photo journalist from chhattisgarh. Worked for the Navabharat in Orissa as bureau chief. Presently with the Haribhoomi Super Central Desk.
Tuesday, May 25, 2010
एथिकल ट्रीटमेन्ट आफ एनिमल्स
क्या घोड़े को तांगे में जोता जाना क्रूरता है? क्या कुत्ते के गले में पट्टा डालना क्रूरता है, क्या बैलों को हल में, गाड़ा में या कोल्हू में जोतना उनके प्रति अपराध है? विकास के क्रम में इंसानों ने सबसे पहले मवेशियों को साधा। उनके साथ सहअस्तित्व का समीकरण तैयार किया और दोनों एक दूसरे के पूरक बन गए। पशु अपनी क्षमता के अनुसार इंसान का काम करता है और इंसान अपने सामर्थ्य के अनुरूप उसकी देखभाल करता है। इंसान का यह व्यवहार केवल पशुओं के प्रति नहीं है बल्कि प्रत्येक उस इंसान के प्रति भी है जिससे वह काम लेता है। खेतों में खटने वाला खेतिहर मजदूर, चिलचिलाती धूप में, मूसलाधार बारिश में लोगों को उनकी मंजिल तक पहुंचाता रिक्शा वाला, ट्रकों से माल उतारता-चढ़ाता हमाल सभी अपनी-अपनी भूमिका निभा रहे हैं। पंथी नृत्य में कोई शीर्ष पर चढ़कर जोहार करता है तो कोई नीचे कईयों का बोझ लिए मांदल की थाप पर थिरक रहा होता है। इस व्यवस्था के खिलाफ बोल-बोल कर असंतोष तो फैलाया जा सकता है किन्तु इसे बदला नहीं जा सकता। आदिम सभ्यता ने अगर मवेशियों का उपयोग किया तो अपने समाज में उन्हें यथेष्ट सम्मान भी दिया। पशु पक्षियों को समर्पित तीज त्यौहारों की एक पूरी शृंखला ऐसे समाज में मिलती है। भारतीय समाज ने इस दिशा में कई निर्णायक पहल किये। जिन मंदिरों की शुचिता का वह पूरा ध्यान रखता था वहां उसने मवेशियों के सींग से बने सींगा, खाल से बने नगाड़ों को जगह दिलाई। चांवर में मोर पंख का उपयोग किया। गाय-बैल को तो उसने इतना सम्मान दिया कि एक को माता और दूसरे को पूज्य माना। कभी इन्हें पांव भी लग गया तो प्रायश्चित्त करता आया है। इनकी खाल के जूते पहनना तो बहुत दूर की बात है। अब जाकर पाश्चात्य संस्कृति में रंगे हुए लोग चमड़े के जूते, चमड़े की बेल्ट, चमड़े के जैकेट-दस्ताने, हैण्ड बैग, वालेट, कारों और ड्राइंग रूम में लेदर अपॉल्स्ट्री का उपयोग करता है और एथिकल ट्रीटमेन्ट आॅफ एनिमल्स की बातें करते हैं। शायद उन्हें पता नहीं कि खालों को निकालने की प्रक्रिया क्या होती है। भारतीय संस्कृति में खाल मरे हुए मवेशियों की उधेड़ी जाती थी। जितना, जैसा निकला उसीसे काम चला लिया। पर नई पीढ़ी पेटेन्ट लेदर, साफ्ट लेदर, वनपीस स्प्रेड की भाषा बोलती है। इनकी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए खाल उतारने की पद्धति अलग होती है। जीवित मवेशियों की पूंछ काटी जाती है, सींग तोड़ दिए जाते हैं और उन्हें जीवित ही उलटा टांग कर उनके गले में छोटा सा छेद कर दिया जाता है। ऐसे मवेशियों की मौत खून के रिसने से होती है। पूरा शरीर खिंच कर लंबा हो जाता है। इस तरह से प्राप्त किए गए चमड़े का उपयोग करने वाले यदि शुद्ध-शाकाहारी भी हैं तो क्या। इनसे तो वे लोग सहस्त्र गुणा बेहतर हैं जो मांस, मछली का सेवन उदरपोषण के लिए करते हैं। कम से कम आहारचक्र का संतुलन तो बना रहता है।
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sir aapne ye dil se likha hai ya majak me.lekin aankhon ko kholta hua lekh likha hai.
ReplyDelete--
ram malviya