Saturday, May 8, 2010

सांप और नेवला

प्रतिक्रिया एक स्वाभाविक प्रक्रिया है जिससे व्यक्ति अपनी पसंद या नापसंद जाहिर करता है। पूरी बात सुनने के बाद, वस्तुस्थिति को समझने के बाद यदि ठंडे दिमाग से, शांत चित्त से प्रतिक्रिया की जाए तो न केवल लड़ाई-झगड़े टल सकते हैं बल्कि समस्याओं का समाधान भी निकल कर आ सकता है। बचपन में ‘सांप और नेवला’ की कहानी पढ़ी थी। सोते दुधमुंहे बच्चे को पालतू नेवले की निगरानी में छोड़कर महिला अपने काम से बाहर गई थी। जब वह लौटी तो उसने नेवले को घर से बाहर घूमते पाया। नेवले के मुंह पर खून लगा हुआ था। महिला को लगा कि नेवला बच्चे को मारकर खा गया है। उसने आव देखा न ताव नेवले को कुचल कर मार दिया। जब वह घर में घुसी तो पता चला कि बच्चा सकुशल सो रहा है। उसके सिरहाने पर एक सांप कई टुकड़ों में मरा पड़ा है। उसे माजरा समझते देर नहीं लगी किन्तु तब तक बहुत देर हो चुकी थी। कुछ-कुछ ऐसा ही हाल केन्द्रीय गृहमंत्री का हो रहा है। दंतेवाड़ा के ताड़मेटला में नक्सली वारदात क्या हुई 24 घंटे के भीतर देश के कोने-कोने से प्रतिक्रियाएं आ गर्इं। जिन्होंने कभी बस्तर नहीं देखा था, जिन्हें यह तक नहीं पता कि नक्सलियों के सिर पर सींग नहीं होते, उन्होंने भी टिप्पणियां की। जैसे जैसे दिन बीतते गए, प्रतिक्रियाओं में संशोधन होता गया। अब जाकर घटना के पूरे एक महीने बाद गृहमंत्री ने स्वीकार किया है कि ताड़मेटला की घटना के लिए जितने जिम्मेदार नक्सली थे, लगभग उतने ही जिम्मेदार वे अधिकारी भी थे जिन्होंने अविवेकपूर्ण निर्णय लेकर उस टुकड़ी को वहां भेजने की रणनीति बनाई थी। यह बात अगर किसी और ने कही होती तो निस्संदेह उसे नक्सली समर्थक बताकर कटघरे में खड़ा कर दिया जाता। इस एक महीने में देश के बुद्धिजीवियों की शामत आ गई है। बल्कि सरकार उनकी टिप्पणियों से इतना परेशान हो गई है कि अब उनका मुंह पकड़ने जैसा असाध्य काम करने की कोशिश कर रही है। नये फरमान के अनुसार नक्सल समर्थक बुद्धिजीवियों को दस साल की जेल हो सकती है। किन्तु जब किसी की पूरी बात सुनी ही नहीं जाएगी तो यह तय कैसे होगा कि व्यक्ति नक्सलियों का समर्थन कर रहा है या अविवेकपूर्ण दुस्साहस की आलोचना कर रहा है? ऐसा लग रहा है कि सरकार उत्तेजित हो गई है और हड़बड़ी में अनाप-शनाप निर्णय ले रही है। सरकार खुद व्यक्तियों का एक समूह है जिसमें सभी को अपना अपना मत रखने का अधिकार है। नगरीय निकायों से लेकर लोकसभा तक ये लोग आपस में मतभिन्नता के कारण लड़ते रहते हैं और गालियों से लेकर हाथापाई तक का होना आमबात है। किन्तु इसपर पाबंदी नहीं लगाई जा सकती। शायद इसीलिए गृहमंत्री जब जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रेक्षागार में विद्यार्थियों से चर्चा कर रहे थे तो उन्होंने खुलकर तथ्यों को स्वीकार किया। शायद इसीलिए उस छात्रा को भी उन्होंने अपने दफ्तर आने का न्यौता दिया जिसने सरकारी कदम की आलोचना की थी। उन्होंने खुलेदिल से कहा कि सबको अपनी बात रखने की इजाजत है। शर्त केवल यह है कि वह हिंसक न हो। जब एक छात्रा की बात सुनने के लिए गृहमंत्री तैयार हैं तो वे कौन लोग हैं जो सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश, हाईकोर्ट के जस्टिस और शिक्षाविदों की बातें सुनने से इंकार कर रहे हैं?

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