photo journalist from chhattisgarh. Worked for the Navabharat in Orissa as bureau chief. Presently with the Haribhoomi Super Central Desk.
Friday, May 21, 2010
जड़ी बूटी और खनिज सम्पदा
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह समेत कुछ बुद्धिजीवियों ने एक अच्छा सवाल उठाया है। पहली बार कोई मुद्दे की बात उठी है। डॉ रमन सिंह कहते हैं कि देशभर में नक्सलियों का कब्जा उन्हीं जंगलों एवं पहाड़ों पर है जहां खनिज हैं। खनिज संपदा पर कुंडली मारकर नक्सली विकास को अवरुद्ध कर रहे हैं। हो सकता है वे सही हों। पर नक्सली पहाड़ों में खदान नहीं चला रहे। उत्खनन का कोई मामला आज तक पकड़ में नहीं आया है। अब सवाल यह उठता है कि नक्सली यहां क्यों बैठे हैं? उनका खर्चा कैसे चल रहा है? यह कोई यक्ष प्रश्न नहीं है जिसका उत्तर देने के लिए जान की बाजी लगानी पड़े। डॉ. रमन सिंह स्वयं भेषज चिकित्सक यानी कि आयुर्वेद के डाक्टर हैं। उन्हें खूब पता है कि जिन पहाड़ों के नीचे खनिज दफ्न होते हैं, वहीं तरह-तरह की जड़ी बूटियां उगती हैं। ये बेशकीमती जड़ीबूटियां दुनिया भर में दवा बनाने के काम आती हैं। यही नहीं इन्हीं पहाड़ियों पर गांजे की जबरदस्त खेती होती है। कोई चालीस साल पहले इन वनाच्छादित पहाड़ी इलाकों में कुछ खोजी प्रवृत्ति के लोग व्यापार करने पहुंचे। उनका उद्देश्य ऐसी जगहों पर लंगोटी छाप आदिवासियों को सौदा बेचना नहीं था। उनकी दुकानें जरूर होती थीं किन्तु पीछे धंधा कुछ और होता था। वे आदिवासियों से वनोपज संग्राहक का काम लेते थे। वे इन बेशकीमती जड़ी बूटियों समेत अन्य वनोपज उनसे मिट्टी के मोल हड़प लेते थे और उसे सही बाजार तक पहुंचाकर हजारों रुपए कमाते थे। कालांतर में यह राशि लाखों, करोड़ों तक जा पहुंची है। यह नेटवर्क आज भी जिन्दा है। 20-25 साल पहले इस धंधे पर उगाहू लोगों की नजर पड़ी। वे न तो संग्राहक थे और न ही व्यापार में पूंजी लगाने का उनका कोई इरादा था। वे इन व्यापारियों को धमकाकर उनसे वसूली करने लगे। फिर शुरू हुआ आदिवासी अंचलों में विकास के नाम पर पैसे बहाने का दौर। अब तक माफिया बन चुके इन हफ्ता वसूली करने वालों को नए मुर्गे सरकार ने खुद तैयार कर के दिए। इन्हें ठेकेदारों और कमीशन खोर अफसरों से भी हफ्ता-महीना मिलने लगा। आज यह नेटवर्क बेहद शक्तिशाली है। इन लोगों की पहुंच हर उस जगह है जहां तक सरकार पहुंच सकती है। अब सवाल यह उठता है कि जब वनों को सुरक्षित रखते हुए अरबों रुपए कमाए जा सकते हैं तो खदान खोलने की जरूरत ही क्या है? विकास के लिए कारखाना लगाना ही क्यों जरूरी है? सरकार यदि करोड़ों रुपये मूल्य की जड़ीबूटियों का महत्व नहीं समझती तो यह उसकी गलती है। वनोपज और जड़ीबूटियों से आदिवासियों को उन्हीं के वातावरण में बेहतर जीवन दिया जा सकता है किन्तु यह प्रक्रिया धीमी है। इससे नया उपभोक्ता बाजार भी नहीं खुलता। इससे एकमुश्त मलाई नहीं खाई जा सकती। अपने डिग्रीधारी भाई भतीजों को डायरेक्टर नहीं बनाया जा सकता। मजेदार बात यह है कि इस मामले में सरकार झूठ नहीं बोल रही। फिलहाल वह आधे सच से काम चला रही है। सरकार कह रही है कि उसने किसी निजी या बहुराष्ट्रीय कंपनी को खदानों का पट्टा नहीं दिया। वह इसमें ‘अब तक’ शब्द नहीं जोड़ रही। खदान तो खदान है, फिर चाहे सेल की हो, एनएमडीसी की हो या किसी और की।
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