photo journalist from chhattisgarh. Worked for the Navabharat in Orissa as bureau chief. Presently with the Haribhoomi Super Central Desk.
Thursday, May 6, 2010
सब्र की पाठशाला
कानून को अपने हाथों में लेना जुर्म है। कानून किसके हाथ में रहेगा और किसकी जेब में यह सब सरकार तय करती है। आम आदमी में इतना तो सब्र होना ही चाहिए कि वह कानून को अपना काम करने दे, फिर चाहे न्याय मिलते उसकी उम्र ही क्यों न बीत जाए। गाली देने का, बदतमीजी से पेश आने का अधिकार भी सरकार ने कुछ लोगों को दे रखा है, उनके अलावा और लोग इन अधिकारों का प्रयोग नहीं कर सकते। अलबत्ता जिन्हें जनता का समर्थन होता है, और जिन्हें जनता ने चुनकर विधानसभा में भेजा होता है, वे सरकार में रहें या सरकार से बाहर कुछ अधिकार उनके भी होते हैं। इसलिए जब न्यू बसंत टाकीज के पास लोगों को फोरलेन के डिवाइडर से परेशानी हुई तो स्थानीय विधायक ने न केवल मांगपत्र दिया बल्कि उसमें कार्यनिष्पादन के लिए समयसीमा भी निश्चित कर दी। समय सीमा में जब जिला प्रशासन काम नहीं करवा पाया तो उन्होंने अपने समर्थकों के साथ खुद जाकर यह काम कर दिया। फास्ट ट्रैक कोर्ट के जमाने में लेटलतीफी अब बर्दाश्त से बाहर हो चली है। यह तो हुई खास लोगों की बात जो भीड़ की शक्ल में जाकर कुछ भी कर सकते हैं। इससे पहले फोरलेन के कुम्हारी प्लाजा में भिलाई के ही एक अन्य विधायक ने वह हंगामा खड़ा किया कि डीएससी वाइकान के मैनेजर को स्ट्रीट लाइट का भूमिपूजन करने के लिए उन्हें ही आमंत्रित करना पड़ा। खूब जमी जब मिलकर बैठ गए दीवाने दो। इसके बाद वाइकान की मनमानी में वाइकिंग जितनी रफ्तार आ गई। उसने फोरलेन को ेएक तरह से दुपहिया वालों के लिए बैन ही कर दिया। टोल गेट पर एक तो जगह संकरी छोड़ी और उसपर उसमें व्यवधान डाल दिये। कुम्हारी टोल प्लाजा पर अब बीवी को बैठाकर बाइक या स्कूटर चलाना किसी स्टंट से कम नहीं। बाएं हिले तो प्यारी पत्नी के पांव के नाखून टूट जाते हैं, घुटने छिल जाते हैं और दाएं हिले तो डिवाइडर से टकराकर भर-भराकर गिर पड़ते हैं। लिहाजा बीवी पैदल टोल प्लाजा पार करती है और मियां झेंपते हुए अकेले गाड़ी निकालते हैं। इन तंग गलियों से जब बोरा लादे साइकिल सवार गुजरते हैं तो पल्सर, आर-15, सीबीजी वालों को भी ब्रेक लगाना पड़ जाता है। खैर बात सब्र की हो रही थी। बड़े लोग सब्र करें तो यह उनकी महानता होती है। गरीब के लिए तो सब्र ही जिन्दगी है। सवारी ढोने के बाद पैसों के लिए धूप में इंतजार करता रिक्शावाला, ट्रेन में खड़े-खड़े चक्रधरपुर से नागपुर तक सफर करने वाला आम आदमी सब्र के कारण ही जिंदा है। उसे कोई जादू की झप्पी देने वाला नहीं मिलता। जिस तरह विधायक और पूर्व विधायक ने कानून हाथ में लिया यदि हर कोई ऐसा करने लगे तो क्या हो...
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