photo journalist from chhattisgarh. Worked for the Navabharat in Orissa as bureau chief. Presently with the Haribhoomi Super Central Desk.
Tuesday, May 18, 2010
रेलवे पर दर्ज हो कत्ल का जुर्म
हादसे कभी भी कहीं भी हो सकते हैं। हादसों की समीक्षा कर उसके कारकों को रोकना ही व्यवस्था का काम है। किन्तु यह क्या बात हुई कि रेलवे आज भी उन कारणों को दूर नहीं कर पाया है जिसकी वजह से न केवल स्टेशनों पर भगदड़ मचती है बल्कि लोगों की जानें जाती रहती हैं। पहली बार हादसा सिर्फ हादसा होता है। दूसरी बार यदि वही हादसा फिर हो तो वह लापरवाही होती है। और यदि वही हादसा बार-बार होता रहे तो मामला आपराधिक लापरवाही का बन जाता है। यदि इस लापरवाही से लोगों की जान जाती है तो कारकों की तरफ से उदासीन प्रशासन पर हत्या का मुकदमा चलाया जाना चाहिए। नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर रविवार को अंतिम क्षणों में बिहार संपर्क क्रांति एवं विक्रमशिला एक्सप्रेस का प्लेटफार्म बदल दिया गया। जनरल बोगी के लिए नियत स्थान के पास अपने बाल बच्चों के साथ घंटों पहले से इंतजार कर रहे लोगों में भगदड़ मच गई। पागलों की तरह अपना मोटरा लेकर भागते लोगों के पैरों तले कुचल कर एक महिला और एक बच्चे की मौत हो गई। दर्जनों लोग घायल हो गए। ऐसा कोई पहली बार नहीं हुआ है। तीन साल पहले 3 अक्टूबर 2007 को देश के सबसे बड़े जंक्शन मुगलसराय में भी इसी तरह की एक भगदड़ मची थी जिसमें 15 महिलाओं की मौत हो गई थी। तब भी रेलवे ने अंतिम समय पर ट्रेनों का प्लेटफार्म बदल दिया था। जैसा कि रेल दुर्घटनाओं के मामलों में होता है, मुआवजे और जांच की तत्काल घोषणा कर दी गई। न तो इस जांच से किसी का कुछ बिगड़ना है और न ही मुआवजे की रकम जिम्मेदार अधिकारियों की तनख्वाह में से काटी जानी है। फिर उन्हें किस बात की चिंता। वैसे भी रेलवे आज तक औपनिवेशिक मानसिकता से उबर नहीं पाया है। रेलवे के उच्चाधिकारी शाही सलून में यात्रा करते हैं। सरकारी अफसर और कर्मचारी एयरकंडीशन्ड क्लास में सफर करते हैं। देश की 80 फीसदी से अधिक जनता के लिए किसी भी ट्रेन में एक दो बोगी से अधिक की जगह नहीं होती। यहां फट्टे की सीट पर बैठने के लिए हजारों लोगों के बीच धक्कामुक्की होती है। ये डब्बे ट्रेन के आगे लगेंगे या पीछे यह तक किसी को पता नहीं होता। ट्रेन आने के बाद ही इस क्लास के यात्री डब्बों के साथ-साथ भागना शुरू करते हैं। सी-आॅफ/रिसीव करने वाले, लगेज, रेलवे की ट्राली, पत्रिका-पुस्तकों के ठेले, स्नैक्स कार्ट आदि इनका रास्ता रोकते हैं। पांव तले का चिकना फर्श उन्हें तेज गति नहीं करने देता। पिछले और अगले डब्बों के बीच 20-22 डब्बों की पूरी ट्रेन होती है। रेलवे को ऐसे लोगों की कोई फिक्र नहीं। रेलवे प्लेटफार्मों की हालत आज भी सर्कस के पार्किंग जैसी है, जहां गाड़ियों के पहुंचने के बाद ही उसके लिए जगह तय की जाती है। क्या कोई इस बात का जवाब देगा कि करोड़ों रुपए खर्च कर विकसित किया जा रहा रूट रिले और सिग्नलिंग सिस्टम किस काम का है?
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