photo journalist from chhattisgarh. Worked for the Navabharat in Orissa as bureau chief. Presently with the Haribhoomi Super Central Desk.
Friday, May 14, 2010
इज्जत की खातिर
शराब से भी बुरी है थोथी इज्जत की लत, मरते तक पीछा नहीं छोड़ती। नेक काम के बदले इज्जत, मान सम्मान मिले तो इसमें कोई हर्ज नहीं है किन्तु यदि इज्जतदार बने रहने के लिए झूठ बोलना पड़े, चोरी करनी पड़े, औरों की मान मर्यादा को कुचलना पड़े, उधार लेनी पड़े, हत्या करनी पड़े तो ऐसी इज्जत दो टके की नहीं होती। बावजूद इसके ऐसे लोगों की संख्या ही समाज में अधिक है जो अपनी झूठी आन-बान और शान के फेर में अपना कल बिगाड़ चुके हैं, आज से खेल रहे हैं और भविष्य को पलीता लगा रहे हैं। नोएडा के आरुषि हत्याकाण्ड से एक शब्द उभरा आॅनर किलिंग। इसकी गोल-मोल परिभाषा है, परिवार के सम्मान की रक्षा के लिए बेटी, बहन की हत्या करना। इनका दोष अकसर इतना ही होता है कि उन्होंने प्यार करते समय स्टेटस का ख्याल नहीं रखा। पहले परिवार शर्म से डूब मरता है और फिर आरोपी बिना सुनवाई के कत्ल कर दिया जाता है। आश्चर्य, ऐसे मामलों में बेटों या भाइयों की हत्या नहीं की जाती। वे छुट्टा सांड की तरह होते हैं। उनके तो कुकर्मों पर भी शर्म नहीं आती, बल्कि उन्हें बचाने की कोशिश की जाती है। बहरहाल इन दिनों मीडिया आॅनर किलिंग के एलपी ट्रैक पर चल पड़ा है। चारों तरफ से आॅनर किलिंग की खबरें आ रही हैं। ऐसा नहीं है कि यह सब अचानक होने लगा है। होता तो यह शुरू से रहा है किन्तु मीडिया को इसके न्यूज वैल्यू का पता अब जाकर लगा है। इसी शृंखला की एक कड़ी है अतिथि सत्कार। पेट काटकर माँ पिछले कई महीनों से राजू के क्रिकेट किट के लिए पैसे जोड़ रही थी कि एकाएक बुआ लोग आ गए। पूरे पैसे अतिथि सत्कार पर खर्च हो गए। कम पड़ गया तो पड़ोसियों के यहां से उधार भी मांग लिया। कहां बचत के लिए हफ्ते में एक बार दाल बनती थी और यहां रोज चिकन चिल्ली, पनीर बटर मसाला की फरमाइश हो रही थी। कपड़े वाले के यहां भी दो-ढाई हजार की उधारी कर आए। इज्जत बचाने की खातिर इतना तो करना ही पड़ता है। वैसे इज्जत कमाना इन दिनों एक खेल की तरह हो गया है। कुछ लोगों ने पैसा इफरात कमा लिया है किन्तु लोग उन्हें नहीं जानते। वे चाहते हैं कि लोग उन्हें भी जानें। इसके लिए वे कुछ भी करने को तैयार हैं। वे अपना शाल, श्रीफल लेकर जाते हैं, मांगी गई राशि का चेक देते हैं और बदले में अपनी ही शॉल ओढ़कर, अपना ही नारियल पकड़कर मुख्यअतिथि के साथ फोटू खिंचवाते हैं। एक खूब रंगीन सा सम्मान पत्र पाते हैं। सर्टिफिकेट की कई कापियां निकाली जाती हैं और उन्हें घर की बैठक से लेकर दफ्तर की दीवारों पर चस्पा कर दिया जाता है। एक पैसे वाला इज्जत खरीद लाता है और दूसरा कंगला सम्मान समारोह का आयोजन कर अपनी दाल रोटी का इंतजाम कर लेता है।
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jordar maza aa gaya
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