photo journalist from chhattisgarh. Worked for the Navabharat in Orissa as bureau chief. Presently with the Haribhoomi Super Central Desk.
Saturday, May 1, 2010
नक्सलियों को हथियारों की बिक्री
पैसा पैसा करती है, क्यों पैसे पे तू मरती है... पैसों की लगा दूं ढेरी... नए दौर का यह गीत, खामख्वाह ही लोकप्रिय नहीं हो गया। इस गीत में नए दौर में पैसों की अहमियत और उसे कमाने की तरफ जो इशारा किया गया है वह आज हर किसी के सिर चढ़कर बोल रहा है। व्यापारी और उद्योगपति तो खैर पैसा कमाने के लिए ही बैठे हैं किन्तु अब नेता, पत्रकार, पुलिस, वकील सभी लोग केवल पैसा कमाने में ही लगे हैं। यही नहीं धर्मकर्म और योग वाले बाबा भी अब धनकुबेरों की श्रेणी में आते हैं। सफलता और आदमीयत की कीमत व्यक्ति के बैंक बैलेंस से लगाई जाती है। जो पैसे कमा लेता है, दूसरों को हिकारत की नजर से देखता है। जो नहीं कमा पाता वह मन मसोस कर रह जाता है। लोग कहते हैं कि यही जमाने का दस्तूर है, तुम्हें किसने रोका है? पैसा कमा कर बताओ तो जानें। किन्तु जब पैसा कमाने का यह रोग सेना, राजनयिक और सुरक्षा बलों को लग जाता है तो धड़कनें ठहर सी जाती हैं। क्या उम्मीद करते हैं आप? कि आप पैसे कमाते रहें, उसके लिए चाहे कुछ भी करते रहें। दूध में सफेदा घोलें, मिठाई में बुरादा मिलाएं, दो नम्बर के माल को एक नम्बर में बेचें, बिना बिल के चीनी माल बेच बेचकर होण्डा सिटी और शेवरोले मेन्टेन करें, 50 लाख के बंगलों में रहें और जवान पांच हजार रुपए की नौकरी में अपनी जान हथेली पर रखकर आपकी सुरक्षा करे? यदि आप ऐसी उम्मीद करते हैं तो आपसे बड़ा बेवकूफ और कोई नहीं है। यदि पैसा कमाना मात्र ही आपका फंडा है तो जवानों को किसने रोका है। सेना हो या आंतरिक सुरक्षा में लगे अर्द्धसैनिक बल, किसी में भी आदमी दूसरे ग्रह से नहीं आया है। वे सब इसी समाज के हिस्सा हैं। हमारे आपके रिश्तेदार हैं। आपकी कंपनी में लोहा पड़ा रहता है तो आप लोहा बेच लेते हो। आप राशन के धंधे में हो तो राशन बेच मारते हो। यदि आप अधिकारी हो तो हर काम में अपना परसेन्ट फिक्स करा लेते हो। अब जिसके पास जो है वही तो बेचेगा। अमानत में खयानत अब कोई जुर्म नहीं रहा। इसलिए लखनऊ में जब यह खुलासा हुआ कि सीआरपीएफ के जवान उन्हीं माओवादियों और नक्सलियों को हथियारों की आपूर्ति करते थे जो उनके भाईयों को मार रहे थे, तो कतई कोई आश्चर्य नहीं हुआ। यही तो होता है। बल्कि खुशी हुई कि सुबह शाम एड़ी पटक-पटक कर मार्च करने का असर भी उनके दिमाग को कुंद नहीं कर पाया। उन्होंने भी रास्ता निकाल लिया। उन्होंने उन्हीं गोदामों से हथियार और गोलाबारूद चुराया जिसकी वे हिफाजत करते थे, उन्हीं लोगों को अस्त्र शस्त्र बेचे जिनके खिलाफ उनके साथी जवान मोर्चा ले रहे थे। क्या फर्क पड़ता है? उपभोक्तावादी युग में उनके भी परिवारों की आशाएं हैं, अपेक्षाएं हैं। बल्कि ये तो उन बदकिस्मतों में से हैं जो अपने लाड़लों को अपनी गोद में नहीं खिला पाते, अपने कांधों पर नहीं बिठा पाते। ये वही जवान हैं जिनकी पत्नियां साल के कई-कई महीने उनकी राह तकती रह जाती हैं। और जब उन्हें ऐसे लोगों की हिफाजत की जिम्मेदारी दी जाती है जो चोरी से ही रईस हुए हैं तो क्या उनकी आत्मा नहीं कचोटती होगी? दुनिया चाहे जितने कानून बना ले, अंत में चलती प्रकृति की ही है। जो बोया है अब उसकी फसल काटने की बारी है। इसलिए रोना धोना छोड़ो और सुख से जियो।
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