photo journalist from chhattisgarh. Worked for the Navabharat in Orissa as bureau chief. Presently with the Haribhoomi Super Central Desk.
Friday, May 28, 2010
बैल की सवारी
टीवी पर राखी के स्वयंवर रचाने से बहुत पहले छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के घुमका गांव की अन्नपूर्णा ने स्वयंवर रच कर अपने लिए दूल्हे का चयन किया था। अपने विवाह को खास बनाने के लिए इनोवेटिव होना प्रत्येक व्यक्ति का निजी मामला है। पैसे वाले लोग आसमान में, अंतरिक्ष में, समुद्र की गहराईयों में विवाह करते हैं। गांव-खेड़े का आदमी इतना इनोवेटिव नहीं है, न ही उसके पास इतने साधन हैं। वे तो पुराणों में प्रेरणा की तलाश करते हैं। इसलिए अन्नपूर्णा ने सीता से प्रेरणा लेकर अपने लिये वर चुना तो बालोद के कृषक पुत्र पोषण साहू ने शिव पार्वती विवाह से प्रेरणा लेकर बैल पर बारात निकाली। उन्होंने दल्लीराजहरा की प्रेरणा के साथ बैल पर बैठकर ही फेरे लिए। यही नहीं दुल्हन के साथ घर पहुंचने के बाद टिकावन की रस्म भी उन्होंने बैल पर बैठकर ही अदा की और मंडप के फेरे लिए। कृषक पुत्र के जीवन में बैल का महत्व सर्वोपरि है। यदि उसने अपने विवाह के साथ भी इसका संबंध जोड़े रखा तो विवाह संस्था के प्रति उसके समर्पण और निष्ठा को ही रेखांकित करता है किन्तु यह बात सामाजिक बैलों की समझ में आए तब न। समाज के नाम पर कुछ बैलों ने इसपर आपत्ति दर्ज करा दी है। उनका कहना है कि यह भगवान शिव की सवारी है और पोषण ने उनकी धार्मिक भावना को ठेस पहुंचाई है। यह वही समाज है जो सब्जी मण्डी में घुस आए बैल तो क्या सांड को भी लाठी से पीटता है। जो विघ्नहर्ता गणेश के वाहन को चूहा मार दवाई खिलाकर मारता है। जो माता दुर्गा के वाहन का शिकार कर उसपर पांव धर कर फोटो खिंचवाता है। जो यमराज के वाहन भैंस की बलि देता है। शीतला माता के वाहन गधे पर भार ढोता है और उसे गधा होने का उलाहना देता है। अपनी नस्ल के बेवकूफों को भी गधे की संज्ञा देता है। जिस बैल की चिंता में वे दुबले हो रहे हैं उसी बैल को वह हल में, गाड़ा में, कोल्हू में जोतता है। क्या बेहूदगी है? विरोध करने को दुनिया में और कुछ नहीं मिला। क्या बैल की सवारी करने मात्र से पोषण ने खुद को शिव और अपनी पत्नी प्रेरणा को पार्वती के रूप में पेश कर दिया। यदि यह सही है तो क्या गांव-गांव में बारिश के दिनों में भैंसों की सवारी करने वाले बच्चे यमराज के क्लोन होते हैं। दरअसल यह कुढ़न और जलन से प्रेरित विरोध है जिसका लाभ तो कुछ नहीं होता, अपितु नुकसान ही अधिक होता है। आप सोच भी नहीं पाए, और किसी ने कर के दिखा दिया। इसका लाभ किसको मिला। आपने विरोध किया और पोषण-प्रेरणा विवाह समाचार बन गया। जिन्हें कानों कान खबर नहीं होनी थी उन्हें भी पूरे तफसील के साथ घटना की खबर हो गई। इतिहास गवाह है कि विवादित फिल्म और विवादित पुस्तकें हिट भले न हुई हों उन्हें चर्चित होने का लाभ अवश्य मिला है। इस विरोध के पीछे भी कहीं यही मंशा तो नहीं...
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Well said. Brava..
ReplyDeleteRam Malaviya
Haribhoomi