photo journalist from chhattisgarh. Worked for the Navabharat in Orissa as bureau chief. Presently with the Haribhoomi Super Central Desk.
Sunday, May 16, 2010
जो दिखता है वह बिकता नहीं
यह जमाने का दस्तूर है कि आप जिस वस्तु का पसरा लगाओगे, दाम उसी का लगेगा। अमूमन ग्राहक उसी वस्तु को खरीदने के लिए दुकान पर आता है जिसे डिस्प्ले किया गया होता है। और फिर आप माल न बेचो तो पंगा तो होगा ही। अब किसी को क्या पता कि आपने डिस्प्ले विन्डो में ली-कूपर, लेविस, प्यूमा, रीबाक, कूटान्स के जीन्स टांग रखे हैं और भीतर हरेक माल 100 रुपए वाली जूतों की दुकान है। लड़की की शिकायत पर पुलिस मजनूं को उठा लाई। मजनूं फट पड़ा। रोते-गाते चीखते-चिल्लाते उसने अपनी करूण गाथा सुनाई। उसने बताया कि किस तरह पिछले तीन चार सालों से वह अपनी जेबखर्च का एक-एक पाई उसपर लुटाता आ रहा है। बर्थडे पर आई-पॉड, वैलेन्टाइन्स डे पर मोबाइल। हर महीने मोबाइल के रिचार्ज पर सैकड़ों रुपए। हफ्ते में दो-तीन दिन पिज्जा, बर्गर, आईसक्रीम पार्टी। आज वह उस दिन को कोस रहा है जब पहली बार नजरें चार हुई थीं। तब से अब तक अच्छा कुछ भी नहीं हुआ है। पाकेट मनी जोड़-जोड़ कर जो रकम इकट्ठी की थी कब की खत्म हो चुकी। दोस्तों का कर्जा चढ़ गया है। बाप की पाकेट मारी है। माँ के जेवर चुराए हैं। पहले दसवीं के नतीजे बिगड़े, ग्यारहवीं किसी तरह पास कर लिया पर बारहवीं में गाड़ी अटक गई। कोचिंग ज्वाइन करने के लिए घर से मोटी रकम मिली। वह भी लुटा दिए। जो कुछ डिस्प्ले पर था वह बिकाऊ नहीं था। अब प्यार का भूत उतर चुका है। सब चीजों से ध्यान हटाकर वह पढ़ना चाहता है किन्तु रात-बेरात फोन आ जाता है। हाट-टाक्स उसके कान गर्म कर देते हैं। शरीर में लहू दोगुनी रफ्तार से दौड़ने लगता है। वह बेचैन हो जाता है और पागलों जैसी हरकतें करने लगता है। एक दिन वह घर आई। पहले कम्प्यूटर को फारमेट मार दिया और फिर मोबाइल का मेमोरी कार्ड निकालकर अपने साथ ले गई। अब न वह मिलती है, न बोलती है। वह ठगा रह गया है। वह अपने बीते चार वर्षों का हिसाब चाहता है। अगर यह गुनाह है तो बेशक उसे फांसी पर चढ़ा दिया जाए। इस जिन्दगी में वैसे भी रखा क्या है? उसकी गिनती बेहतरीन स्टूडेंन्ट्स में होती थी। वह अच्छा स्पोर्ट्समैन था। माँ-बाप से लेकर टीचर्स तक सब गर्व से उसका नाम लेते थे। आज सब कुछ खत्म हो गया है। थानेदार को माजरा समझते देर नहीं लगी। उसे लड़के से पूरी सहानुभूति थी। ऋषि विश्वामित्र नहीं बच पाए थे, यह तो आदमजात था। उन्होंने लड़के की पीठ थपथपाई, पानी पिलाया और बोले, ‘भाई! कुछ चीजें फुटपाथ से भी खरीदा करो, दुनियादारी सीख जाओगे। ऊंचे शोरूम की हर चीज अपनी पहुंच में नहीं होती।’
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment