Thursday, May 6, 2010

बिजली, माई लव

मेरा पहला और अंतिम प्यार है बिजली। बिजली मेरी सबसे बड़ी जरूरत है। बिजली बिना, न दिन को चैन है न रात को आराम। बिजली नहीं तो नल में पानी नहीं। पानी नहीं तो लाखों का लैट्रिन बाथरूम बेकार। आलीशान महल भी कालकोठरी। बिजली नहीं तो नाश्ता नहीं। बिजली नहीं तो खाना नहीं। आम की चटनी हो या इडली दोसा, बिजली बिना कुछ भी नहीं। क्रिकेट खेलने के लिए बिजली चाहिए तो क्रिकेट देखने के लिए भी बिजली चाहिए। बिजली न हो तो बाल सुखाना भी हो जाए मुश्किल। दाढ़ी भी न बने। पानी गर्म करने के लिए बिजली तो पानी ठंडा करने को भी बिजली। अब तो मार्निंग वाक भी बिजली का मोहताज हो गया है। आलसी आदमी चुपचाप पड़ा रहे और इलेक्ट्रिक वाकर उसके पैरों को चलाता रहे। थुलथुल पेट को कम करने के लिए भी बिजली से चलने वाला बेल्ट गुदगुदी करे। भगवान का नाम लेने के लिए भी मुंह को कष्ट क्यों देवें, इलेक्ट्रिक गैजेट हैं ना। बिजली बनाने के लिए भी उन्हीं चीजों की जरूरत है जो इन्सान के जीवित रहने के लिए आवश्यक हैं। यानी जंगल और पानी। जंगलों को उजाड़े बिना कोयले की खदानें नहीं खुलतीं, पानी बिना ताप विद्युत परियोजनाएं काम नहीं करतीं। इसके विकल्प भी हैं। पन बिजली, सौर बिजली और पवन बिजली। भारत में न धूप की कमी है और न तेज बहती हवाओं की। किन्तु यह मुफ्त है इसलिए इसका कोई मोल नहीं। पन बिजली परियोजनाएं केवल बांधों पर लगाई जा सकती हैं लिहाजा उसकी अपनी सीमाएं हैं। इन्हीं अजुहातों को आगे रखकर केन्द्र ने परमाणु/नाभिकीय र्इंधन के लिए करार किए। कहां हैं ये परियोजनाएं? देशभर में पावर प्लांट के लिए अंधाधुंध करार हो रहे हैं। बिजली की कमी का खाका खींचकर इसके लिए जनसमर्थन जुटाया जा रहा है। ये सभी विद्युत परियोजनाएं ताप आधारित हैं। इन सभी का आधार पानी और कोयला है। छत्तीसगढ़ को पावर हब बनाने का सपना देखने वाले भी केवल आज में जी रहे हैं। उन्हें कल की परवाह नहीं। छत्तीसगढ़ की आबोहवा क्या से क्या हो गई, इसकी किसी को चिंता नहीं। पानी के लिए हाहाकार मच रहा है, भूजल लगातार नीचे जा रहा है, लोग पीने के पानी के लिए एक दूसरे का सिर फोड़ रहे हैं। एक सामान्य सी बात है कि जो चीज कम पड़ रही हो उसका विवेकपूर्ण इस्तेमाल होना चाहिए। बिजली की खपत कम करनी हो तो सबसे पहले नाइट क्रिकेट, एयरकंडीशनर, रेफ्रिजरेटर बैन कर दिए जाएं। बिजली से चलने वाले अनावश्यक गैजेट्स पर भी पाबंदी लगे। यह बैन तब तक जारी रहे जब तक कि परमाणु बिजली घर अस्तित्व में न आ जाएं। आज हमें चीन की प्रगति और तरक्की दिखती है किन्तु वह कुर्बानी नहीं दिखती जो चीन के लोगों ने दी। लंबे समय तक वहां के लोगों ने निजी वाहनों से परहेज किया। वजह केवल एक ही थी कि पेट्रोल आयात करना पड़ता था और सरकार उसपर खर्च नहीं करना चाहती थी। क्या हममे है इतना साहस?

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