photo journalist from chhattisgarh. Worked for the Navabharat in Orissa as bureau chief. Presently with the Haribhoomi Super Central Desk.
Tuesday, May 25, 2010
ठीकरा फोड़ना जरूरी क्यों?
हमारे अपने पुत्र को छोड़कर मोहल्ले के सभी लड़के आवारा टाइप के हैं। हमारा बेटा इसलिए मन लगाकर पढ़ाई नहीं करता क्योंकि आवारा लड़के उसे खेलने के लिए ले जाते हैं। आवारा लड़कों के साथ रहकर वह मारामारी सीख रहा है वरना हमारा लड़का तो ऐसा कर ही नहीं सकता। यह एक माँ की सोच हो सकती है किन्तु जब यही सोच संस्थागत हो जाए तो चिंता होना स्वाभाविक है। नए दौर में देशी सबकुछ खराब है और विदेशी सबकुछ अच्छा। खान-पान, रहन-सहन, सोच, गीत-संगीत, परिधान सबकुछ विदेश का अच्छा है। पूरा बाजार इसी सोच पर काम कर रहा है। ऐसे में एक विमान दुर्घटना हो जाए और उसका ठीकरा एक विदेशी पायलट के सिर फोड़ने की कोशिश की जाए तो गुस्सा आ ही जाता है। देशी ‘चिंतामणियों’ के बयान पढ़ रहा हूं कि देश के साढ़े पांच हजार पायलटों मेें से 10 फीसदी यानी कि लगभग साढ़े पांच सौ पायलट विदेशी हैं। क्यों हैं? क्या एयर इंडिया इनकी शक्ल का इस्तेमाल अपने विज्ञापन में करता है? नहीं! ऐसा नहीं है। दरअसल देश के लोगों को सस्ती हवाई यात्रा चाहिए। देशी पायलटों को मोटी तनख्वाह चाहिए। सुख सुविधाएं चाहिए। इसके बाद भी जब उनकी इच्छा होगी वे हड़ताल पर चले जाएंगे। विदेशी पायलटों के साथ ये दिक्कतें नहीं हैं। वे कांट्रेक्ट पर काम करते हैं। पुसाया तो किया, नहीं पुसाया नहीं किया। पर एक बार एग्रीमेन्ट कर लिया तो उसकी शर्तों का वे पूरा सम्मान करते हैं। खरबूजा दिखाकर अपना रंग बदलवाने की कतार में नहीं खड़े हो जाते। मैंगलोर दुर्घटना में जिस पायलट की मृत्यु हो गई वह सर्बिया मूल के थे। 55 वर्षीय ज्लातको ग्लूसिया दस हजार घंटों की उड़ान पूरी कर चुके थे। कहा जा रहा है कि विदेशी पायलट हमारे देश की भौगोलिक विविधता से परिचित नहीं हैं। उनका उच्चारण ठीक नहीं है इसलिए उड़ान नियंत्रण कक्ष के साथ उनका तालमेल सही नहीं बैठ पाता। ऐसी बेहूदा बातें कोई सिरफिरा ही कर सकता है। ऐसे में तो भारत आने वाली प्रत्येक उड़Þान में एक भारतीय को बैठाना पडेÞगा। दरअसल अपना दोष किसी और के मत्थे मढ़ने की कोशिश करना हमारी फितरत में शामिल हो गया है। हादसे कभी भी, कहीं भी हो सकते हैं। हाईवे पर होने वाली ज्यादातर दुर्घटनाओं में अनुभवी ड्राइवर शामिल होते हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि उन्हें गाड़ी चलानी नहीं आती या ट्रैफिक सिग्नल समझ में नहीं आता। कोई भी अपनी गाड़ी की चाभी किसी अनाड़ी के हाथ में नहीं देता फिर भी दुर्घटनाएं तो हो ही रही हैं। इसीलिए तो उसे दुर्घटना कहते हैं, हादसा कहते हैं, एक्सीडेन्ट कहते हैं। इसके लिए किसी को दोषी ठहराना ठीक उसी तरह है जैसे गांव में हैजा फैलने पर किसी विधवा को टोनही साबित करने की कोशिश करना। कम से कम बुद्धिजीवी तो इससे बाज आएं।
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हमारे देश मे दुर्घटना चाहे छोटी हो या बड़ी, लोगो को बलि का बकरा ढूँढने की आदत हो गयी है। इसमे एक हाथ टीवी मीडिया का भी है उन्हे अपनी टीआरपी जो बढ़ानी है, हर खबर को मसाला लगाकर दिखाना उनकी आदत हो गयी है।
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