल यह कुढ़न और जलन से प्रेरित विरोध है जिसका लाभ तो कुछ नहीं होता, अपितु नुकसान ही अधिक होता है। आप सोच भी नहीं पाए, और किसी ने कर के दिखा दिया। इसका लाभ किसको मिला। आपने विरोध किया और पोषण-प्रेरणा विवाह समाचार बन गया। जिन्हें कानों कान खबर नहीं होनी थी उन्हें भी पूरे तफसील के साथ घटना की खबर हो गई। इतिहास गवाह है कि विवादित फिल्म और विवादित पुस्तकें हिट भले न हुई हों उन्हें चर्चित होने का लाभ अवश्य मिला है। इस विरोध के पीछे भी कहीं यही मंशा तो नहीं...
Tuesday, May 25, 2010
एथिकल ट्रीटमेन्ट आफ एनिमल्स
क्या घोड़े को तांगे में जोता जाना क्रूरता है? क्या कुत्ते के गले में पट्टा डालना क्रूरता है, क्या बैलों को हल में, गाड़ा में या कोल्हू में जोतना उनके प्रति अपराध है? विकास के क्रम में इंसानों ने सबसे पहले मवेशियों को साधा। उनके साथ सहअस्तित्व का समीकरण तैयार किया और दोनों एक दूसरे के पूरक बन गए। पशु अपनी क्षमता के अनुसार इंसान का काम करता है और इंसान अपने सामर्थ्य के अनुरूप उसकी देखभाल करता है। इंसान का यह व्यवहार केवल पशुओं के प्रति नहीं है बल्कि प्रत्येक उस इंसान के प्रति भी है जिससे वह काम लेता है। खेतों में खटने वाला खेतिहर मजदूर, चिलचिलाती धूप में, मूसलाधार बारिश में लोगों को उनकी मंजिल तक पहुंचाता रिक्शा वाला, ट्रकों से माल उतारता-चढ़ाता हमाल सभी अपनी-अपनी भूमिका निभा रहे हैं। पंथी नृत्य में कोई शीर्ष पर चढ़कर जोहार करता है तो कोई नीचे कईयों का बोझ लिए मांदल की थाप पर थिरक रहा होता है। इस व्यवस्था के खिलाफ बोल-बोल कर असंतोष तो फैलाया जा सकता है किन्तु इसे बदला नहीं जा सकता। आदिम सभ्यता ने अगर मवेशियों का उपयोग किया तो अपने समाज में उन्हें यथेष्ट सम्मान भी दिया। पशु पक्षियों को समर्पित तीज त्यौहारों की एक पूरी शृंखला ऐसे समाज में मिलती है। भारतीय समाज ने इस दिशा में कई निर्णायक पहल किये। जिन मंदिरों की शुचिता का वह पूरा ध्यान रखता था वहां उसने मवेशियों के सींग से बने सींगा, खाल से बने नगाड़ों को जगह दिलाई। चांवर में मोर पंख का उपयोग किया। गाय-बैल को तो उसने इतना सम्मान दिया कि एक को माता और दूसरे को पूज्य माना। कभी इन्हें पांव भी लग गया तो प्रायश्चित्त करता आया है। इनकी खाल के जूते पहनना तो बहुत दूर की बात है। अब जाकर पाश्चात्य संस्कृति में रंगे हुए लोग चमड़े के जूते, चमड़े की बेल्ट, चमड़े के जैकेट-दस्ताने, हैण्ड बैग, वालेट, कारों और ड्राइंग रूम में लेदर अपॉल्स्ट्री का उपयोग करता है और एथिकल ट्रीटमेन्ट आॅफ एनिमल्स की बातें करते हैं। शायद उन्हें पता नहीं कि खालों को निकालने की प्रक्रिया क्या होती है। भारतीय संस्कृति में खाल मरे हुए मवेशियों की उधेड़ी जाती थी। जितना, जैसा निकला उसीसे काम चला लिया। पर नई पीढ़ी पेटेन्ट लेदर, साफ्ट लेदर, वनपीस स्प्रेड की भाषा बोलती है। इनकी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए खाल उतारने की पद्धति अलग होती है। जीवित मवेशियों की पूंछ काटी जाती है, सींग तोड़ दिए जाते हैं और उन्हें जीवित ही उलटा टांग कर उनके गले में छोटा सा छेद कर दिया जाता है। ऐसे मवेशियों की मौत खून के रिसने से होती है। पूरा शरीर खिंच कर लंबा हो जाता है। इस तरह से प्राप्त किए गए चमड़े का उपयोग करने वाले यदि शुद्ध-शाकाहारी भी हैं तो क्या। इनसे तो वे लोग सहस्त्र गुणा बेहतर हैं जो मांस, मछली का सेवन उदरपोषण के लिए करते हैं। कम से कम आहारचक्र का संतुलन तो बना रहता है।
ठीकरा फोड़ना जरूरी क्यों?
हमारे अपने पुत्र को छोड़कर मोहल्ले के सभी लड़के आवारा टाइप के हैं। हमारा बेटा इसलिए मन लगाकर पढ़ाई नहीं करता क्योंकि आवारा लड़के उसे खेलने के लिए ले जाते हैं। आवारा लड़कों के साथ रहकर वह मारामारी सीख रहा है वरना हमारा लड़का तो ऐसा कर ही नहीं सकता। यह एक माँ की सोच हो सकती है किन्तु जब यही सोच संस्थागत हो जाए तो चिंता होना स्वाभाविक है। नए दौर में देशी सबकुछ खराब है और विदेशी सबकुछ अच्छा। खान-पान, रहन-सहन, सोच, गीत-संगीत, परिधान सबकुछ विदेश का अच्छा है। पूरा बाजार इसी सोच पर काम कर रहा है। ऐसे में एक विमान दुर्घटना हो जाए और उसका ठीकरा एक विदेशी पायलट के सिर फोड़ने की कोशिश की जाए तो गुस्सा आ ही जाता है। देशी ‘चिंतामणियों’ के बयान पढ़ रहा हूं कि देश के साढ़े पांच हजार पायलटों मेें से 10 फीसदी यानी कि लगभग साढ़े पांच सौ पायलट विदेशी हैं। क्यों हैं? क्या एयर इंडिया इनकी शक्ल का इस्तेमाल अपने विज्ञापन में करता है? नहीं! ऐसा नहीं है। दरअसल देश के लोगों को सस्ती हवाई यात्रा चाहिए। देशी पायलटों को मोटी तनख्वाह चाहिए। सुख सुविधाएं चाहिए। इसके बाद भी जब उनकी इच्छा होगी वे हड़ताल पर चले जाएंगे। विदेशी पायलटों के साथ ये दिक्कतें नहीं हैं। वे कांट्रेक्ट पर काम करते हैं। पुसाया तो किया, नहीं पुसाया नहीं किया। पर एक बार एग्रीमेन्ट कर लिया तो उसकी शर्तों का वे पूरा सम्मान करते हैं। खरबूजा दिखाकर अपना रंग बदलवाने की कतार में नहीं खड़े हो जाते। मैंगलोर दुर्घटना में जिस पायलट की मृत्यु हो गई वह सर्बिया मूल के थे। 55 वर्षीय ज्लातको ग्लूसिया दस हजार घंटों की उड़ान पूरी कर चुके थे। कहा जा रहा है कि विदेशी पायलट हमारे देश की भौगोलिक विविधता से परिचित नहीं हैं। उनका उच्चारण ठीक नहीं है इसलिए उड़ान नियंत्रण कक्ष के साथ उनका तालमेल सही नहीं बैठ पाता। ऐसी बेहूदा बातें कोई सिरफिरा ही कर सकता है। ऐसे में तो भारत आने वाली प्रत्येक उड़Þान में एक भारतीय को बैठाना पडेÞगा। दरअसल अपना दोष किसी और के मत्थे मढ़ने की कोशिश करना हमारी फितरत में शामिल हो गया है। हादसे कभी भी, कहीं भी हो सकते हैं। हाईवे पर होने वाली ज्यादातर दुर्घटनाओं में अनुभवी ड्राइवर शामिल होते हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि उन्हें गाड़ी चलानी नहीं आती या ट्रैफिक सिग्नल समझ में नहीं आता। कोई भी अपनी गाड़ी की चाभी किसी अनाड़ी के हाथ में नहीं देता फिर भी दुर्घटनाएं तो हो ही रही हैं। इसीलिए तो उसे दुर्घटना कहते हैं, हादसा कहते हैं, एक्सीडेन्ट कहते हैं। इसके लिए किसी को दोषी ठहराना ठीक उसी तरह है जैसे गांव में हैजा फैलने पर किसी विधवा को टोनही साबित करने की कोशिश करना। कम से कम बुद्धिजीवी तो इससे बाज आएं।
Friday, May 21, 2010
गृहिणी का गैस सिलिण्डर
महिलाओं के सशक्तिकरण की बातें सुन-सुन कर कान पक गए हैं। समझ में नहीं आता कि वे कमजोर कब थीं। अपने फायदे के लिए उन्हें नेता जब चाहे कमजोर बना लेते हैं, जब चाहे अबला घोषित कर देते हैं और जब चाहे रणचण्डी की संज्ञा दे देते हैं। अब जब पेट्रोलियम पदार्थों के दाम बढ़ाने की बारी आई तो इसमें भी गृहिणी की फर्जी चिंता को साथ में जोड़ दिया गया। हमारा मोहल्ला मध्यमवर्गीय परिवारों का है। कुछ उच्च मध्यमवर्ग के हैं तो कुछ निम्न मध्यमवर्ग के परिवार भी यहां रहते हैं। सभी के घर स्कूल कालेज में पढ़ने वाले बच्चे हैं। माहवारी दस से पंद्रह हजार रुपए की आमदनी में गृहिणी को ढेरों काम निपटाने पड़ते हैं। इसमें पति से लेकर बच्चों तक को पेट्रोल के लिए पैसे देना, महीने का राशन लाना, किराया देना, गैस-बिजली का बिल चुकाना, साग-सब्जी खरीदना, कुछ पैसे भविष्य के लिए जोड़ना तथा थोड़ा पैसा आपातकालीन जरूरतों के लिए रखना होता है। दूध तो कब का लिस्ट से बाहर हो गया है। हालात ऐसे हो रहे हैं कि कभी कोई मेहमान आ जाए तो उसका स्वागत करने से पहले ही उसके जाने की तिथि जान लेने की इच्छा होती है। सभी चीजों के दाम लगातार बढ़ रहे हैं। शिक्षा लगातार महंगी हो रही है। अब पेट्रोल के फिर से पांच-छह रुपये तक महंगा होने की बात हो रही है। उसकी सांस अटकने लगी है। उसका आत्महत्या करने को जी चाहता है। बल्कि देश भर में कुछ लोग सामूहिक रूप से आत्महत्या कर चुके हैं। पर सरकार की बेहयाई देखिए। वह कह रही है कि रसोई गैस के दाम नहीं बढ़ाए जाएंगे ताकि गृहिणी को राहत मिले। यह कैसी सोच है जिसमें महिला को केवल रसोई गैस के सिलिण्डर से जोड़ कर देखा जाता है? यह तो हुई उन परिवारों की बात जिनकी कमाई पांच अंकों में है। देश की अस्सी फीसदी आबादी के लिए आज भी चार अंकों का वेतन सपना है। क्या उन्हें इंसानों में गिना जा सकता है? सरकार के लिए वे सिर्फ वोटर हैं। पेट्रोल की बढ़ती कीमतों का सच जानना हो तो लोग अपने साधनों से पता लगाएं कि डीजल और पेट्रोल पर सरकार कितना पैसा टैक्स और ड्यूटी वसूलती है। झूठ और सच का पता खुद-ब-खुद लग जाएगा। पढ़े लिखे मूर्खों को अंतरराष्ट्रीय तेल के भाव दिखाने वाली सरकार की पोल पट्टी खुल जाएगी।
जड़ी बूटी और खनिज सम्पदा
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह समेत कुछ बुद्धिजीवियों ने एक अच्छा सवाल उठाया है। पहली बार कोई मुद्दे की बात उठी है। डॉ रमन सिंह कहते हैं कि देशभर में नक्सलियों का कब्जा उन्हीं जंगलों एवं पहाड़ों पर है जहां खनिज हैं। खनिज संपदा पर कुंडली मारकर नक्सली विकास को अवरुद्ध कर रहे हैं। हो सकता है वे सही हों। पर नक्सली पहाड़ों में खदान नहीं चला रहे। उत्खनन का कोई मामला आज तक पकड़ में नहीं आया है। अब सवाल यह उठता है कि नक्सली यहां क्यों बैठे हैं? उनका खर्चा कैसे चल रहा है? यह कोई यक्ष प्रश्न नहीं है जिसका उत्तर देने के लिए जान की बाजी लगानी पड़े। डॉ. रमन सिंह स्वयं भेषज चिकित्सक यानी कि आयुर्वेद के डाक्टर हैं। उन्हें खूब पता है कि जिन पहाड़ों के नीचे खनिज दफ्न होते हैं, वहीं तरह-तरह की जड़ी बूटियां उगती हैं। ये बेशकीमती जड़ीबूटियां दुनिया भर में दवा बनाने के काम आती हैं। यही नहीं इन्हीं पहाड़ियों पर गांजे की जबरदस्त खेती होती है। कोई चालीस साल पहले इन वनाच्छादित पहाड़ी इलाकों में कुछ खोजी प्रवृत्ति के लोग व्यापार करने पहुंचे। उनका उद्देश्य ऐसी जगहों पर लंगोटी छाप आदिवासियों को सौदा बेचना नहीं था। उनकी दुकानें जरूर होती थीं किन्तु पीछे धंधा कुछ और होता था। वे आदिवासियों से वनोपज संग्राहक का काम लेते थे। वे इन बेशकीमती जड़ी बूटियों समेत अन्य वनोपज उनसे मिट्टी के मोल हड़प लेते थे और उसे सही बाजार तक पहुंचाकर हजारों रुपए कमाते थे। कालांतर में यह राशि लाखों, करोड़ों तक जा पहुंची है। यह नेटवर्क आज भी जिन्दा है। 20-25 साल पहले इस धंधे पर उगाहू लोगों की नजर पड़ी। वे न तो संग्राहक थे और न ही व्यापार में पूंजी लगाने का उनका कोई इरादा था। वे इन व्यापारियों को धमकाकर उनसे वसूली करने लगे। फिर शुरू हुआ आदिवासी अंचलों में विकास के नाम पर पैसे बहाने का दौर। अब तक माफिया बन चुके इन हफ्ता वसूली करने वालों को नए मुर्गे सरकार ने खुद तैयार कर के दिए। इन्हें ठेकेदारों और कमीशन खोर अफसरों से भी हफ्ता-महीना मिलने लगा। आज यह नेटवर्क बेहद शक्तिशाली है। इन लोगों की पहुंच हर उस जगह है जहां तक सरकार पहुंच सकती है। अब सवाल यह उठता है कि जब वनों को सुरक्षित रखते हुए अरबों रुपए कमाए जा सकते हैं तो खदान खोलने की जरूरत ही क्या है? विकास के लिए कारखाना लगाना ही क्यों जरूरी है? सरकार यदि करोड़ों रुपये मूल्य की जड़ीबूटियों का महत्व नहीं समझती तो यह उसकी गलती है। वनोपज और जड़ीबूटियों से आदिवासियों को उन्हीं के वातावरण में बेहतर जीवन दिया जा सकता है किन्तु यह प्रक्रिया धीमी है। इससे नया उपभोक्ता बाजार भी नहीं खुलता। इससे एकमुश्त मलाई नहीं खाई जा सकती। अपने डिग्रीधारी भाई भतीजों को डायरेक्टर नहीं बनाया जा सकता। मजेदार बात यह है कि इस मामले में सरकार झूठ नहीं बोल रही। फिलहाल वह आधे सच से काम चला रही है। सरकार कह रही है कि उसने किसी निजी या बहुराष्ट्रीय कंपनी को खदानों का पट्टा नहीं दिया। वह इसमें ‘अब तक’ शब्द नहीं जोड़ रही। खदान तो खदान है, फिर चाहे सेल की हो, एनएमडीसी की हो या किसी और की।
Thursday, May 20, 2010
आतंक का भयावह होता चेहरा
आतंक को आतंक से कुचलने का मिशन फेल हो चुका है। भारत ने ही कभी यह सिद्धांत प्रतिपादित किया था कि हिंसा से हिंसा खत्म नहीं की जा सकती किन्तु हमने इन सिद्धांतों को कब का भुला दिया है। यदि शक्ति की बात करें तो संप्रति विश्व की सबसे बड़ी ताकत है अमरीका। अमरीका अपना मतलब निकालने के लिए सदैव ताकत का इस्तेमाल करता आया है। अपने दुश्मनों को निपटाने की उसकी कोशिशें कहां तक कामयाब हुई हैं, यह किसी को बताए जाने की जरूरत नहीं। बावजूद इसके ताकत में हमारी न तो आस्था कम हुई है और न विश्वास। हमने कांटे से कांटा निकालने और लोहे से लोहा काटने की उक्तियों को तो खूब याद रखा है किन्तु उससे कहीं अधिक सहूलियत के साथ उस कहावत को भुला दिया है कि विनम्रता सबसे बड़ा हथियार है। नक्सलियों के खिलाफ हमारे प्रयास भी कुछ ऐसे ही हैं। हम न केवल यह लड़ाई आधे मन से लड़ रहे हैं बल्कि बातचीत की पेशकश भी आधे-अधूरे मन से ही कर रहे हैं। आजाद भारत के इतिहास में थोड़ा पीछे लौट कर देखें तो हम पाएंगे कि जिस चम्बल के बीहड़ों में जाने का रास्ता नहीं मिलता था, वहां के बागियों को आगे लाने में गांधीवाद ही सफल रहा था। चीन ने अपनी ताकत दादागिरी से नहीं बढ़ाई। परमाणु हमले का शिकार हुआ जापान राख के ढेर में से उठ खड़ा हुआ। पर हमें यह सब दिखाई नहीं देता। हमें उपभोक्तावादी पश्चिम दिखाई देता है जहां मुंहासे और बरहट का इलाज भी शल्यक्रिया या प्लास्टिक सर्जरी है। अमरीका ने हिंसा को बढ़ावा दिया और आज खुद बारूद के ढेर पर बैठा चेतावनियां जारी कर रहा है। पाकिस्तान ने भारत को परेशान करने के लिए युद्ध, आतंक और हथियारों की होड़ शुरू की जिसमें अमरीका का ही लाभ हुआ। ये डरे हुए पहलवान अब केवल चेतावनियां जारी कर रहे हैं। नई चेतावनी भारत के लिए हैं। आतंकी अब स्कूलों को निशाना बना सकते हैं। यदि एक भी ऐसा हमला हुआ तो क्या होगा इसका खाका खींचने की जरूरत नहीं है। असहाय सरकार ने स्कूलों की सुरक्षा बढ़ाए जाने के निर्देश जारी कर दिए। यह निर्देश कितना नपुंसक है, कहने की भी आवश्यकता नहीं। आप आतंकियों को ठेलते जाइए, वे आपके मर्म स्थलों पर वार करेंगे। क्या अब भी यह कहने की जरूरत है कि आतंक के खिलाफ रणनीति बनाना रक्षा विशेषज्ञों का काम नहीं है।
Tuesday, May 18, 2010
आने को है बूंदों की बारात
दक्षिण-पश्चिम मानसून का चार महीने तक चलने वाला मानसून मेला बस शुरू ही होने वाला है। मौसम विभाग के अनुसार अंडमान के समुद्र में मानसून की मौसम प्रणाली को सक्रिय करने वाली अनुकूल परिस्थितियां बननी शुरू हो गई हैं। मौसम विभाग की भविष्यवाणी बीते साल सूखे की मार झेल चुके देश के साढ़े 23 करोड़ किसानों के लिए बड़ी राहत देने वाली है। देश की खरबों डॉलर की अर्थव्यवस्था कृषि पर टिकी हुई है और खेती की तमाम गतिविधियों का आधार चार महीने का यह मानसून सत्र होता है। अच्छी मानसूनी बारिश से धान, गन्ना, सोयाबीन और मक्का की बुआई समय पर हो सकेगी और फसल भी अच्छा होने का अनुमान है। सभी समाचार पत्रों में प्रमुखता के साथ छपी यह खबर वैचारिक प्रदूषण की पराकाष्ठा है। क्या बारिश के साथ केवल किसानों की खुशियां जुड़ी हुई हैं। कदापि नहीं। बारिश हर उस प्राणी के लिए राहत और खुशियों की सौगात लेकर आती है जो जीवित है। पेड़ पौधे, जानवर, कीट पतंगे, इंसान सभी के लिए। फिर यह वर्गीकरण क्यों कि मौसम विभाग की घोषणा से किसानों के चेहरे खिल उठे हैं? तो क्या शहरों में रहने वालों की चेहरे इस खबर से मुरझा गए हैं? लोग पीने के पानी के लिए तड़प रहे हैं। क्या बारिश उनके लिए खुशखबरी नहीं लेकर आ रही? क्या वर्षा का संबंध केवल कृषि से है। दरअसर आंकड़ों की बात करते-करते, संवेदनाशून्य शब्दों से खेलते खेलते हम कब वैचारिक शून्यता के कगार पर पहुंच गए हैं, हमें पता ही नहीं लगा। इसके अलावा इसकी और क्या वजह हो सकती है कि मानसून को केवल किसानों और फसलों से जोड़ कर देखा जाए। अफसोस इस बात का है कि ऐसा हुआ, अकसर होता है और हमें यह अखरता तक नहीं है। वैचारिक प्रदूषण का यह जाल एक दिन में नहीं फैला है। उपभोक्तावादी सोच दिमाग का किस हद तक कचरा कर सकती है, यह इसा जीता जागता उदाहरण है। बहू की बात करते समय हम भूल जाते हैं कि वह बेटी भी है और सास भी होगी। बेटों की बात करते समय भूल जाते हैं कि वह भी कभी दामाद और बाप होगा। उपभोक्तावादी सोच समाज को आयुवर्ग, आय वर्ग, आदि में बांटती है। हर इकाई को अलग-अलग मानकर चलती है। यहां हमें किसानों की याद केवल इसलिए आई कि उनके लिए बारिश का मतलब उनकी कारोबारी सक्रियता से है जिसके साथ एक बड़ा बाजार जुड़ा हुआ है। उनके पीछे मार्केटिंग का क्रिएटिव नेटवर्क जुड़ा हुआ है। वह बारिश को बूंदों की बारात कहने का ‘पंच लाइन’ तो गढ़ सकता है किन्तु बारिश और प्रेम का संबंध नहीं जोड़ पाता। उसे इस बात के पैसे जो नहीं मिले हैं।
रणनीति या बर्बर बलप्रयोग
नक्सलियों ने एक और बड़ा हमला कर दिया। इस बार उन्होंने एक यात्री बस को सिर्फ इसलिए निशाना बनाया क्योंकि उसने एसपीओ और पुलिस वालों को बैठाया था। इससे पहले भी नक्सलियों ने यात्री बसों और टैक्सियों को निशाना बनाया है किन्तु यात्रियों समेत बस को विस्फोट से उड़ाने की यह पहली घटना है। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह, राज्य के गृहमंत्री ननकीराम कंवर और केन्द्रीय गृहमंत्री पी चिदम्बरम कम से कम इस मायने में सच बोल रहे हैं कि नक्सली दबाव में हैं। निश्चित तौर पर वे दबाव में हैं और चूंकि उनपर आम आदमी या खास आदमी किसी की भी सुरक्षा की जिम्मेदारी नहीं है, इसलिए जब बात मरने-मारने की होगी तो निश्चित तौर पर वे बेहतर स्थिति में होंगे। दरअसल हमने नक्सलियों के खिलाफ कोई रणनीति बनाने की बजाय उनपर बर्बर बलप्रयोग को तरजीह दी है। आंदोलनरत श्रमिकों, छात्र-छात्राओं या किसानों के खिलाफ बल प्रयोग करना एक बात है और हथियार बंद छिपे हुए दुर्दांत लड़ाकों से निपटना कुछ और। हम बलप्रयोग सिर्फ जंगलों में कर सकते हैं जबकि वे कहीं भी, किसी पर भी हमला करने के लिए स्वतंत्र हैं। अगर अब तक ऐसा नहीं हुआ है तो इसके लिए हमें ईश्वर को धन्यवाद देना चाहिए। साफ है कि हमने कभी भी कथित नक्सलियों/माओवादियों के खिलाफ कोई रणनीति बनाई ही नहीं। हम नक्सलियों की रणनीति का मुंहतोड़ जवाब देने की कोशिश मात्र कर रहे हैं और हर बार मुंह की खा रहे हैं। हमारी बौखलाहट इससे साफ जाहिर होती है कि 16 मई को जब नक्सलियों ने कुछ ग्रामीणों की हत्या कर दी तो आईजी को यह कहना पड़ा कि मारे गए लोग आम आदमी नहीं, पुराने नक्सली थे। दूसरे ही दिन 17 मई को जब नक्सलियों ने बारूदी सुरंग में विस्फोट कर यात्री बस को उड़ा दिया तो तत्काल केन्द्रीय गृह मंत्रालय स्पष्टीकरण देता है कि मारे गए लोगों में सीआरपीएफ के जवान नहीं थे। ये दोनों ही टिप्पणियां गैरजरूरी थीं। पहली टिप्पणी जहां यह संकेत देती है कि नक्सलियों का साथ छोड़कर मुख्यधारा में लौटने वाले आदिवासियों की सुरक्षा को लेकर हम कुछ खास चिंतित नहीं हैं वहीं दूसरी टिप्पणी सीआरपीएफ को दिलासा देने के लिए की गई लगती है। न चाहते हुए भी शासन ने साफ कर दिया है कि आदिवासी चाहे नक्सलियों की तरफ से लड़ें, चाहे हमारे लिए मुखबिरी करें या फिर एसपीओ के रूप में हथियार लेकर सुरक्षा बलों की अगुवाई करें, हमें उनकी हिफाजत की परवाह नहीं है। शायद हम आदिवासियों को किसी गिनती में ही नहीं लाते। यही वह रणनीतिक चूक है जो नक्सलियों को मजबूत कर रही है। मानवाधिकारवादियों को चिंतित कर रही है। सेनापतियों की टिप्पणी में हताशा के स्वर सुनाई पड़ने लगे हैं। इससे पहले कि बात और बिगड़े, हमें नक्सलियों के खिलाफ रणनीति पर दोबारा विचार करना ही होगा।
रेलवे पर दर्ज हो कत्ल का जुर्म
हादसे कभी भी कहीं भी हो सकते हैं। हादसों की समीक्षा कर उसके कारकों को रोकना ही व्यवस्था का काम है। किन्तु यह क्या बात हुई कि रेलवे आज भी उन कारणों को दूर नहीं कर पाया है जिसकी वजह से न केवल स्टेशनों पर भगदड़ मचती है बल्कि लोगों की जानें जाती रहती हैं। पहली बार हादसा सिर्फ हादसा होता है। दूसरी बार यदि वही हादसा फिर हो तो वह लापरवाही होती है। और यदि वही हादसा बार-बार होता रहे तो मामला आपराधिक लापरवाही का बन जाता है। यदि इस लापरवाही से लोगों की जान जाती है तो कारकों की तरफ से उदासीन प्रशासन पर हत्या का मुकदमा चलाया जाना चाहिए। नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर रविवार को अंतिम क्षणों में बिहार संपर्क क्रांति एवं विक्रमशिला एक्सप्रेस का प्लेटफार्म बदल दिया गया। जनरल बोगी के लिए नियत स्थान के पास अपने बाल बच्चों के साथ घंटों पहले से इंतजार कर रहे लोगों में भगदड़ मच गई। पागलों की तरह अपना मोटरा लेकर भागते लोगों के पैरों तले कुचल कर एक महिला और एक बच्चे की मौत हो गई। दर्जनों लोग घायल हो गए। ऐसा कोई पहली बार नहीं हुआ है। तीन साल पहले 3 अक्टूबर 2007 को देश के सबसे बड़े जंक्शन मुगलसराय में भी इसी तरह की एक भगदड़ मची थी जिसमें 15 महिलाओं की मौत हो गई थी। तब भी रेलवे ने अंतिम समय पर ट्रेनों का प्लेटफार्म बदल दिया था। जैसा कि रेल दुर्घटनाओं के मामलों में होता है, मुआवजे और जांच की तत्काल घोषणा कर दी गई। न तो इस जांच से किसी का कुछ बिगड़ना है और न ही मुआवजे की रकम जिम्मेदार अधिकारियों की तनख्वाह में से काटी जानी है। फिर उन्हें किस बात की चिंता। वैसे भी रेलवे आज तक औपनिवेशिक मानसिकता से उबर नहीं पाया है। रेलवे के उच्चाधिकारी शाही सलून में यात्रा करते हैं। सरकारी अफसर और कर्मचारी एयरकंडीशन्ड क्लास में सफर करते हैं। देश की 80 फीसदी से अधिक जनता के लिए किसी भी ट्रेन में एक दो बोगी से अधिक की जगह नहीं होती। यहां फट्टे की सीट पर बैठने के लिए हजारों लोगों के बीच धक्कामुक्की होती है। ये डब्बे ट्रेन के आगे लगेंगे या पीछे यह तक किसी को पता नहीं होता। ट्रेन आने के बाद ही इस क्लास के यात्री डब्बों के साथ-साथ भागना शुरू करते हैं। सी-आॅफ/रिसीव करने वाले, लगेज, रेलवे की ट्राली, पत्रिका-पुस्तकों के ठेले, स्नैक्स कार्ट आदि इनका रास्ता रोकते हैं। पांव तले का चिकना फर्श उन्हें तेज गति नहीं करने देता। पिछले और अगले डब्बों के बीच 20-22 डब्बों की पूरी ट्रेन होती है। रेलवे को ऐसे लोगों की कोई फिक्र नहीं। रेलवे प्लेटफार्मों की हालत आज भी सर्कस के पार्किंग जैसी है, जहां गाड़ियों के पहुंचने के बाद ही उसके लिए जगह तय की जाती है। क्या कोई इस बात का जवाब देगा कि करोड़ों रुपए खर्च कर विकसित किया जा रहा रूट रिले और सिग्नलिंग सिस्टम किस काम का है?
Sunday, May 16, 2010
पॉलीथीन के सहारे जिन्दगी
ग्रीष्म की एक दोपहरी। मजबूरी के मारे हम अपनी स्कूटर पर राजधानी की तरफ चले जा रहे थे। लू के थपेड़े हेलमेट को चीरकर सिर के आरपार निकल जाना चाहते थे। जहां-जहां शरीर कपड़ों से बाहर था, वहां की त्वचा झुलस रही थी। हमारी प्यासी आंखें किसी प्याऊ की तलाश में थी, पर नजर जहां तक जाती थी वहां तक केवल धूल भरे मैदान, सूखी झाड़ियां और उनके आसपास हवा में उड़ते पालीथीन के सिवा कुछ नहीं था। सड़क के किनारे, दुकानों के इर्द गिर्द, खाली प्लाटों में, हर जगह केवल पालीथीन के रंग-बिरंगे टुकड़े उड़ रहे थे। पालीथीन के खिलाफ चलाया गया हमारा अभियान इतना रंग जरूर लाया था कि जिस पानी का नाम लेकर लोगों को डराया जाता था वह पानी भी अब पालीथीन के पाऊच में बिकने लगा था। तभी नजर पालीथीन के कैरीबैग में कुछ शीशियां लेकर सड़क पार करने की कोशिश करती एक अधेड़ महिला पर पड़ी। फोरलेन कैरिज-वे ने यहां के रहवासियों का जीवन दूभर कर दिया था। अशक्त और वृद्धजनों के लिए सड़क पार करना किसी युद्ध से कम नहीं था। वह किसी तरह अपनी तरफ का सड़क पार कर डिवाइडर तक पहुंच चुकी थी। जैसे ही उसने डिवाइडर पर से दूसरी तरफ सड़क पर पैर रखना चाहा तेज हार्न की आवाज ने उसे डरा दिया। एक झटके से उसने अपने पांव वापस खींच लिए। झन्नाटे से एक मिनी बस उसके सामने से गुजर गई। एक पल की भी देर होती तो हादसा हो जाता। बहरहाल महिला तो बच गई किन्तु उसके हाथ का पालीथीन सड़क पर था। झटका लगने के कारण पालीथीन फट गया था और उसमें रखी दवाइयां और सिरप की शीशियां सड़क पर गिर कर फूट चुकी थीं। गोलियां बिखर गई थीं। इसी तरह कुछ दिन पहले पावर हाउस में एक वृद्धा को काली पालीथीन का नीचे से फटा हुआ पैकेट पकड़ कर ठगा सा खड़ा पाया था। पैकेट फाड़कर पके आम सड़क पर बिखर गए थे और उसकी आंखों के सामने मिनीडोर के पहियों ने उन्हें कुचलकर रख दिया था। पुराने पैंटों को सीलकर बनाये गये थैले न जाने कहां चले गये थे। अक्लमंद आदमी ने पालीथीन ईजाद कर ली। अब वह हर चीज इसी में खरीदता है। घर से बाजार के लिए निकलता है पर थैली नहीं रखता। पन्नी में आलू, पन्नी में ही प्याज, पन्नियों में भाजी, धनिया, मिर्च, फल सबकुछ खरीद लेता है। किराने की दुकान पर भी वह थैला लेकर नहीं जाता। दर्जन दो दर्जन पन्नियों के थैले समेट कर गाड़ी में आगे पीछे दाएं-बाएं लटका लेता है। कभी चीनी चींटी को चढ़ जाती है तो कभी गेहूं-चावल सड़क पर बिखर जाता है। जिस रफ्तार से पालीथीन का क्रेज बढ़ रहा है, किसी दिन मैटरनिटी होम से लोग अपने बच्चे भी पालीथीन के कैरीबैग में ही लेकर निकलेंगे।
यातायात का दबाव
राजधानी रायपुर में बस स्टैण्ड का विकेन्द्रीकरण हो रहा है। बहाना यह है कि इससे शहर पर बढ़ रहा यातायात का दबाव कम हो जाएगा। इससे लोगों को कुछ दिक्कतें भी होंगी किन्तु शासन का कहना है कि दिक्कतों को दूर कर लिया जाएगा। बिलासपुर की तरफ से आने वाली बसें अब रावांभाठा में रुक जाया करेंगी। धमतरी जाने की बसें डूमरतराई से मिलेंगी। महासमुंद और उड़ीसा जाने वाली बसें एग्रीकल्चर कालेज के पास ठहरेंगी। अलबत्ता भिलाई-दुर्ग, नागपुर से आने वाली बसें कहां रुकेंगी यह अभी स्पष्ट नहीं है। संभवत: ये बसें टाटीबंद में कहीं रुकेंगी। कहा गया है कि इन सभी बस स्टैण्डों के बीच सिटी बस की कनेक्टिविटी होगी तथा यात्रियों को परेशान होने नहीं दिया जाएगा। केन्द्रीयकृत बस स्टैण्ड में एक बस से उतर कर दूसरा पकड़ने के बीच 5 से 10 मिनट का फासला होता है। यह फासला बढ़कर आधे से एक घंटा हो जाएगा। क्या फर्क पड़ता है। हमारे देश में वक्त की वैसे भी कहां कोई कीमत है। अब आते हैं लाभ पर। राज्य को सिटी बस सर्विस के तहत सौ बसें और मिलने वाली हैं। फिलहाल सिटी बस घाटे में है। सिटी बस का लाभ बढ़ाया जाना जरूरी है। इसलिए उसके लिए काम निकाला गया है। बड़े लोग अपने बच्चों को एस्टाब्लिश करने के लिए अकसर ऐसा करते हैं। कभी यह कोटा और ठेका होता था अब बड़े बड़े व्यवसाय इसमें जुड़ गए हैं। दूसरा लाभ यह गिनाया गया है कि यातायात का दबाव कम होगा। छह पेग लगाने के बाद भी शराबी की कल्पना शक्ति इतनी ऊंची छलांग नहीं लगा पाती। शहर की सबसे बड़ी समस्या पार्किंग की है। सड़कों के किनारे खड़े वाहनो की वजह से सड़कें संकरी हो गई हैं। गाड़ियों की चौड़ाई बेवजह बढ़ रही है। कारों का हुजूम सड़कों पर उतर आया है। बाइकों की संख्या बेतहाशा बढ़ी है। इसमें से सभी लोग शौक से ऐसा कर रहे हों, जरूरी नहीं है। कुछ लोग मजबूरी में दस हजार की नौकरी में तीन हजार रुपए का पेट्रोल फंूक रहे हैं। रेलवे की रहमदिली ने हर दूसरी ट्रेन को सुपरफास्ट बना दिया है। मिनी बसों के रूट का कोई ठिकाना नहीं है। कभी वह पचपेड़ी नाका से होकर जाती है तो कभी संतोषी नगर से। मूड बना तो भाठागांव से घुसकर भी पुलिस लाइन पर निकल आती है। सिटी बसों का कोई टाइमटेबल नहीं है। उसे टिकट चेक करने वाला जहां चाहे 10-15 मिनट के लिए रोक सकता है। आटो वाला अपनी मर्जी का मालिक है। लिहाजा जिसे वक्त पर ड्यूटी पहुंचना होता है, वह मजबूरी में अपने वाहन का इस्तेमाल करता है। इसलिए बढ़ता जाता है यातायात पर दबाव। जब पब्लिक ट्रांसपोर्ट हाशिए पर हो तो लोग मजबूरी में भी गाड़ियां खरीदते हैं। और जब कुछ समय तक वे अपनी गाड़ी का उपयोग कर चुके होते हैं तो उन्हें मिनी बस, सिटी बस कष्ट देने लगती लगती हैं। जिसकी ड्यूटी रात 8 बजे या उसके बाद खत्म होती हो, यदि उसे लौटने का सार्वजनिक साधन न मिले तो दिन में काम पर आने के लिए भी वह निजी साधनों का उपयोग करने के लिए मजबूर हो जाता है। आप उसकी मजबूरी खत्म कर दीजिए, यातायात का दबाव अपने आप कम हो जाएगा।
जो दिखता है वह बिकता नहीं
यह जमाने का दस्तूर है कि आप जिस वस्तु का पसरा लगाओगे, दाम उसी का लगेगा। अमूमन ग्राहक उसी वस्तु को खरीदने के लिए दुकान पर आता है जिसे डिस्प्ले किया गया होता है। और फिर आप माल न बेचो तो पंगा तो होगा ही। अब किसी को क्या पता कि आपने डिस्प्ले विन्डो में ली-कूपर, लेविस, प्यूमा, रीबाक, कूटान्स के जीन्स टांग रखे हैं और भीतर हरेक माल 100 रुपए वाली जूतों की दुकान है। लड़की की शिकायत पर पुलिस मजनूं को उठा लाई। मजनूं फट पड़ा। रोते-गाते चीखते-चिल्लाते उसने अपनी करूण गाथा सुनाई। उसने बताया कि किस तरह पिछले तीन चार सालों से वह अपनी जेबखर्च का एक-एक पाई उसपर लुटाता आ रहा है। बर्थडे पर आई-पॉड, वैलेन्टाइन्स डे पर मोबाइल। हर महीने मोबाइल के रिचार्ज पर सैकड़ों रुपए। हफ्ते में दो-तीन दिन पिज्जा, बर्गर, आईसक्रीम पार्टी। आज वह उस दिन को कोस रहा है जब पहली बार नजरें चार हुई थीं। तब से अब तक अच्छा कुछ भी नहीं हुआ है। पाकेट मनी जोड़-जोड़ कर जो रकम इकट्ठी की थी कब की खत्म हो चुकी। दोस्तों का कर्जा चढ़ गया है। बाप की पाकेट मारी है। माँ के जेवर चुराए हैं। पहले दसवीं के नतीजे बिगड़े, ग्यारहवीं किसी तरह पास कर लिया पर बारहवीं में गाड़ी अटक गई। कोचिंग ज्वाइन करने के लिए घर से मोटी रकम मिली। वह भी लुटा दिए। जो कुछ डिस्प्ले पर था वह बिकाऊ नहीं था। अब प्यार का भूत उतर चुका है। सब चीजों से ध्यान हटाकर वह पढ़ना चाहता है किन्तु रात-बेरात फोन आ जाता है। हाट-टाक्स उसके कान गर्म कर देते हैं। शरीर में लहू दोगुनी रफ्तार से दौड़ने लगता है। वह बेचैन हो जाता है और पागलों जैसी हरकतें करने लगता है। एक दिन वह घर आई। पहले कम्प्यूटर को फारमेट मार दिया और फिर मोबाइल का मेमोरी कार्ड निकालकर अपने साथ ले गई। अब न वह मिलती है, न बोलती है। वह ठगा रह गया है। वह अपने बीते चार वर्षों का हिसाब चाहता है। अगर यह गुनाह है तो बेशक उसे फांसी पर चढ़ा दिया जाए। इस जिन्दगी में वैसे भी रखा क्या है? उसकी गिनती बेहतरीन स्टूडेंन्ट्स में होती थी। वह अच्छा स्पोर्ट्समैन था। माँ-बाप से लेकर टीचर्स तक सब गर्व से उसका नाम लेते थे। आज सब कुछ खत्म हो गया है। थानेदार को माजरा समझते देर नहीं लगी। उसे लड़के से पूरी सहानुभूति थी। ऋषि विश्वामित्र नहीं बच पाए थे, यह तो आदमजात था। उन्होंने लड़के की पीठ थपथपाई, पानी पिलाया और बोले, ‘भाई! कुछ चीजें फुटपाथ से भी खरीदा करो, दुनियादारी सीख जाओगे। ऊंचे शोरूम की हर चीज अपनी पहुंच में नहीं होती।’
Friday, May 14, 2010
इज्जत की खातिर
शराब से भी बुरी है थोथी इज्जत की लत, मरते तक पीछा नहीं छोड़ती। नेक काम के बदले इज्जत, मान सम्मान मिले तो इसमें कोई हर्ज नहीं है किन्तु यदि इज्जतदार बने रहने के लिए झूठ बोलना पड़े, चोरी करनी पड़े, औरों की मान मर्यादा को कुचलना पड़े, उधार लेनी पड़े, हत्या करनी पड़े तो ऐसी इज्जत दो टके की नहीं होती। बावजूद इसके ऐसे लोगों की संख्या ही समाज में अधिक है जो अपनी झूठी आन-बान और शान के फेर में अपना कल बिगाड़ चुके हैं, आज से खेल रहे हैं और भविष्य को पलीता लगा रहे हैं। नोएडा के आरुषि हत्याकाण्ड से एक शब्द उभरा आॅनर किलिंग। इसकी गोल-मोल परिभाषा है, परिवार के सम्मान की रक्षा के लिए बेटी, बहन की हत्या करना। इनका दोष अकसर इतना ही होता है कि उन्होंने प्यार करते समय स्टेटस का ख्याल नहीं रखा। पहले परिवार शर्म से डूब मरता है और फिर आरोपी बिना सुनवाई के कत्ल कर दिया जाता है। आश्चर्य, ऐसे मामलों में बेटों या भाइयों की हत्या नहीं की जाती। वे छुट्टा सांड की तरह होते हैं। उनके तो कुकर्मों पर भी शर्म नहीं आती, बल्कि उन्हें बचाने की कोशिश की जाती है। बहरहाल इन दिनों मीडिया आॅनर किलिंग के एलपी ट्रैक पर चल पड़ा है। चारों तरफ से आॅनर किलिंग की खबरें आ रही हैं। ऐसा नहीं है कि यह सब अचानक होने लगा है। होता तो यह शुरू से रहा है किन्तु मीडिया को इसके न्यूज वैल्यू का पता अब जाकर लगा है। इसी शृंखला की एक कड़ी है अतिथि सत्कार। पेट काटकर माँ पिछले कई महीनों से राजू के क्रिकेट किट के लिए पैसे जोड़ रही थी कि एकाएक बुआ लोग आ गए। पूरे पैसे अतिथि सत्कार पर खर्च हो गए। कम पड़ गया तो पड़ोसियों के यहां से उधार भी मांग लिया। कहां बचत के लिए हफ्ते में एक बार दाल बनती थी और यहां रोज चिकन चिल्ली, पनीर बटर मसाला की फरमाइश हो रही थी। कपड़े वाले के यहां भी दो-ढाई हजार की उधारी कर आए। इज्जत बचाने की खातिर इतना तो करना ही पड़ता है। वैसे इज्जत कमाना इन दिनों एक खेल की तरह हो गया है। कुछ लोगों ने पैसा इफरात कमा लिया है किन्तु लोग उन्हें नहीं जानते। वे चाहते हैं कि लोग उन्हें भी जानें। इसके लिए वे कुछ भी करने को तैयार हैं। वे अपना शाल, श्रीफल लेकर जाते हैं, मांगी गई राशि का चेक देते हैं और बदले में अपनी ही शॉल ओढ़कर, अपना ही नारियल पकड़कर मुख्यअतिथि के साथ फोटू खिंचवाते हैं। एक खूब रंगीन सा सम्मान पत्र पाते हैं। सर्टिफिकेट की कई कापियां निकाली जाती हैं और उन्हें घर की बैठक से लेकर दफ्तर की दीवारों पर चस्पा कर दिया जाता है। एक पैसे वाला इज्जत खरीद लाता है और दूसरा कंगला सम्मान समारोह का आयोजन कर अपनी दाल रोटी का इंतजाम कर लेता है।
Thursday, May 13, 2010
हम कौन जात के
बस में बैठे एक बुजुर्ग किसान ने एकाएक पूछा, भईया अपन कौन जात के? मैने सोचा कि शायद वह मेरी जाति पूछ रहा है। मैने कहा, हिन्दू! वह झल्लाया और दोबारा पूछा, हम कौन जात के? अब हम सिर खुजाने लगे। देख कर वह हंसा, फिर बोला। भईया जब हम लोग छोटे थे, तब हमारी जाति हिन्दू या मुसलमान होती थी। बाद में पता चला कि धत्, ये तो धर्म है। फिर स्कूल कालेज में जब जानवरों के बारे में पढ़ाया जाता था तो जाति, प्रजाति और उपजाति की एक अलग ही परिभाषा पढ़ी। इस लिहाज से यदि इंसान की जाति देखी जाए तो सभी एक जात के हैं। किन्तु आज सुबह का अखबार देखा तो फिर से कन्फ्यूज हो गए। मेगास्टार अमिताभ बच्चन ने कहा है कि उनके घर में जाति प्रथा नहीं चलती। उनकी माँ तेजी बच्चन सिख थीं, उनकी पत्नी बंगाली हैं, उनके भाई की पत्नी सिंधी हैं, उनके दामाद पंजाबी हैं और बहू ऐश्वर्या मंगलौरी। लगा राज्य बदलने के साथ ही अब जाति बदल जाती है। सन् 2000 में तीन नए राज्य बने तो तीन नई जातियां भी बन गर्इं। अब समझ में आ रहा है कि जब बिहारी-बंगाली से शादी करता है तो उसे इंटरकास्ट क्यों कहते हैं? किसी भी संस्थान में काम के आधार पर डेज़ीनेशन होता है। वेल्डर, फिटर, टेक्नीशियन, मैसन आदि। इसी तरह भारतीय समाज में मिट्टी का काम करने वाला कुम्हार, बाल काटने वाला नाऊ, लकड़ी का काम करने वाला बढ़ई, पीतल ताम्बे का काम करने वाला ताम्रकार, सोने का काम करने वाला स्वर्णकार, चमड़े का काम करने वाला चर्मकार, पूजा पाठ शिक्षादान करने वाला ब्राह्मण, युद्ध करने वाला क्षत्रिय होता था। उपनाम बताते ही स्पष्ट हो जाता था कि व्यक्ति किस कार्य का विशेषज्ञ है। ज्यादा पूछताछ की जरूरत नहीं पड़ती थी। एक शानदार सामाजिक व्यवस्था थी जो दुश्प्रचार का शिकार हो गई। तब से लेकर आज तक हम हर किसी से पूछ रहे हैं, ‘कौन जाति के हो।’ पूछने वाले का भी कोई खास उद्देश्य नहीं होता। बताने वाला भी आदमी देखकर बात करता है। सरकार पूछे तो अनुसूचित जाति, अनजान पूछे तो ठाकुर। जाति को लेकर यह कन्फ्यूज़न शादी विवाह तक जारी रहता है। बंगाली कायस्थ और बिहारी कायस्थ के बीच शादी होती है और कहलाते वे इंटरकास्ट हैं। यहां बंगाली और बिहारी दो जातियां हो गर्इं। सामने ठाकरे की ठकुराई हो तो महाराष्ट्र में बैठा गंगा किनारे का छोरा खुद को मराठी बताता है। बैठे ठाले जाति बदल जाती है। कुछ लोग शादी के समय गोत्र बदल लेते हैं। यदि न बदलें तो अच्छा लड़का या लड़की के हाथ से निकल जाने का खतरा होता है। अब तो समझ में आ गई होगी जाति? अब भी नहीं आई तो आपका कुछ नहीं हो सकता? अब जो जनगणना वाले तय कर देंगे वही आपकी जाति होगी।
Wednesday, May 12, 2010
स्टोरी बाज पुलिस
घटना स्थल का मुआयना और परिस्थितिजन्य साक्ष्य के आधार पर गढ़ी गई कहानियों से ही अकसर आपराधिक मामलों की गुत्थी सुलझाई जाती है। इसी कहानी के आधार पर सुराग तलाशे जाते हैं और जांच की दिशा तय की जाती है। कम से कम जासूसी उपन्यास पढ़ने का अपना टोटल एक्सपीरियन्स तो यही कहता है, फिर चाहे वह उपन्यास अंग्रेजी का हो या हिन्दी का। जासूस लिफाफा देखकर मजमून भांप लेते हैं, उड़ती चिड़िया के पर गिन लेते हैं। वे बला की नजर रखते हैं। फर्श और बिस्तर पर पड़ी ऐसी अनगिनत चीजें उन्हें दिख जाते हैं जिन्हें पुलिस नजर अंदाज करके जा चुकी होती है। कहते हैं क्राइम का ताना-बाना दिमाग में होता है। ऐसे लोगों को क्रिमिनल माइंडेड कहते हैं। ऐसे लोग ऊमदा जासूस हो सकते हैं। अच्छे क्राइम रिपोर्टर बन सकते हैं। जब वे इन दोनों में से कुछ भी नहीं बनते तो क्रिमिनल बन जाते हैं। इनके और पुलिस बीच तू डाल-डाल मैं पात-पात का खेल चलता रहता है। पर पुलिस को और भी काम होते हैं। उनका बस चले तो वे इस खेल से ही किनारा कर लें। पर मजबूरी है। उन्हें तनख्वाह इसी बात की मिलती है। इसलिए अकसर वे उन्हीं मामलों की तफ्तीश करते हैं जिनके लिए दबाव होता है। दबाव अकसर बड़े लोगों का होता है जो पुलिस को यह भी बता देते हैं कि फंसाना किसको है। और फिर पुलिस चुटकियों में केस हल कर देती है। शानदार कहानी गढ़ लाती है। आरोपी को गिरफ्तार भी कर लेती है। आरोपी जुर्म कबूल भी कर लेता है और फिर अगर वकील तगड़ा मिल गया तो बाकी जिन्दगी विचाराधीन कैदी बना रहता है। नोएडा के आरुषि हत्याकांड का उसने ऐसा पुलंदा बांधा कि सीबीआई भी नहीं खोल पा रही। नोएडा के ही पंधेर कोठी मामले में भी कुछ ऐसी ही हुआ। झारखंड के कोडरमा में एक पत्रकार की लाश की कुछ ऐसी पड़ताल हुई कि मामला दाखिल दफ्तर होने के कगार पर है। मुजफ्फरपुर में तो हद ही हो गई। कथित आॅनर किलिंग के मामले में यहां लाश की शिनाख्त हो गई, हत्यारा पकड़ा गया, उसके बयान दर्ज हो गए और फिर लाश अपनी प्रेमिका का हाथ पकड़कर जीवित लौट आया। वैसे मीडिया भी कुछ कम नहीं। छत्तीसगढ़ के नक्सलप्रभावित कांकेर जिले से खबर आई कि नक्सलियों ने कोयलीबेड़ा के एक गांव के दर्जनों लोगों को मार कर जला दिया है। प्राय: सभी अखबारों में यह खबर सुर्खियां बनीं किन्तु बाद में पता लगा कि वहां कुछ हुआ ही नहीं है। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि क्राइम डिटेक्शन की हमारी पूरी ट्रेनिंग सत्यकथा, मनोहर कहानियां, कर्नल रंजीत, सुरेन्द्र मोहन पाठक के स्कूलों में होती है। फिलहाल छत्तीसगढ़ की राजधानी पुलिस एक अजीब मामले को लेकर फंसी है। एक अज्ञात 18-20 साल की युवती के साथ सामूहिक बलात्कार होता है। युवती की मौत हो जाती है। आरोपी पकड़े जाते हैं, जुर्म कबूल करते हैं। पुलिस मामले को पुख्ता करने डीएनए टेस्ट की बात करती है और ऐन वक्त पर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आ जाता है कि किसी का जबरिया डीएनए टेस्ट नहीं कराया जा सकता। लिहाजा ‘खा गीता की कसम, फिर चाहे जो मुंह में आए बोल’ वाली कहावत चरितार्थ होने दे।
सीमाओं पर किन्नर
महाभारत के युद्ध में अर्जुन और भीष्मपितामह आमने सामने थे। भीष्मपितामह अजेय थे। महापराक्रमी थे। अर्जुन के लिए बिना छल, बल, कौशल के उनसे जीतना असंभव था। ऐसे समय में श्रीकृष्ण को शिखण्डी की याद आई। शिखण्डी पूर्व जन्म में अम्बा थी। अम्बा वही राजकुमारी थी जिसके प्रणय निवेदन को भीष्म ने यह कहकर ठुकरा दिया था कि वे आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करने को विवश हैं। अम्बा ने तपस्या कर अपने प्राण त्याग दिए थे तथा दूसरे जन्म में उसने राजा द्रुपद के घर जन्म लिया। उसे किन्नर का तन मिला था किन्तु उसे पुरुषों की तरह पाला गया। वह विकट योद्धा बना। श्रीकृष्ण को पता था कि भीष्म शिखण्डी को अम्बा के रूप में पहचान जाएंगे तथा अपने हथियार नीचे कर लेंगे, क्योंकि एक ब्रह्मचारी स्त्री पर हमला नहीं करेगा। युद्ध में ऐसा ही हुआ और अर्जुन ने शिखण्डी की आड़ लेकर भीष्म पर तीरों की वर्षा कर दी। संभवत: इसी से प्रेरित होकर अरुणाचलप्रदेश के गृहमंत्री टाको डाबी ने देश की सीमाओं की रखवाली के लिए किन्नरों की रेजीमेंट बनाने का सुझाव दिया है। डाबी ने कहा कि मेरे ख्याल से अगर किन्नरों को पुलिस या अर्धसैनिक बलों में नियुक्त किया जाए तो वे राष्ट्र की बेहतर सेवा करेंगे। डाबी इस बारे में पहले ही केंद्रीय गृहमंत्री चिदंबरम को पत्र भेज चुके हैं। उन्होंने लिखा है कि यह समुदाय अंतरराष्ट्रीय सीमाओं पर अपना कर्तव्य प्रभावी तरीके से निभा पाएगा। देश में करीब 10 लाख किन्नर हैं। किन्तु समझ में यह नहीं आया कि वे दुश्मनों से भीष्म की तरह के आचरण की अपेक्षा किस बिना पर कर रहे हैं। हमारे दुश्मनों में ऐसा कौन है जो स्त्री या पूर्व प्रेमिका को देखकर शस्त्र झुका लेगा? या शायद वे यह सोच रहे हैं कि किन्नरों के चूंकि बाल बच्चे नहीं होते, रिश्तेदारों से सम्पर्क टूट चुका होता है, इसलिए उनमें धन संपत्ति के प्रति आग्रह कम होगा। ऐसे लोगों को खरीदना आसान नहीं होगा। न तो उन्हें रुपयों का लालच दिया जा सकेगा और न ही उन्हें प्रेम जाल में फांसा जा सकेगा। आइडिया बुरा नहीं है। ट्राइ करने में हर्ज भी क्या है? वैसे केवल सेना ही क्यों यदि सांसद और विधायक बनने के लिए भी किन्नर होना अनिवार्य कर दिया जाए तो क्या बुरा है? और फिर अगर आईएएस और आईपीएस भी किन्नर ही हों तो देश का वास्तव में भला हो जाएगा। वैसे किन्नर इस चूहा बिल्ली के खेल में शामिल होने की हामी भरेंगे इसमें पर्याप्त संदेह है।
Monday, May 10, 2010
फ्रस्ट्रेशन डॉट कॉम
हाईस्कूल में पेंढारकर सर हमें फिजिक्स पढ़ाया करते थे। भौतिकी की कक्षा में हम भूतप्रेतों की चर्चा नहीं करते थे किन्तु हाँ! समाजशास्त्र और मनोविज्ञान से जुड़ी कुछ चर्चाएं अकसर हो जाया करती थीं। वे जो कुछ कहते, हम उसपर पूरी श्रद्धा के साथ यकीन करते थे। उन दिनों सीनियर सेकण्डरी स्कूल में नया-नया आॅडिटेरियम बना था। बड़ी-बड़ी शीशे लगी खिड़कियां थीं। शैतान बच्चे इन शीशों पर निशाना साधते थे और प्रत्येक सुबह कांच के कुछ टुकड़े हॉल की भीतर बाहर बिखरे मिलते थे। कुछ बच्चे क्लासरूम में तोड़फोड़ मचाते थे। ब्रूसली स्टाइल में किक मारकर स्विचबोर्ड तोड़ना, पंखे के ब्लेड्स को मोड़ देना ऐसे छात्रों का खास शौक होता था। इसी पर टिप्पणी करते हुए एक दिन पेंढारकर सर ने कहा था कि अमरीका में टेंशन रिलीविंग सेन्टर होते हैं। वहां एक बड़े से कमरे में कांच के सामान रखे होते हैं। कुछ डॉलर देकर आप एक डंडा लेकर वहां जा सकते हैं। अपने अंदर का सारा गुस्सा, सारी फ्रस्ट्रेशन कांच के बर्तनों पर उतार सकते हैं। यहां से निकलने के बाद आप एकदम तरोताजा महसूस करते हैं। हमें नहीं पता कि अमरीका में ऐसा कोई सेंटर है या नहीं किन्तु हम इतना जरूर जानते हैं कि आक्रोश, हताशा और अव्यक्त शरारतों को यदि सिस्टम से बाहर नहीं निकाला गया तो यह घातक हो सकते हैं। मुम्बई में आधी रात को फुटपाथ पर सोए लोगों पर गाड़ी चढ़ा देना, नई दिल्ली-नोएडा रोड पर युवाओं का अंधाधुंध रफ्तार से बाइक दौड़ाना, भिलाई-दुर्ग के नामचीन स्कूलों के छात्रों द्वारा अलसुबह उठकर गाड़ियों के शीशे फोड़ना। यह भी एक तरह का फ्रस्ट्रेशन आउटब्रेक है। एक काम्पीटिशन है कि कौन कितने शीशे तोड़ता है। समय के साथ काम्पीटिशन बदले हैं। कभी केटी-गुलेल का जमाना था। तालाब के पानी पर मटके के टुकड़ों को भी उछाला जाता था। पत्थर मारकर आम तोड़े जाते थे। सू-सू करने का भी काम्पीटिशन होता था। रेपुटेड स्कूल के बच्चों के पास अब खेलने को वक्त नहीं रहा। सुबह से रात तक वे स्कूल, ट्यूशन, कोचिंग, क्लास में बिजी होते हैं। खेलकूद की भी क्लास लगती है। वहां मजा नहीं है। परफारमेन्स का टेंशन है। ऐसे में यह भी फ्रस्ट्रेशन देता है जो कभी भी, कहीं भी निकल सकता है। वक्त की डिमाण्ड है कि एक पल को हम प्रतिस्पर्धा से बाहर आकर खड़े हों और जीवन को, अपनी उम्र को भरपूर जिएं। पुलिस, डण्डा और कानून से कभी दुनिया नहीं बदल सकती। बदलाव तो समाज को खुद ही लाना होता है।
Saturday, May 8, 2010
एक दिन की माँ
इतिहास में एक दिन का राजा हुआ है। बॉलीवुड एक दिन का मुख्यमंत्री पेश कर चुका है। जमाना एक दिन की माँ तैयार कर रहा है। कभी माँ जीवन-भर या यूँ कहें कि जन्म जन्मांतर का रिश्ता होती थी। अकेली माँ ही क्यों, हर वह औरत माँ होती थी जो लगभग माँ की उम्र की हो। रिश्तेदारियों में भी बड़ी माँ, दादी माँ, नानी माँएं होती थीं। वैसे अधिकांश परिवारों में आज भी यह स्थिति बरकरार है किन्तु जमाना तेजी से बदल रहा है। अब माँ और बाप में कोई फर्क नहीं रह गया है। दोनों ही घर से गायब रहते हैं। बाप जहां मजबूरी में बाल-बच्चों को छोड़कर कमाने जाता था वहीं अब माँ अपने आप को साबित करने के लिए काम पर जाती है। करियर बनाने के लिए वह शादी को टाल देती है। विवाह का आनंद लेने के लिए प्रेग्नेन्सी को टाल देती है। माँ अपने पति की माँ को बर्दाश्त नहीं कर पाती। इसलिए अब हम अकेले रहते हैं। माँ के पास वक्त नहीं होता इसलिए हम धाई माँ के पास रहते हैं। सबके पास अपनी अलग धाई माँ नहीं होती। ऐसे बच्चे क्रेश में कॉमन धाई माँ के पास पलते हैं। माँ नहीं रही तो क्या हुआ, माँ शब्द तो है। इस शब्द की अपनी एक गरिमा है। कभी माँ का नाम लेकर कहा गया एक अपशब्द खून-खराबे का कारण बन जाता था। अब यह आम लोगों का तकियाकलाम हो गया है। पश्चिमी सोच ने हमें उपभोक्तावादी बना दिया है जहां पैसे कभी पूरे नहीं पड़ते। हर पल एक नई चीज लाँच होती है। खरीदने को पैसे चाहिए। इसलिए आदमी जिन्दगी का दामन छोड़ पैसे कमाने की अंधी होड़ में शामिल हो गया है। हर रिश्ता ढीला पड़ गया है। बाप भी अफसर, माँ भी अफसर सो उसने टीवी से नाता जोड़ लिया है। टॉम एण्ड जेरी, शिजूका, नोबिता, कितरेटसू, डोरेमॉन ही उसके रिश्तेदार हैं। ऐसे में वह कहीं माँ को पूरी तरह न भूल जाए इसलिए मदर्स डे मनाया जाता है। साल में एक दिन की माँ के लिए कार्ड खरीदे जाते हैं, गिफ्ट लिये जाते हैं, दूर रहने वाले बच्चे क्रिएटिव एसएमएस भेजते हैं। अनाथ बच्चों के नाम पर कुछ लोग आँसू बहा आते हैं। वे भूल जाते हैं कि बहुत सारे बच्चे माँ-बाप के जीवित रहते भी अनाथों की जिन्दगी जी रहे हैं। ऐसे बच्चों की संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है। अकसर ऐसे बच्चों के पिता गाते हैं...
घर से निकलते ही,
कुछ दूर चलते ही,
रस्ते में है माँ का घर,
कल सुबह देखा तो,
पांव दबाती वो,
देहरी पे आई नजर...
घर से निकलते ही,
कुछ दूर चलते ही,
रस्ते में है माँ का घर,
कल सुबह देखा तो,
पांव दबाती वो,
देहरी पे आई नजर...
सांप और नेवला
प्रतिक्रिया एक स्वाभाविक प्रक्रिया है जिससे व्यक्ति अपनी पसंद या नापसंद जाहिर करता है। पूरी बात सुनने के बाद, वस्तुस्थिति को समझने के बाद यदि ठंडे दिमाग से, शांत चित्त से प्रतिक्रिया की जाए तो न केवल लड़ाई-झगड़े टल सकते हैं बल्कि समस्याओं का समाधान भी निकल कर आ सकता है। बचपन में ‘सांप और नेवला’ की कहानी पढ़ी थी। सोते दुधमुंहे बच्चे को पालतू नेवले की निगरानी में छोड़कर महिला अपने काम से बाहर गई थी। जब वह लौटी तो उसने नेवले को घर से बाहर घूमते पाया। नेवले के मुंह पर खून लगा हुआ था। महिला को लगा कि नेवला बच्चे को मारकर खा गया है। उसने आव देखा न ताव नेवले को कुचल कर मार दिया। जब वह घर में घुसी तो पता चला कि बच्चा सकुशल सो रहा है। उसके सिरहाने पर एक सांप कई टुकड़ों में मरा पड़ा है। उसे माजरा समझते देर नहीं लगी किन्तु तब तक बहुत देर हो चुकी थी। कुछ-कुछ ऐसा ही हाल केन्द्रीय गृहमंत्री का हो रहा है। दंतेवाड़ा के ताड़मेटला में नक्सली वारदात क्या हुई 24 घंटे के भीतर देश के कोने-कोने से प्रतिक्रियाएं आ गर्इं। जिन्होंने कभी बस्तर नहीं देखा था, जिन्हें यह तक नहीं पता कि नक्सलियों के सिर पर सींग नहीं होते, उन्होंने भी टिप्पणियां की। जैसे जैसे दिन बीतते गए, प्रतिक्रियाओं में संशोधन होता गया। अब जाकर घटना के पूरे एक महीने बाद गृहमंत्री ने स्वीकार किया है कि ताड़मेटला की घटना के लिए जितने जिम्मेदार नक्सली थे, लगभग उतने ही जिम्मेदार वे अधिकारी भी थे जिन्होंने अविवेकपूर्ण निर्णय लेकर उस टुकड़ी को वहां भेजने की रणनीति बनाई थी। यह बात अगर किसी और ने कही होती तो निस्संदेह उसे नक्सली समर्थक बताकर कटघरे में खड़ा कर दिया जाता। इस एक महीने में देश के बुद्धिजीवियों की शामत आ गई है। बल्कि सरकार उनकी टिप्पणियों से इतना परेशान हो गई है कि अब उनका मुंह पकड़ने जैसा असाध्य काम करने की कोशिश कर रही है। नये फरमान के अनुसार नक्सल समर्थक बुद्धिजीवियों को दस साल की जेल हो सकती है। किन्तु जब किसी की पूरी बात सुनी ही नहीं जाएगी तो यह तय कैसे होगा कि व्यक्ति नक्सलियों का समर्थन कर रहा है या अविवेकपूर्ण दुस्साहस की आलोचना कर रहा है? ऐसा लग रहा है कि सरकार उत्तेजित हो गई है और हड़बड़ी में अनाप-शनाप निर्णय ले रही है। सरकार खुद व्यक्तियों का एक समूह है जिसमें सभी को अपना अपना मत रखने का अधिकार है। नगरीय निकायों से लेकर लोकसभा तक ये लोग आपस में मतभिन्नता के कारण लड़ते रहते हैं और गालियों से लेकर हाथापाई तक का होना आमबात है। किन्तु इसपर पाबंदी नहीं लगाई जा सकती। शायद इसीलिए गृहमंत्री जब जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रेक्षागार में विद्यार्थियों से चर्चा कर रहे थे तो उन्होंने खुलकर तथ्यों को स्वीकार किया। शायद इसीलिए उस छात्रा को भी उन्होंने अपने दफ्तर आने का न्यौता दिया जिसने सरकारी कदम की आलोचना की थी। उन्होंने खुलेदिल से कहा कि सबको अपनी बात रखने की इजाजत है। शर्त केवल यह है कि वह हिंसक न हो। जब एक छात्रा की बात सुनने के लिए गृहमंत्री तैयार हैं तो वे कौन लोग हैं जो सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश, हाईकोर्ट के जस्टिस और शिक्षाविदों की बातें सुनने से इंकार कर रहे हैं?
Thursday, May 6, 2010
बिजली, माई लव
मेरा पहला और अंतिम प्यार है बिजली। बिजली मेरी सबसे बड़ी जरूरत है। बिजली बिना, न दिन को चैन है न रात को आराम। बिजली नहीं तो नल में पानी नहीं। पानी नहीं तो लाखों का लैट्रिन बाथरूम बेकार। आलीशान महल भी कालकोठरी। बिजली नहीं तो नाश्ता नहीं। बिजली नहीं तो खाना नहीं। आम की चटनी हो या इडली दोसा, बिजली बिना कुछ भी नहीं। क्रिकेट खेलने के लिए बिजली चाहिए तो क्रिकेट देखने के लिए भी बिजली चाहिए। बिजली न हो तो बाल सुखाना भी हो जाए मुश्किल। दाढ़ी भी न बने। पानी गर्म करने के लिए बिजली तो पानी ठंडा करने को भी बिजली। अब तो मार्निंग वाक भी बिजली का मोहताज हो गया है। आलसी आदमी चुपचाप पड़ा रहे और इलेक्ट्रिक वाकर उसके पैरों को चलाता रहे। थुलथुल पेट को कम करने के लिए भी बिजली से चलने वाला बेल्ट गुदगुदी करे। भगवान का नाम लेने के लिए भी मुंह को कष्ट क्यों देवें, इलेक्ट्रिक गैजेट हैं ना। बिजली बनाने के लिए भी उन्हीं चीजों की जरूरत है जो इन्सान के जीवित रहने के लिए आवश्यक हैं। यानी जंगल और पानी। जंगलों को उजाड़े बिना कोयले की खदानें नहीं खुलतीं, पानी बिना ताप विद्युत परियोजनाएं काम नहीं करतीं। इसके विकल्प भी हैं। पन बिजली, सौर बिजली और पवन बिजली। भारत में न धूप की कमी है और न तेज बहती हवाओं की। किन्तु यह मुफ्त है इसलिए इसका कोई मोल नहीं। पन बिजली परियोजनाएं केवल बांधों पर लगाई जा सकती हैं लिहाजा उसकी अपनी सीमाएं हैं। इन्हीं अजुहातों को आगे रखकर केन्द्र ने परमाणु/नाभिकीय र्इंधन के लिए करार किए। कहां हैं ये परियोजनाएं? देशभर में पावर प्लांट के लिए अंधाधुंध करार हो रहे हैं। बिजली की कमी का खाका खींचकर इसके लिए जनसमर्थन जुटाया जा रहा है। ये सभी विद्युत परियोजनाएं ताप आधारित हैं। इन सभी का आधार पानी और कोयला है। छत्तीसगढ़ को पावर हब बनाने का सपना देखने वाले भी केवल आज में जी रहे हैं। उन्हें कल की परवाह नहीं। छत्तीसगढ़ की आबोहवा क्या से क्या हो गई, इसकी किसी को चिंता नहीं। पानी के लिए हाहाकार मच रहा है, भूजल लगातार नीचे जा रहा है, लोग पीने के पानी के लिए एक दूसरे का सिर फोड़ रहे हैं। एक सामान्य सी बात है कि जो चीज कम पड़ रही हो उसका विवेकपूर्ण इस्तेमाल होना चाहिए। बिजली की खपत कम करनी हो तो सबसे पहले नाइट क्रिकेट, एयरकंडीशनर, रेफ्रिजरेटर बैन कर दिए जाएं। बिजली से चलने वाले अनावश्यक गैजेट्स पर भी पाबंदी लगे। यह बैन तब तक जारी रहे जब तक कि परमाणु बिजली घर अस्तित्व में न आ जाएं। आज हमें चीन की प्रगति और तरक्की दिखती है किन्तु वह कुर्बानी नहीं दिखती जो चीन के लोगों ने दी। लंबे समय तक वहां के लोगों ने निजी वाहनों से परहेज किया। वजह केवल एक ही थी कि पेट्रोल आयात करना पड़ता था और सरकार उसपर खर्च नहीं करना चाहती थी। क्या हममे है इतना साहस?
सब्र की पाठशाला
कानून को अपने हाथों में लेना जुर्म है। कानून किसके हाथ में रहेगा और किसकी जेब में यह सब सरकार तय करती है। आम आदमी में इतना तो सब्र होना ही चाहिए कि वह कानून को अपना काम करने दे, फिर चाहे न्याय मिलते उसकी उम्र ही क्यों न बीत जाए। गाली देने का, बदतमीजी से पेश आने का अधिकार भी सरकार ने कुछ लोगों को दे रखा है, उनके अलावा और लोग इन अधिकारों का प्रयोग नहीं कर सकते। अलबत्ता जिन्हें जनता का समर्थन होता है, और जिन्हें जनता ने चुनकर विधानसभा में भेजा होता है, वे सरकार में रहें या सरकार से बाहर कुछ अधिकार उनके भी होते हैं। इसलिए जब न्यू बसंत टाकीज के पास लोगों को फोरलेन के डिवाइडर से परेशानी हुई तो स्थानीय विधायक ने न केवल मांगपत्र दिया बल्कि उसमें कार्यनिष्पादन के लिए समयसीमा भी निश्चित कर दी। समय सीमा में जब जिला प्रशासन काम नहीं करवा पाया तो उन्होंने अपने समर्थकों के साथ खुद जाकर यह काम कर दिया। फास्ट ट्रैक कोर्ट के जमाने में लेटलतीफी अब बर्दाश्त से बाहर हो चली है। यह तो हुई खास लोगों की बात जो भीड़ की शक्ल में जाकर कुछ भी कर सकते हैं। इससे पहले फोरलेन के कुम्हारी प्लाजा में भिलाई के ही एक अन्य विधायक ने वह हंगामा खड़ा किया कि डीएससी वाइकान के मैनेजर को स्ट्रीट लाइट का भूमिपूजन करने के लिए उन्हें ही आमंत्रित करना पड़ा। खूब जमी जब मिलकर बैठ गए दीवाने दो। इसके बाद वाइकान की मनमानी में वाइकिंग जितनी रफ्तार आ गई। उसने फोरलेन को ेएक तरह से दुपहिया वालों के लिए बैन ही कर दिया। टोल गेट पर एक तो जगह संकरी छोड़ी और उसपर उसमें व्यवधान डाल दिये। कुम्हारी टोल प्लाजा पर अब बीवी को बैठाकर बाइक या स्कूटर चलाना किसी स्टंट से कम नहीं। बाएं हिले तो प्यारी पत्नी के पांव के नाखून टूट जाते हैं, घुटने छिल जाते हैं और दाएं हिले तो डिवाइडर से टकराकर भर-भराकर गिर पड़ते हैं। लिहाजा बीवी पैदल टोल प्लाजा पार करती है और मियां झेंपते हुए अकेले गाड़ी निकालते हैं। इन तंग गलियों से जब बोरा लादे साइकिल सवार गुजरते हैं तो पल्सर, आर-15, सीबीजी वालों को भी ब्रेक लगाना पड़ जाता है। खैर बात सब्र की हो रही थी। बड़े लोग सब्र करें तो यह उनकी महानता होती है। गरीब के लिए तो सब्र ही जिन्दगी है। सवारी ढोने के बाद पैसों के लिए धूप में इंतजार करता रिक्शावाला, ट्रेन में खड़े-खड़े चक्रधरपुर से नागपुर तक सफर करने वाला आम आदमी सब्र के कारण ही जिंदा है। उसे कोई जादू की झप्पी देने वाला नहीं मिलता। जिस तरह विधायक और पूर्व विधायक ने कानून हाथ में लिया यदि हर कोई ऐसा करने लगे तो क्या हो...
Tuesday, May 4, 2010
एलियन्स हमारे आस-पास
एलियन बोले तो बाहरी। इंसानों के परिप्रेक्ष्य में दूसरी दुनिया के प्राणी। हाल ही में चोटी के विज्ञानियों ने एलियन्स की उपस्थिति को स्वीकार किया है। वे कहते हैं कि पृथ्वी से बाहर के सफर के दौरान हमारी एलियन्स से मुलाकात हो सकती है। दूसरे ग्रहों या उनके चांद पर एलियन्स हो सकते हैं। वहां भिन्न प्रकार का वातावरण है इसलिए वहां के प्राणी भी अलग-अलग तरह के होंगे। जहां तेजाब के बादल या झील हैं वहां का प्राणी कांच जैसे तत्वों से बना होगा जो संभव है पारदर्शी हो। इसी तरह जहां का वातावरण बेहद ठंडा है वहां के प्राणियों का विकास बेहद धीमा होगा। हो सकता है उनकी आयु दस हजार वर्ष या इससे भी अधिक हो। वैसे एलियन्स हमारे आस-पास भी मौजूद हो सकते हैं। कभी वे हमें दिखाई देते थे किन्तु हम समझ नहीं पाते थे। हम उन्हें भूत-प्रेत या पिशाच की संज्ञा दे देते थे। कभी-कभी शक होता है कि एलियन्स आज भी हमारे आस-पास हैं किन्तु अब उन्हें पहचानना मुश्किल है। पैर में जूता, हाथों में दस्ताना, चेहरा, माथा सबकुछ साफे में लिपटा, आंखों पर काला चश्मा। भीतर इंसान का बच्चा छिपा है या भूत-प्रेत, किसे पता। सुना है इनकी त्वचा छिले हुए उबले अंडे की तरह होती है। वैज्ञानिक की दृष्टि से देखें तो ये भी एलियन्स ही हैं जिन्हें पृथ्वी की आबोहवा सूट नहीं करती। धरती की धूल से उन्हें एलर्जी हो जाती है। धूल के महीन कण उनके फेफड़ों में कैंसर पैदा कर देते हैं। धूप, धूल और धुआं लगते ही उनकी त्वचा पर फफोले पड़ जाते हैं। ये ‘वाओ.. स्टुपिड.. ईडियट, शिट् जैसे मोनोसिलेबल्स में बातें करते हैं’। वैसे इनकी श्रवण-स्मृति बहुत अच्छी होती है। अंग्रेजी में 17 पाने वाली यह जमात हिन्दी गीतों के अंग्रेजी मुखड़ों को हूबहू दोहराने में सक्षम है, सही एक्सेन्ट के साथ। ये भोजन पर नहीं वरन् नाश्ते और कोल्ड ड्रिंक्स पर जिंदा रह सकते हैं। ये किसी भी कीमत पर अपना वजन नहीं बढ़ने देते, भले ही शरीर का खून सफेद हो जाए। दुपहिया गाड़ियों को ये जिस तरह सड़क पर उड़ाते हैं, वो इंसानों के बस का तो नहीं लगता। इनकी सबसे बड़ी क्षमता अलग-अलग तरह की आवाजों के शोर के बीच अपने मतलब की आवाज को सुन लेने की है। कोलाहल चाहे कितना भी क्यों न हो, ये अविचलित भाव से मोबाइल पर बतिया सकते हैं। चारों तरफ बजते कानफोड़ू गीत-संगीत के बीच इनका अपना मोबाइल एमपी-3 प्लेअर बजता रहता है और ये उसका आनंद भी ले रहे होते हैं। समझ में नहीं आता कि यह हमारी अगली पीढ़ी है या बदलती दुनिया की नई नस्ल जो खुद को आने वाले समय के लिए तैयार कर रही है। कम से कम भोजन, पानी न के बराबर, छोटी सीट की बाइक पर तीन की सवारी, रेगिस्तानों वाली पोशाक और बावरिया संगीत।
Sunday, May 2, 2010
दिग्विजय के सवाल
छत्तीसगढ़ में विपक्ष हनीमून पर है इसलिए हारकर कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह को ही कमान संभालनी पड़ी है। अपने लेख के लिए आलोचना का शिकार हुए दिग्विजय सिंह ने राज्य के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की खुली बहस की चुनौती स्वीकार करते हुए दस सवाल उछाले हैं। दिग्विजय सिंह का मानना है कि छत्तीसगढ़ की सरकार तथा केन्द्रीय गृहमंत्री नक्सल समस्या को केवल कानून व्यवस्था की समस्या मानकर एक बड़ी गलती कर रहे हैं। ऐसा कर उन्होंने नक्सल प्रभावित क्षेत्रों को एक युद्धभूमि में तब्दील कर दिया है जहां स्थानीय निवासी दो पाटों के बीच पिस रहे हैं। दिग्विजय ने 14 अप्रैल के अपने लेख में चिंता व्यक्त की थी कि इस युद्ध में आदिवासी नेस्तनाबूद हो रहे हैं। उन्होंने केन्द्रीय गृहमंत्री पी चिदम्बरम को भी आड़े हाथों लिया था। इससे इतना तो स्पष्ट है कि दिग्विजय सिंह का मकसद इस मामले को लेकर केवल राजनीति करना नहीं है। दिग्विजय जिन हालातों की तरफ इशारा करना चाहते थे, उनकी चर्चा पर भी छत्तीसगढ़ में फिलहाल ‘बैन’ लगा हुआ है। वैसे भी स्वार्थी शहरियों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि जंगलों में आदिवासी रहते हैं या नहीं। उन्हें तो केवल इससे मतलब है कि जब वे केशकाल घाटी, दंतेश्वरी मंदिर, चित्रकोट, तीरथगढ़, कुटुमसर, कैलाश गुफा देखने जाएं तो वहां पर्यटन की सभी सुविधाएं मौजूद हों। राज्य में ज्यादा से ज्यादा उद्योग लगें ताकि उनके बच्चों को नौकरियां मिल सकें। धुर आदिवासी अंचलों में शहरी बसाहटें बढ़ेंगी तो व्यापार की संभावनाओं में भी इजाफा होगा। स्वार्थ के इस चश्मे से जब नक्सल प्रभावित अंचलों का जायजा लिया जाता है तो आदिवासी दिखाई ही नहीं देते। वहां या तो नक्सलियों का विकृत चेहरा नजर आता है या फिर शहीद जवानों के खून में सने चीथड़े। दरअसल उद्योगों के लिए विस्थापन हमेशा से एक बड़ी समस्या रही है। बात जब वनाच्छादित पहाड़ों के नीचे दबी खनिज संपदा की हो तो यह समस्या और विकट हो जाती है। समस्या न केवल आदिवासी गांवों को खाली कराने, उनके प्रशिक्षण की व्यवस्था कर उन्हें ऐसी जगहों पर लगने वाले कारखानों में रोजगार दिलाने की है बल्कि पर्यावरण का क्लीयरेंस हासिल करना भी एक बड़ी समस्या होती है। इन समस्याओं पर खुले मन से बहस की जरूरत है। लोकतंत्र में राजपाट का मिल जाना कोई स्थायी विरासत नहीं होती जिसमें मनमानी की जाए। यहां विपक्ष की भी भूमिका है। यह भूमिका इसीलिए है कि प्रत्येक मामले पर बहस हो और गुणदोषों की विवेचना के बाद आगे कदम बढ़ाए जाएं। इस लिहाज से देखा जाए तो दिग्विजय के इस साहस की प्रशंसा ही करनी होगी। इसके लिए चाहे अपनी ही पार्टी में उन्हें मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा हो किन्तु यह पहल किसी को तो करनी थी।
Saturday, May 1, 2010
नक्सलियों को हथियारों की बिक्री
पैसा पैसा करती है, क्यों पैसे पे तू मरती है... पैसों की लगा दूं ढेरी... नए दौर का यह गीत, खामख्वाह ही लोकप्रिय नहीं हो गया। इस गीत में नए दौर में पैसों की अहमियत और उसे कमाने की तरफ जो इशारा किया गया है वह आज हर किसी के सिर चढ़कर बोल रहा है। व्यापारी और उद्योगपति तो खैर पैसा कमाने के लिए ही बैठे हैं किन्तु अब नेता, पत्रकार, पुलिस, वकील सभी लोग केवल पैसा कमाने में ही लगे हैं। यही नहीं धर्मकर्म और योग वाले बाबा भी अब धनकुबेरों की श्रेणी में आते हैं। सफलता और आदमीयत की कीमत व्यक्ति के बैंक बैलेंस से लगाई जाती है। जो पैसे कमा लेता है, दूसरों को हिकारत की नजर से देखता है। जो नहीं कमा पाता वह मन मसोस कर रह जाता है। लोग कहते हैं कि यही जमाने का दस्तूर है, तुम्हें किसने रोका है? पैसा कमा कर बताओ तो जानें। किन्तु जब पैसा कमाने का यह रोग सेना, राजनयिक और सुरक्षा बलों को लग जाता है तो धड़कनें ठहर सी जाती हैं। क्या उम्मीद करते हैं आप? कि आप पैसे कमाते रहें, उसके लिए चाहे कुछ भी करते रहें। दूध में सफेदा घोलें, मिठाई में बुरादा मिलाएं, दो नम्बर के माल को एक नम्बर में बेचें, बिना बिल के चीनी माल बेच बेचकर होण्डा सिटी और शेवरोले मेन्टेन करें, 50 लाख के बंगलों में रहें और जवान पांच हजार रुपए की नौकरी में अपनी जान हथेली पर रखकर आपकी सुरक्षा करे? यदि आप ऐसी उम्मीद करते हैं तो आपसे बड़ा बेवकूफ और कोई नहीं है। यदि पैसा कमाना मात्र ही आपका फंडा है तो जवानों को किसने रोका है। सेना हो या आंतरिक सुरक्षा में लगे अर्द्धसैनिक बल, किसी में भी आदमी दूसरे ग्रह से नहीं आया है। वे सब इसी समाज के हिस्सा हैं। हमारे आपके रिश्तेदार हैं। आपकी कंपनी में लोहा पड़ा रहता है तो आप लोहा बेच लेते हो। आप राशन के धंधे में हो तो राशन बेच मारते हो। यदि आप अधिकारी हो तो हर काम में अपना परसेन्ट फिक्स करा लेते हो। अब जिसके पास जो है वही तो बेचेगा। अमानत में खयानत अब कोई जुर्म नहीं रहा। इसलिए लखनऊ में जब यह खुलासा हुआ कि सीआरपीएफ के जवान उन्हीं माओवादियों और नक्सलियों को हथियारों की आपूर्ति करते थे जो उनके भाईयों को मार रहे थे, तो कतई कोई आश्चर्य नहीं हुआ। यही तो होता है। बल्कि खुशी हुई कि सुबह शाम एड़ी पटक-पटक कर मार्च करने का असर भी उनके दिमाग को कुंद नहीं कर पाया। उन्होंने भी रास्ता निकाल लिया। उन्होंने उन्हीं गोदामों से हथियार और गोलाबारूद चुराया जिसकी वे हिफाजत करते थे, उन्हीं लोगों को अस्त्र शस्त्र बेचे जिनके खिलाफ उनके साथी जवान मोर्चा ले रहे थे। क्या फर्क पड़ता है? उपभोक्तावादी युग में उनके भी परिवारों की आशाएं हैं, अपेक्षाएं हैं। बल्कि ये तो उन बदकिस्मतों में से हैं जो अपने लाड़लों को अपनी गोद में नहीं खिला पाते, अपने कांधों पर नहीं बिठा पाते। ये वही जवान हैं जिनकी पत्नियां साल के कई-कई महीने उनकी राह तकती रह जाती हैं। और जब उन्हें ऐसे लोगों की हिफाजत की जिम्मेदारी दी जाती है जो चोरी से ही रईस हुए हैं तो क्या उनकी आत्मा नहीं कचोटती होगी? दुनिया चाहे जितने कानून बना ले, अंत में चलती प्रकृति की ही है। जो बोया है अब उसकी फसल काटने की बारी है। इसलिए रोना धोना छोड़ो और सुख से जियो।
Subscribe to:
Comments (Atom)